Friday, 19 August 2011

रोज शाम भविष्य में थोड़ा मर जाता हूँ...!



इतिहास निर्मित होने के दौर में इतिहास की गुत्थियों को जस-का-तस रखती किताब पढ़ना, क्या है ? - वस्तुस्थिति से मुँह मोड़ना! या फिर वर्तमान को इतिहास के संदर्भ से समझने की कोशिश करना...! ...पता नहीं! बहुत दिनों से अटका पड़ा पढ़ने का क्रम न जाने कैसे आज शुरू हुआ तो ओम थानवी की यात्रा संस्मरण (ऐतिहासिक-स्थल की यात्रा) मुअनजोदड़ो के पूरा होने का मुहूर्त बन ही गया। इस बीच अण्णा-आंदोलन-गतिरोध-भ्रष्टाचार और पक्ष-विपक्ष पर भी नजरें पड़ती रही।

जैसा कि होता है – खत्म होने पर हमेशा सवाल खड़ा होता है ‘औचित्य का’। यहाँ किताब को पढ़ने का। क्यों पढ़ी गई... ? जानना लक्ष्य था या फिर पढ़ना... यदि जानना लक्ष्य था तो क्या जान लिया और यदि पढ़ना ही लक्ष्य था तो यही क्यों? फिर सवालों का जंजाल... इसी में से निकलता है एक और पुराना सवाल जो गाहे-ब-गाहे जाग जाता है - ‘आखिर इतिहास पढ़ने-पढ़ाने का लक्ष्य क्या है?’, क्या वाकई हम इतिहास इसलिए पढ़ते हैं कि हम उससे सबक सीख सकें! आज तक हमने इतिहास से क्या सबक सीखे? अभी तो किसी ऐतिहासिक घटना पर हमारे इतिहासविद् और विशेषज्ञ निश्चित नहीं है। फिर अपने-अपने पूर्वाग्रह और उस आधार पर स्थापित सिद्धांत... ढेर सारी स्थापनाओं के प्रतिपादन और खंडन-मंडन के बाद भी अब तक इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सका कि 1. मुअनजोदड़ों के संस्थापक कौन थे और कहाँ से आए थे? 2. वैदिक सभ्यता ज्यादा पुरानी है या फिर मुअनजोदड़ो की! और 3. सभ्यता का अंत कैसे हुआ? अब तक लिपि पढ़ी नहीं जा सकी तो सभ्यता को जानने में कोई मदद नहीं मिली...। मान लिजिए कभी जान भी लें इन सारे और इनके जैसे और कई सारे सवालों के जवाब तो क्या फर्क पड़ेगा? क्या वर्तमान ज्यादा खुशनुमा बन जाएगा। आज तक कितनी सभ्यताओं, व्यवस्थाओं, राष्ट्रों, सरकारों, संस्थाओं और व्यक्तियों ने इतिहास से सबक ग्रहण किए हैं?

तो आखिर पढ़ ही लिए गए सारे दावे-प्रतिदावे, इतिहास को खोजने के ऐतिहासिक प्रयास ...तो... उससे क्या हुआ! क्या पाया?

शुरू हुआ खोने-पाने का शाश्वत हिसाब... भौतिक हो, जरूरी नहीं, लेकिन होता है। सफर में न हो तो सफर खत्म होने पर ... जीवन में न हो तो जीवन के अंत में होगा... चाहे हम कितना ही इंकार कर लें। दो और दो चार का गणित पीछा नहीं छोड़ता... हिसाब के रूप में न हो तो विश्लेषण के रूप में, होगा ही। और जब ये सवाल उठता है तो फिर अब तक हुए सारे कर्म अपना-अपना बही खाता लिए हाजिर हुए चले जाते हैं। हमारा भी हिसाब कर दो... हमारा भी कर दो... हमारा भी...। मतलब हिसाब से मुक्ति नहीं है। तो क्या यहीं से जुड़ते है अतीत-वर्तमान-भविष्य के सिरे...! ओम जी की ही किताब से अज्ञेय की कविता की पंक्तियाँ – ‘रोज सबेरे मैं थोड़ा-सा अतीत में जी लेता हूँ / क्योंकि रोज शाम को मैं थोड़ा-सा भविष्य में मर जाता हूँ।’

यही है चक्र... इतिहास को जानने का, वर्तमान को जीने का और भविष्य में मरने का... पैदा होने, जीने और मरने का...:(



Friday, 12 August 2011

बड़े नोट-सा दिन... रेजगारी-सी रात...!



दिन तो महीने के अंत में पगार की तरह फटाफट खर्च हो जाता। आखिर में हथेली में फुटकर.. रेजगारी की तरह रात बच जाती है। सब कुछ खर्च करने के बाद बची रेजगारी कितनी कीमती होती है ये तो खत्म हुई सेलैरी के बाद ही जाना जा सकता है। तो बची हुई रेजगारी को दाँत से पकड़ते हुए हर रात किफायत बरतने की जद्दोजहद के साथ आती और फिसल जाती है। बचाते-बचाते भी फिजूलखर्ची हो ही जाती थी।

उस रात दिन भर की दुनियादारी झड़ गई थी औऱ रात खालिस होकर उतरी थी। पूनम की तरफ बढ़ता चाँद अपनी रूठी चाँदनी से रात को रोशन करने की कोशिश ही कर रहा था कि न जाने कहाँ से भूरी-लाल बदली ने उसे अपनी आगोश में समेट लिया था। रात गाढ़ी हो चली थी, न चाहते हुए भी एक-एक कर सिक्के खर्च हुए जा रहे थे। अचानक जैसे आखिरी बचे चंद सिक्कों की कीमत का खयाल आ गया हो और मुट्ठी तो पूरी ताकत से भींच लिया...। बाहर बारिश जैसे सितार के तारों को छेड़ रही थी और अंदर रेडियो भी जैसे राग नॉस्टेल्जिया बजा रहा हो। घर आजा घिर आए, बदरा साँवरिया... यादों के कबाड़ से कुछ बहुत ही मजेदार चीजें निकल आईं जैसे - बचपन में मोटी रही लड़की का नाम भाइयों ने मोटा आलू कर दिया और उसकी शादी तक हम सब उसे मोटा आलू ही कहते रहे, इसी तरह मोटी-नाक वाले लड़के का नाम भजिया आलू रख दिया और बाद में दोनों के नामों को एक साथ इस्तेमाल करते हुए मोटा आलू और भजिया आलू कह-कह कर चिढ़ाते रहते... घिर-घिर आई बदरिया कारी... यादों की पिटारी में कई सारी कबाड़ है, कई तो ऐसी कि उसे हाथ लगाते ही कहीं अंदर काँटे गड़ने लगे। सुनाते-सुनाते ऐसी हँसी चली कि हँसते-हँसते आँसू ही आ गए... गुजरा जमाना बचपन का... बाँहें गर्दन के नीचे से गुजरी, प्यार और आश्वासन की थपकी दिमाग के सनसनाते हुए तंतुओं पर एक गति से पड़ने लगी, दिमाग थोड़ा-सा शिथिल हुआ... एक-एक कर सिक्के खत्म होते जा रहे हैं... रेडियो बजा रहा है शराबी-शराबी ये सावन का मौसम... बस यूँ ही-सा एक विचार आया... कितना भी सुख हो, कितना भी दुख... आखिर तो एक दिन सब खत्म होना ही है... एक दिन तो मर ही जाना है... तो फिर ये स्साली जिंदगी सही क्यों नहीं जाती है...?

सावन के झूले पड़े, तुम चले आओ... कहते हैं कि कितनी भी जरूरत हो एक सिक्का हमेशा बचा कर रखना चाहिए, उसे बरकती सिक्का कहते हैं, फिर वही रात है, फिर वही रात है ख्वाब की... तो एक दिन सब कुछ के खत्म हो जाने के विचार के बाद भी उस आखिरी सिक्के को हथेली में मुट्ठी भींच कर बचा लिया कि कल फिर से नई शुरुआत होगी... बरकत बनी रहेगी...।