Monday, 10 June 2013

'बड़े' होने का दर्शन बनाम मनोविज्ञान बनाम हवस...


वो दोनों बस इससे पहले एक ही बार मिले थे। और उस वक्त दोनों ने ही एक-दूसरे को ज्यादा तवज्ज़ो नहीं दी थी। इस बार भी दोनों मिले तो लेकिन गर्माहट-सी नहीं थी। शायद दोनों को पिछली मुलाक़ात याद भी नहीं आई। वो दुराव भी याद नहीं था। इस बार मिले तब भी दोनों ही तरफ हल्की-हल्की झेंप थी... नए को लेकर संकोच था। लेकिन हमउम्र थे, इसलिए ये संकोच, झेंप और ठंडापन ज्यादा देऱ ठहर नहीं पाया और दोस्ती हो गई। बचपन किसी भी ‘कल’ को लाद कर नहीं चलता है, उसके लिए हर दिन पहला दिन होता है, शायद इसीलिए वो बेफिक्र होता है...। बड़ों की बातचीत से दोनों ने एक तथ्य जाना कि कनु उम्र में नॉडी से बड़ा है। नॉडी ने उस तथ्य को हवा में उड़ा दिया... क्योंकि उसे ‘छोटा’ होना मंज़ूर नहीं था और कनु ने उसे तुरंत लपक लिया, क्योंकि उसे बहुत दिनों बाद ‘बड़ा’ होने का मौका हासिल हुआ। थोड़ी देर झेंप के खेल के बाद दोनों ने एक-दूसरे से दोस्ती कर ली और साथ खेलने लगे। अब दो हमउम्र बच्चे साथ खेलेंगे तो झगड़ेंगे भी... तो थोड़ी ही देर बाद दोनों के बीच झगड़ा भी हो गया... वज़ह थी बड़ा होना...। कनु ने तो अपनी पसंद का सच लपक लिया था कि वो बड़ा है, लेकिन नॉडी उस सच से बचना चाह रहा था, क्योंकि वो भी बड़ा होना चाह रहा था। खैर... बच्चों के झगड़े क्या? अभी झगड़े और बिना किसी प्रयास के दोस्ती भी हो गई... क्योंकि वही... उनके ज़हन में कोई ‘कल’ नहीं ठहरता है।
दोनों के झगड़े की वजह सुनकर सारे ‘बड़े’ हँसे... हँसने की बात ही थी, अब ये कोई बात है कि कौन बड़ा है, इसे लेकर झगड़ा हो... अब भई जो बड़ा है वो बड़ा है और जो छोटा है, वो छोटा है... लेकिन क्या सचमुच हँसने की ही बात थी? सोचने की नहीं... कि क्यों बच्चा, ‘बड़े’ होने का अर्थ जाने बिना ‘बड़ा’ हो जाना चाहता है! जबकि जो बड़े हो गए हैं, वो अपना बचपन याद करते हुए आँहे भरते हैं कि वो दिन भी क्या दिन थे...? कम-अस-कम ये ऐसा तो कतई नहीं है कि जो गुज़र गया है, वो ही खूबसूरत है। फिर क्या वाकई हम बड़े हक़ीक़त में छोटे होना चाहते हैं, जबकि सारी लड़ाई तो हर स्तर पर ‘बड़े’ हो जाने की है। बच्चा बड़ा होना चाहता है, क्योंकि उसे लगता है कि बड़े होने में सत्ता है, जीत है, अधिकार, स्वतंत्रता है। हर ‘छोटा’ बड़ा हो जाना चाहता है, हर लघु विराट् हो जाना चाहता है... और सारा जीवन उसी जद्दोज़हद का हिस्सा बन जाता है। ये बच्चों का भी सच है और बड़ों का भी... बच्चों का सच तो वक्ती है, लेकिन बड़ों का सार्वकालिक, सार्वत्रिक, सार्वभौमिक है।
हम उम्र के तथ्य को जानते हैं तो ओहदे में, प्रभाव में, बल में, अर्थ में, बुद्धि में..., बड़े होना चाहते हैं, और यदि नहीं हो पाते हैं तो किसी ‘बड़े’ के बड़प्पन के छाते के नीचे आ जाना चाहते हैं, क्योंकि जो मनोविज्ञान बच्चे लघु रूप में समझते हैं, हम उसके विराट् रूप को समझ चुके होते हैं। हम प्रभावित करना चाहते हैं, अधिकार चाहते हैं, सत्ता और शासन चाहते हैं और इन्हीं चीजों के लिए हम ‘बड़े’ होना चाहते हैं, ऐसे नहीं तो वैसे... किसी भी तरह से। शायद सारा स्थूल विश्व ‘बड़े’ हो जाने की..., ‘विराट्’ हो जाने की ख़्वाहिश से संचालित होता है। इसी से प्रकृति में गति है, इसी में विकार भी। सिर्फ इंसान ही क्यों प्रकृति भी तो लघु से विराट का रूप ग्रहण करती है। एक पतली-सी धारा नदी में और नदी समुद्र में परिवर्तित होती है, बीज, पौधे में और पौधा पेड़ में बदलता है। कली, फूल में और फूल फल में बदलता है। वीर्य, भ्रूण में और भ्रूण शिशु में बदलता है। बच्चा, किशोर होकर वयस्क और फिर जवान होता है। गोयाकि ‘बड़ा’ हो जाना मात्र ख़्वाहिश ही नहीं, लक्ष्य भी है। या फिर बड़ा होना नियति... क्योंकि ‘विराट्’ विकार भी है और विनाश भी... ।

Sunday, 2 June 2013

जान की कीमत...


बॉक्स की न्यूज थी... हमेशा की तरह फ़र्ज अदायगी को महिमामंडित किया गया था। वीसी शुक्ल के युवा पीएसओ ने ये कहकर आखिरी गोली खुद को मार ली कि बस हम अब आपकी रक्षा नहीं कर सकते हैं। टीवी और अख़बार लगे हुए हैं, उसके आखिरी शब्दों की जुगाली में। ख़बर तो जाहिर है बहुत बड़ी थी, इतनी बड़ी संख्या में इस देश में राजनीतिक लोगों की मौत कभी हुई ही नहीं... पूरा इतिहास खंगाल लें। तब भी नहीं जब श्रीपेरंबदुर में राजीव गाँधी की आत्मघाती हमले में मौत हुई थी। जबकि वे वहाँ चुनावी रैली को संबोधित करने गए थे और जाहिर है कि उनके साथ वहाँ स्थानीय राजनीतिज्ञों की फ़ौज होगी... लेकिन तब भी इतने राजनीतिज्ञ हताहत नहीं हुए थे, जितने कि सुकमा में हाल ही में हुए नक्सली हमलों में हुए। छत्तीसगढ़ की राजनीति के बारे में बहुत जानकारी नहीं है, अरे... राजनीति के बारे में ही जानकारी कम है, जबकि इसके बारे में ही सबसे ज्यादा जानकारी होनी चाहिए थी, अब पढ़ा तो यही है ना! कुछ समय पहले अपने प्रोफेसरों से मिलने का 'संयोग' हुआ, अरे सौभाग्य-वौभाग्य कोई बात नहीं है और दुर्भाग्य तो खैर है ही नही... हाँ तो उनसे मिलने के दौरान बहुत सालों बाद बल्कि यूनिवर्सिटी छोड़ने के बाद याद आया कि पॉलिटिकल-साइंस पढ़ा है। शायद राजनीति ने जल्दी ही इससे मोहभंग कर दिया। नहीं पॉलिटिकल-साइंस से नहीं... बल्कि पॉलिटिक्स से... पॉलिटिकल-साइंस तो बहुत सारी चीजों की तरह ही दुखती रग है। खैर तो कहा तो ये जा रहा है कि हालिया नक्सली हमले ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के फ्रंट लाइन नेताओं की बलि ले ली। होगा ही, क्योंकि इस हमले में कांग्रेस के बहुत सारे कद्दावर नेताओं की जान ले ली और इसमें कुछ ऐसे लोगों की भी मौत हुई जो बेनाम है, अनजान और नामामूल किस्म के हैं। ड्रायवर, सहयोगी, सुरक्षा कर्मी आदि-आदि... महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और इसी तरह के बड़े-बड़े नामों के बीच ये गुमनाम लोग। राजनीतिज्ञ तो सारे-के-सारे चुनाव की तैयारियों के लिए वहाँ गए थे, चुनाव जीतते तो कुछ-न-कुछ तो मिलता ही, लेकिन उनके साथ जो लोग मारे गए उनका क्या? उन्हें क्या मिला? क्या मिलता?
ये सवाल बड़ा असुविधाजनक है, कह तो सकते हैं कि बड़ा अहमकाना भी। अरे यही व्यवस्था है, ऐसा ही होता आया है। अरस्तू ने भी तो कहा है कि महत्वपूर्ण काम करने वालों को सहयोगियों (उन्होंने तो खैर बाकायदा गु़लाम कहा था, लेकिन जरा सभ्य हो गए हैं, इसलिए शब्द थोड़े सॉफ्ट कर दिए हैं।) की जरूरत होती ही है। आखिर तो जो वीआईपी होते हैं, वे देश की संपदा होते हैं, व्यवस्था की रीढ़... उनका वज़ूद कितना अहम है वो इस बात से तय होता है कि उनके जीवन के लिए कितने लोग अपना जीवन कुर्बान कर सकते हैं? आखिर आम लोगों की जिंदगी का मतलब ही क्या है? लेकिन ये कौन तय करता है कि किसकी जिंदगी कितनी महत्वपूर्ण हैं और ये अधिकार किसने दिया है, किसको दिया है और किस नाते दिया गया है? पात नहीं ‘जीवन’ के प्रति संवेदना बढ़ गई है, इसलिए या फिर ‘इंसानी जीवन’ के प्रति व्यवस्थागत असंवेदनशीलता कम हुई है, इसीलिए ये सवाल परेशान कर रहा है कि कैसे और क्यों किसी की जान की कीमत कम और किसी की ज्यादा हो जाती है? और ये कीमत कौन तय करता है और उसका आधार क्या होता है? इसलिए कुछ बेवजह के सवाल आकर घेरते रहते हैं... व्यवस्था की क्रूरता की वजह से, आक्रोश पैदा होता है और इसलिए लगता है कि व्यवस्थाएं, अपने लिए सिर्फ ‘बोनसाई’ चाहती हैं... मनुष्यों को अपने हिसाब से कांट-छांट कर बनाने से ही व्यवस्थाएं सर्वाइव करती हैं और हम इतने कंडिशंड हो चुके हैं कि हमें इसमें कुछ भी नया, कुछ भी गलत नहीं लगता है...?
आखिर क्यों किसी के लिए अपनी जान की कुर्बानी दें...? जिसके लिए कुर्बानी दी जा रही है, वो इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं कि कइयों की जान उस पर न्यौछावर कर दी जानी चाहिए...! तो क्या ऐसा है कि किसी जिंदगी का मूल्य महज पैसा है? सिर्फ पैसा ही वो वजह होती है, जिसकी वजह से कोई अपनी जान का सौदा करता है और सिर्फ पैसा ही वो वजह है, जिसकी वजह से किसी की जान बहुत सारे लोगों की जान से ज्यादा कीमती हो जाती है। तो फिर मानवता, इंसानियत, लोकतंत्र, समानता और भाईचारा सिर्फ शब्द नहीं रह जाते हैं, खोखले, अर्थहीन और बे-ग़ैरत शब्द। सिर्फ धन वो शब्द नहीं हो जाता है, जिसका अर्थ है! और फिर हमारी सारी संवेदना, ज्ञान, दर्शन, विचार, व्यवस्था, समाज सब कुछ बेमानी नहीं हो जाता है, जब अर्थ ही एकमात्र संचालक नजर आता हो तो... !



Tuesday, 30 April 2013

मई दिवस, मार्क्स और बचपन

कोई-कोई बचपना भी अजीब होता है... बहुत, बहुत अजीब। ये न बचपना कहलाता है और न ही परिपक्वता... जाने इसे किस कैटेगरी में रखेंगे... मई दिवस के मौके पर ये बचपना लगातार ज़हन पर दस्तक दे रहा है। इसे तब बचपना कहा जा सकता था, लेकिन आज क्या कहा जाए, ये सवाल भी परेशान कर रहा है।
जाने ये चेतना कब आई, लेकिन जब भी आई तब से मई दिवस एक खास दिन की तरह... किसी त्योहार की तरह लगता रहा है। बचपन के उन दिनों में इस दिन कुछ नया और खुशनुमा फील होता रहा... अब भी होता है... जैसे कुछ बहुत-बहुत अपना हो, निजी... बेहद पर्सनल। तब जाने कैसे समझ ने मई दिवस का संबंध मार्क्स के जन्मदिन से जोड़ लिया था। मार्क्स... जब नहीं जानती थी, तब ईश्वर-तुल्य हो गए थे... क्यों, न तब समझी, न अब...। शायद बचपना इसी को कहते होंगे। पूँजीवादी परिवेश और ‘प्रवत्ति’ (या फिर उपभोगवादी प्रवृत्ति ज्यादा सटीक होगा, लेकिन प्रकारांतर से बात तो वही होगी ना!)... पूरी तरह से नहीं, लेकिन हाँ, इससे खुद को अलग दिखा पाऊँ, ऐसा नैतिक साहस नहीं पाती, तब भी मार्क्स, जाने कैसे हीरो हो गए थे...। तब तो ये भी नहीं जाना था कि आखिर ये हैं कौन और मार्क्सवाद बला क्या है? अब सोचती हूँ तो कोई ऐसा टर्निंग पाईंट नहीं पाती, जहाँ से इस इंसान से पहला परिचय हुआ हो... बस, याद आता है तो इतना कि जिस उम्र में लड़कियों को जवान और खूबसूरत लड़कों के प्रति फेसिनेशन हुआ करता था, उस उम्र में मुझे मार्क्स और मार्क्सवाद फेसिनेट करने लगा था। और सच पूछें तो आज भी उस आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाई... अब भी व्यवस्था पर चलती बहस को अक्सर मार्क्सवाद की रिलेवेंसी पर कनक्लूड करती हूँ। यूँ मई दिवस या मजदूर दिवस का मार्क्स से कोई सीधा संबंध नहीं है, सूचना में सही है, लेकिन चेतना में तो वही है... मई दिवस मतलब मार्क्स का आह्वान... फिर वही बचपना...।
फिर लेनिन, चे, कास्त्रो और ह्युगो रियल हीरोज की लिस्ट में शामिल होने लगे और इंस्पायरिंग हीरो के तौर पर निकोलाई बुखारिन, ट्रॉटस्की, अंटोनियो ग्राम्शी, जॉर्ज लुकास और पूँजीवाद और अमेरिका विरोध करते हुए नॉम चोमस्की भी लिस्ट में आ गए। हर वो अंतर्राष्ट्रीय घटना, जिससे मार्क्सवाद का क्षरण हुआ, उसने निराश किया और हर वो घटना जिससे उस बुझती आग में चिंगारी भड़की उसने मुझे उत्साह से भर दिया। सोवियत संघ का पतन, पूर्वी यूरोप में मार्क्सवाद का खत्म होना और आखिर में इतिहास के अंत ही घोषणाओं और हाल ही में ह्युगो की मौत ने बुझा दिया और कास्त्रो का संघर्ष, लेटिन अमेरिका में ह्युगो शॉवेज का उदय... इटली, फ्रांस और जर्मनी के चुनावों में वामपंथियों की विजय के समाचार उत्साहित करते रहे। आज भी जबकि मार्क्सवाद सिर्फ विचारों में ही बचा है, जाने कैसे इसके हकीकत में ‘जिंदा’ होने की उम्मीद जिंदा है... भीतर। एक और बचपना...। लगता है इस बचपने से बुढ़ापे तक निज़ात नहीं है। मजदूर और मजदूरों से यूँ कभी कोई वास्ता नहीं रहा, लेकिन मार्क्स ने अपने विचारों से कोई सूत्र तो जोड़ा ही है... कुछ बातें जीवन भर रहती है, ज़हन में वैसी ही, जैसे बचपन में थी, उसी रंग-रूप-आकार में... कुछ को हम वैसे ही सहेजना भी चाहते हैं... बस इस बात के साथ कुछ ऐसा ही है। अब आप चाहे तो इसे भी कह सकते हैं … बचपना...

Wednesday, 13 March 2013

रिश्तों का प्रोटोकॉल... :-)




जानने का क्रम तो हर वक्त चलता ही रहता है, लेकिन हर बार का जानना समझ तक कब पहुँचेगा ये कहा नहीं जा सकता है। अब अंतर्राष्ट्रीय संबंध पढ़ने के दौरान जाना था कि चाहे दो देश युद्धरत हों, लेकिन उनके राजनयिक संबंध फिर भी बने रहते हैं। मतलब दो देशों के बीच युद्ध चल रहा है, लेकिन राजदूत दूसरे देश में उसी तरह कार्य करते रहते हैं, जैसे शांतिकाल में काम करते हैं।
डिप्लोमेसी के प्रोटोकॉल के तहत राजदूतों की वापसी संबंध खत्म होने का संकेत है। मतलब ये कदम बहुत गंभीर स्थितियों में ही उठाया जाता है। युद्ध से भी ज्यादा गंभीर है राजदूतों को वापस बुला लिया जाना... एक तथ्य था, जिसे जस-का-तस ग्रहण कर लिया।


ननिहाल चूँकि शहर से बाहर था, इसलिए ताईजी का मायका ही हमारा ननिहाल हुआ करता था। उस पर वहाँ थे हमउम्र बच्चे... अब ये अलग बात है कि ताईजी को लगता था कि मुझे छोड़कर दुनिया में हर बच्चा बदमाश है और मुझे परेशान करना हर बच्चे का एक-सूत्री कार्यक्रम ही है। इसलिए वे अपने भतीजों-भतीजियों से-जो कि मेरे हमउम्र हुआ करते थे और इसलिए उनके साथ खेलने का लालच भी हुआ करता था-दूर ही रखती थीं।
खैर थोड़े-थोड़े बड़े हुए तो सारों में ही जैसे समझ आ गई और लड़ाई-झगड़े कम हो गए। ताईजी को भी यकीन हो गया कि सारे बच्चों ने अपने कार्यक्रम में तब्दीली कर ली है, सो अब गाहे-ब-गाहे हम ‘मामा’ के घर में ही रहने लगे। तीन मंजिला मकान के हर फ्लौर पर एक परिवार रहता था... तीन भाईयों का परिवार जो था... आने-जाने का रास्ता एक ही था, इसलिए वैसा ‘सेपरेशन’ नहीं था, जैसा कि फ्लैट्स में हुआ करता था। फिर इतने सारे बर्तन थे तो हर दिन खड़कने की आवाजें आया करती थी। ‘छोटे’ बर्तनों के खड़कने से ज्यादा आवाज़ तो ‘बड़े’ बर्तनों के खड़कने की आया करती थी, लेकिन छोटों की दुनिया पर उसका कोई असर नहीं हुआ करता था।
खिचड़ी सारे बच्चों की पसंदीदा डिश हुआ करती थी। और ये तय था कि जिसके भी घर में खिचड़ी बननी हैं, सारे बच्चे उसी घर में धावा बोलेंगे। और ऐसा मंजर बहुत बार पेश आया कि किसी के घर में खिचड़ी खाने के लिए बच्चे जमा हुए हैं, बच्चे बहुत प्रेम औऱ चाव से खिचड़ी खा रहे हैं, लेकिन बच्चों की माँओं के बीच जमकर तकरार हो रही है। मतलब बच्चे एक-दूसरे को छेड़ भी रहे हैं, थाली में से मूँगफली के दाने या फिर मीठे अचार की फाँके चुराकर खा रहे हैं और मीठी-मीठी लड़ाईयाँ भी कर रहे हैं, लेकिन बड़ों की तकरार के प्रति बिल्कुल उदासीन है।

बचपन का ये किस्सा और फिर यूनिवर्सिटी में पढ़ा सबक….. ये समझ के किस सूत्र तक ले जा रहे हैं? डिप्लोमेसी ये कहती है कि संवाद हर सूरत में कायम रहना चाहिए... तमाम युद्धों और खराब हालात के बावजूद... क्योंकि बात से ही बात निकलती है। ये सूत्र व्यक्तिगत रिश्तों से लेकर देशों के बीच के रिश्तों पर भी समान रूप से लागू होती है। कह लें, निकाल लें मन की भड़ास... फिर बढ़े आगे... यदि रिश्ता बनाए रखना चाहते हैं तो... चुप रहने से गड़बड़ाते हैं रिश्ते, घुट जाती हैं भावनाएं और बंद हो जाते हैं, एक-दूसरे की ओर जाने वाले रास्ते... फिर...!





Wednesday, 6 March 2013

चलो बनाएँ अपना स्वर्ग




‘‘यदि ईश्वर ने ही औरतों के लिए यह जीवन रचा है तो फिर कहना होगा कि आपका ईश्वर सामंतवादी पुरुष है...’’ -जब ये कहा था उसने तो कई लोगों ने उसे घूरकर देखा था... माँ ने भी। जाहिर है ये ईश्वर की सर्वशक्तिमान सत्ता की कथित नीतियों पर ‘अन्याय’ का आरोप था। और ईश्वर पर आरोप कतई-कतई सह्य नहीं है।
धीरे-धीरे जब उसने समाज को और बारीकी से जानने की कोशिश की तो उसे लगा कि धर्म के बहाने हर कहीं औरतों को मर्यादा, शालीनता, कर्तव्यपरायणता और समर्पण की हिदायतें दी जाती हैं, पालन करने के लिए कभी दंड की धमकी, तो कभी आदर्श होने का प्रलोभन... हो सकता है ये विचार सख्त महिलावादी लगे लेकिन वो इस तरह से सोचती है क्या किया जा सकता है?
उसे नजर आता है कैसे लड़कियों को अच्छी लड़की बनने के लिए किस तरह से उदाहरण दिए जाते हैं। क्यों सावित्री-सत्यवान और रति-कामदेव की कथाएँ कही जाती है, क्यों लक्ष्मी-विष्णु के हर केलैंडर में लक्ष्मी, विष्णु के पैर दबाती नजर आती है... क्यों सीता-त्याग को राम की मर्यादा पुरुषोत्तम वाली छवि से महिमामंडित किया जाता है? क्यों कृष्ण राधा को छोड़कर चले जाते हैं... वो प्रेम तो एक शादीशुदा महिला से कर सकते थे, लेकिन विवाह नहीं कर सकते थे... वो सोचती है, क्यों...? जवाब था एक ही... ‘ईश्वर सामंतवादी पुरुष है।’ लेकिन एक दिन उसे लगा कि जिसे हम ईश्वर समझते हैं, दरअसल वो तो बड़ी दुनियावी कल्पना है... ईश्वर तो निराकार, निर्विकार है... यदि है तो...। तो अब तक ईश्वर के नाम पर जो कूड़ा-कबाड़ फैला हुआ है, वो तो इंसान की ‘लीला’ है। मतलब... कि ये सारा जो ईश्वर के नाम पर धर्म में हुआ करता है, वो सब तो इंसानी करामात है...कुछ पूर्वाग्रही, कुछ पीड़ित और बहुत सारे षडयंत्रकारी पुरुषों के पूर्वाग्रह, कुंठा और षड़यंत्र... मामला साफ तब हुआ जब उसने वर्तमान में विचारों के जंजाल और बचपन की स्मृति के निहितार्थों के बीच संबंध स्थापित किया।
याद तो नहीं कि किस धार्मिक ग्रंथ के चित्र उसे दिखाए जाते थे, लेकिन उसमें छपे वे चित्र उसे अब भी उसी तरह याद है, जैसे उसने उस किताब में अपने बचपन में देखें थे। नर्क के फोटो... एक ही पेज पर कभी तीन तो कभी चार फोटो... ले-आऊट भी बड़ा अटपटा...। किसी फोटो में कुछ राक्षस जलती भट्टी के आसपास खड़े हैं और भटटी पर बड़े से कड़ाह में तेल गर्म हो रहा है। उसमें कोई मनुष्य पड़ा रो रहा है... वो कल्पना करने की कोशिश किया करती थी कि उस गर्म तेल से कितनी जलन हो रही होगी..., फिर किसी में मनुष्य को सुए चुभोए जाते हुए भी दिखाया गया था और भी कई... उन फोटो में स्त्री-पुरुष का कोई भेद नजर नहीं आता था... गोयाकि नर्क तो दोनों के लिए एक-सा ही था। और स्वर्ग... ? ये सवाल जब उसने बचपन में ही किया था तो जवाब देने वाला गफ़लत में आ गया था। स्वर्ग उसमें ठंडी-ठंडी हवाएँ बहती है, झरने बहते हैं, खूबसूरत फूल खिलते हैं, मद्य (सीधे कहते हुए भावना अकड़ी जाती है- दारू...) और सुंदरी...। उसने मान लिया, लेकिन उस दिन जब उसने कड़ियाँ जोड़ी तो सवाल उठा – ‘ये सब तो पुरुषों के लिए हैं, हम महिलाओं के लिए स्वर्ग कैसा है।’ जवाब था ही नहीं तो मिलता कैसे...? बस यहीं से उसके दुख शुरू हो गए। महिलाओं के लिए तो स्वर्ग है ही नहीं, मतलब उसके लिए तो दोहरा नर्क है... एक जो धार्मिक कथाओं में है और दूसरा ‘पृथ्वीलोक’... ‘मृत्युलोक’...। तो नर्क में तो कोई अंतर नहीं है, हाँ अघोषित रूप से स्वर्ग तो सिर्फ पुरुषों के लिए ही है...।

तो आजकल वो लगी है, स्त्रियों के लिए स्वर्ग का ‘कंसेप्ट’ बनाने में... आइए जरा उसकी मदद कीजिए... ।

Thursday, 28 February 2013

....और एक मलाल



फिर एक साल
और
एक मलाल
बढ़ती जाती है
फेहरिस्त
उम्र की तरह
...............
क्या छूटा है
करने, सीखने,
जानने, जीने से
कैसे कम होंगे ये मलाल
..............................
फिर जन्म लेना चाहूँगी
इन्हीं मलालों के साथ
ताकि दूर कर सकूँ
शिकायतें जो
खुद से हैं
........................
लेकिन जब तक
ये नहीं होता
तब तक
फिर एक साल
और एक मलाल

Monday, 11 February 2013

ख्वाहिशों के 'स्पंज'-सी छुट्टी


एक शाम पहले ही टपकने लगती है
बूँदें...
'साथ' रहने की, खुद के करीब बैठ
जाने की...
मॉल में घूमने की, 'बीहड़' में भटक
जाने की...
थोड़ा-सा पढ़ने और बहुत कुछ को 'बना'
लेने की...
कुछ 'अच्छा' सुनने और फिर उसमें
डूब जाने की...
इकट्ठा होती रहती हैं ख्वाहिशें...
ख्वाहिशें... ख्वाहिशें...
शाम होते-होते बहुत कुछ होता है,
पूरी ताकत से निचोड़ लिया जाता है
छुट्टी का स्पंज...

फिर भी रह जाता है, बहुत कुछ
बचा... रह जाती है प्यास, जो
इंतजार करती है अगली छुटटी का

...और यूँ ही चलता रहता है प्यास और आस
का सफर...इसी तरह छुट्टी-दर-छुट्टी...

Sunday, 20 January 2013

...औऱ वो लौट आई है!

बहुत देर से दरवाजा थपथपाने की आहट हो रही थी, लेकिन लिहाफ की नर्म गुनगुनाहट से मोह हो गया और उस थपथपाहट को लगातार टालती रही, बहुत देर तक उसे अनसुना किया, लेकिन फिर रहा नहीं गया। उठकर दरवाजा खोला तो उत्तर से आने वाली बर्फीली हवा-सी वो सीधे उतर आई और धूप भरे आँगन में फैल गई। पहाड़ पर छाने वाले गीले-सीले कोहरे की तरह... और देखते ही देखते गुनगुना-सुनहरा आँगन हो गया उसी की तरह साँवला, ठंडा...उदास...। पिटारा खोलकर बैठी तो बचपन वाली टीन की पेटी से किताबों के अलावा निकलने वाला दीगर सामान बिखर गया... रंग-बिरंगी कंचे, पक्षियों के पक्ष, सूखे फूल और पत्तियाँ, नदियों के गोल-गोल पत्थर, समुद्र के सीप-शंख, कौड़ियाँ... बुने-अधबुने खयाल, सुबह-दोपहर-शाम-रात के खाली-सूने खोखे...। बार-बार ललचा रही थी अपने खजाने से... कोशिश तो की थी, दूरी बरतने की, लेकिन बचपन का प्यार ठाठें मार रहा था... फिर नहीं बच पाई उसके दुर्निवार आकर्षण से, दूरी बरतते-बरतते भी वो सरककर पास आ ही गई थी, पुराने-गहरे दोस्त की तरह घेर लिया था हर कोना...। अगरबत्ती की तरह सुलगती और महकती... नशे में डुबाती वो... लौट आई है, फिर से... वही उदासी... !