Wednesday, 30 March 2011

उगा है गाँठों का झुरमुट


कभी-कभी ऐसे ही बेवजह कुछ उलझ जाता है कि कोई सिऱा पकडाई में ही नहीं आता। सब कुछ सहज होता है, लेकिन कोई गाँठ ऐसे उभर आती है, जैसे वो वहीं थी, कई-कई बरस से, और हमारी नजर ही नहीं पड़ी उस पर और इस बार उस नाराज बच्चे की तरह ऐंठी हुई है, जिसे डाँट दिया हो और उसकी नाराजगी को भूल कर सब लोग काम पर लग गए हो। बहुत देर इंतजार करने के बाद वो कुछ ऐसा करे, जिससे सबका ध्यान उसकी ओर जाए। लेकिन जब ध्यान चला जाए और उसे मनाने के प्रयास किए जाए, तो उसकी अकड़ कम होने की बजाए कुछ और बढ़ जाए। पुरानी गाँठे, पुराने ज़ख्मों की तरह अड़ियल हो जाती है, खुलने में ही नहीं आती है। जितनी कोशिश करो, उतनी ही कड़ी होती चली जाती है।
कुछ ताजा, कुछ भूला-भटका, कुछ कहीं अटका और कुछ जहन में कहीं उलझा... सब मिलकर धमाचौकड़ी कर रहे हैं और हमारे पास सिवा उसे निस्संग होकर देखने के कोई और उपाय ही नहीं हो। एक अच्छे-से दिन के आखिरी सिरे पर उभर आया वो गूमड़... बिना किसी तर्क, बिना किसी कारण के। उभरी हुई गाँठ नजर आ रही है, गीले-उलझे धागों का गुँझलक भी, बस नहीं नजर आ रहा है तो कोई सिरा...। यूँ बेसबब कोई इस तरह से बेचैन होता है क्या? अक्सर अपनी बेचैनी पर इसी तरह के सवाल से रूबरू होते हैं, हो सकता है इस बेचैनी का कोई सिरा कहीं गहरे अतल में अटका हुआ हो, हो सकता है कि इसका कोई सिरा ही न हो, यूँ इस तरह के कयासों का कोई फायदा है क्या?
ये पहली बार नहीं है और शायद आखिरी बार भी नहीं... कभी-कभी इसकी जड़ें कहीं दूर अतीत में जाकर मिलती है तो कभी आज ही में कहीं अटकी हुई और कभी-कभी तो भविष्य का अज्ञात तक आकर इसमें जुड़ जाता है, कितनी ही कोशिश कर लें कि आज को ही देखें... अभी को, इसी पल को, लेकिन हमारी कोशिशों, चाहने और सोचने से परे चलता है ‘अंतर’ का संसार...। यहाँ कोई तर्क, कोई विचार, प्रयास, बहलाना, फुसलाना या फिर बहकाना कुछ भी नहीं चलता है। यहाँ के नियम तो अज्ञात है, लेकिन उल्लंघन पर सजा मिलती है कड़ी। हम ये नहीं कह सकते हैं कि – ‘यहाँ नो इंट्री का साइनबोर्ड नहीं है, ये हमारी गलती नहीं है।’ बस गलती की सजा मिलेगी ही मिलेगी, चाहे हम ये न जाने की गलती क्या है? तो अब सचमुच नहीं पता कि आखिर किस नियम का उल्लंघन हमने किया है, लेकिन सजा भोग रहे हैं। और ये भी नहीं जानते हैं कि सजा की अवधि क्या होगी...

Thursday, 24 March 2011

दर्द का हद से गुज़रना है, दवा हो जाना


पूरे सिर में दर्द की हल्की-पतली चादर-सी फैल गई थी... मैं ये जानती थी कि वो चादर धीरे-धीरे सिकुड़ने लगेगी और एक हिस्से में जमा हो जाएगी... अपनी सिलवटों के साथ, फिर भी मैंने उसे फैले रहने दिया। अक्सर मुझे लगता है कि शरीर और जहन में थोड़े-बहुत दर्द का होना जीने में... या अच्छे से जीने में कोई बड़ी बाधा नहीं है। कभी यूँ भी कि चलिए कुछ तो हुआ है... (हो सकता है ये बचकाना लगे, लेकिन है कुछ ऐसा ही)। इसी दर्द के साथ दिन भर काम चलता रहा। कभी जब कुछ महसूसने की फुर्सत पाई तो लगा कि धीरे-धीरे चादर के सिकुड़ने का क्रम चल रहा है। शाम होते-होते तक सिर के बाँई ओर चादर सिकुड़कर इकट्ठी हो गई थी और दर्द का घनत्व भी बढ़ गया था। फिर थोड़ी देर बाद बाँई कनपटी पर दर्द की हल्की-हल्की दस्तक होने लगी थी, लेकिन जैसे दर्द को महत्वहीन करने की जिद्द-सी सवार हो चली थी, कि उस तरफ से अपना ध्यान ही हटा लिया था।
घर पहुँचने के बाद भी उसे दरकिनार कर सारे जरूरी काम यथावत चलते रहे... यहाँ तक कि टीवी देखना और पढ़ने का क्रम भी बदस्तूर रहा। सिरदर्द है, इसका कोई जिक्र भी नहीं किया, क्योंकि जानती हूँ कि जिक्र होते ही चिंताओं का सिलसिला शुरू हो जाएगा और वो खत्म होगा पेनकिलर पर... आज पता नहीं क्यों पेनकिलर लेने का मन नहीं था। तो रात तक दस्तक की फ्रीक्वेंसी बढ़ गई थी और आघात भी तेज होने लगे थे। एक दिन यूँ ही ये विचार आया था कि क्यों न देखा जाए कि यदि दर्द में दर्दनिवारक नहीं ली जाए तो ये कब तक रहेगा और कैसा रहेगा। गोया कि अपनी या फिर अपने दर्द की परीक्षा ही लेने का विचार चला आया था और आज शायद परीक्षा का मन ही बना चुके थे। जिद्द के शेर की सवारी थी, कई बार आजमा चुकी हूँ, ज्यादातर तो जीती ही हूँ, लेकिन कई बार पटखनी भी खाई है, आज भी यही कवायद...। सारी रात कभी नींद जीती तो कभी दर्द... कभी नींद छा जाती और सब कुछ नीचे चला जाता तो कभी दर्द छा जाता और नींद चली जाती, लेकिन इतना तय है दर्द ने नींद को अपने शिखर तक पहुँचने से रोके रखा, जैसे नींद और दर्द के बीच भी हार-जीत का खेल चल रहा था और जैसा कि होता आया है, जो फिटेस्ट है जीतना तो उसे ही है तो दर्द जीत गया और सुबह होते-न-होते पेनकिलर तक हाथ पहुँच ही गया। आज मिली पटखनी...। इस खटरपटर में राजेश की नींद भी खुल गई और फिर शुरू हुआ चिंता, दुख और झल्लाहट का क्रम... – कबसे था दर्द? जब पता है कि बिना पेनकिलर के दर्द नहीं जाता तो उसे बढ़ने ही क्यों देती हो...? मुझे क्यों नहीं बताया? आदि-आदि... ये भी शगल ही है, जब दवाई ली तो घड़ी देखी- समय क्या हो रहा है? सुबह के पौने पाँच बज रहे थे। अरे हाँ! सबसे महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि आज दफ्तर से छुट्टी ली है, मतलब दर्द को सहलाने की लक्जरी की जा सकती थी और वो की गई।
खैर सुबह चाय के कप के साथ रात के दर्द की चर्चा थी। यार, क्यों करती हो ऐसा, जब दर्द शुरू हुआ था, तभी उसका इलाज क्यों नहीं कर लेती हो? लेक्चर चल रहा था और मैं गर्दन झुकाए सुने जा रही थी, आखिर उसके पीछे कोई समझदार तर्क जो नहीं था। जो था वो बेहद बचकानी जिद्द थी... शुमोना ग़ालिब को गा रही थी...
इशरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है, दवा हो जाना...।
अचानक बेवकूफ़ाना मासूमियत से भरकर कह डाला – मैं देखना चाहती थी कि वो दर्द कैसा हुआ करता है जो खुद दवा हो जाता है। राजेश ठहाका लगाकर हँसे – पागल... ग़ालिब ने दिल के दर्द की बात कही है, बदन के नहीं...। अब मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था...।

Friday, 18 March 2011

अरे ! होली के दिन( ही )क्यों पानी बचाएं ….



मीठी-सी खुनक वाली उमंग भरी सुबह थी, चाय का कप और अखबार...। हर सुबह जैसा ही क्रम..., अखबारों में खबरों का स्वरूप भी हर दिन जैसा ही था, लेकिन मन जैसे कुछ और चाह रहा था, तभी तो अखबार पढ़ते-पढ़ते मन में एकाएक गहरी निराशा भर गई। विकीलिक्स के खुलासे, बाचा की मौत का गहराता रहस्य, शहर में अफरा-तफरी, जापान में प्राकृतिक के बाद अब परमाणु आपदा... जो भी पढ़ा सब कुछ नकारात्मक। यूँ ये हर दिन ही होता है, लेकिन किसी दिन यदि मन कुछ उड़ना चाहे, कुछ अच्छा जानना-पढ़ना चाहे तो... तो आज कुछ ऐसा ही हुआ था।
तो अखबारों को एक तरफ सरका दिया और घड़ी के अनुशासन को अनदेखा कर अपनी खिड़की से दिखती दुनिया पर तेजी से नजरें घुमाने लगे...। जितनी चंचलता से मन, उतनी ही गति से आँखें...। विचारों का तेज प्रवाह था और कहीं कोई बंधन नहीं था, गोया कि होली हो... तभी तो लौट कर फिर अखबार की खबरों पर ठहर गए। होली की पृष्ठभूमि में हमारे इलाके के अखबार अभियान चला रहे हैं, पानी बचाओ...। अपने अभियान की गंभीरता को चमकाने के लिए वो दुनिया में पानी की कमी से जुड़ी सूचनाएँ, लेख, चल रही योजनाएँ और आँकड़ों का प्रकाशन कर रहे हैं, औऱ भविष्य की एक भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं, जैसे कि एक होली के दिन यदि पानी का उपयोग किया तो धरती जलविहीन हो जाएगी, अखबारों के सारे प्रयासों, विश्लेषणों और अनुमानों से तो ऐसा लगा कि बस अभी धरती जल जाएगी।
प्रकृति तो होली की तैयारी करती लग रही है। मौसम की खुनक कुछ कम हुई है, चटख रंग के फूल खिलने लगे हैं, पलाश के सिरे दहक रहे हैं, आम पर बौर और नीम पर निंबोली महकने लगी है। बाजार में भी हर तरफ रंग नजर आ रहे है। होलिका और प्रह्लाद के प्रसंग की पृष्ठभूमि में भी होली की कल्पना बस वसंत की विदाई और रबी की फसल पकने की खुशी की अभिव्यक्ति ही लगती है। कारण स्पष्ट है कि नेकी-बदी के इतने गंभीर आख्यान के बाद मस्ती और रंग का समीकरण बड़ा बेमेल-सा लगता है, कुछ जोड़ा हुआ सा... मतलब होलिका दहन अलग और रंगों का त्योहार अलग...।
हो सकता है होली के पीछे और भी कोई पौराणिक आख्यान हो, यूँ कृष्ण का होली से करीबी रिश्ता है और सच पूछो तो उन्हीं का हो सकता है, लोक-गीतों में तो राम से भी है, अब ये अलग बात है कि राम की इमेज हुरियारों के आसपास भी नहीं फटकती है। ऐसा लगता है कि होली की कल्पना किसी मनोवैज्ञानिक ने की होगी। वो यकीनन ट्रेंड मनोवैज्ञानिक तो नहीं ही रहा होगा, लेकिन उसे मानव मन की गहरी समझ होगी, थोड़ा उतर कर सोचो तो लगता है कि होली का मतलब है मस्ती... उमंग, उल्लास... साल भर में एक दिन ‘खालिस’ हो जाने की सुविधा... स्वतंत्रता...। थोड़ा आगे चले तो बेलौस और (माफ किजिए) गैर जिम्मेदार होने की सहूलियत...। साल में एक दिन सारे बंधनों को तोड़कर निर्बंध होने की आजादी, अपने अंदर की विकृति को निकाल फेंकने... व्यक्त करने का दिन... बहा देने की घड़ी (अब चाहे इस पर लेक्चर चलते रहे कि होली को शालीनता से मनाए, लेकिन कहीं न कहीं होली के पीछे यही मनोविज्ञान काम करता है।) तो अब यदि होली में मस्ती नहीं हो लापरवाही नहीं हो तो फिर उत्सव का मतलब ही क्या है? मतलब कि एक होली के लिए ही पानी बचाओ का नारा, बड़ा बेतुका और कृत्रिम-सा लगा... ।
पानी की कीमत करना बच्चों को घुट्टी में पिलाया जाना चाहिए, इसके लिए किसी होली या गर्मी में पानी की किल्लत का मोहताज होने की कतई जरूरत नहीं है। तभी तो बच्चे समझ पाएँगे कि ये समय और जीवन से भी कीमती है, क्योंकि पानी है तो ही जीवन है और जीवन है तो हमारे लिए समय का अस्तित्व...। अरे, अभियान तो ये चलाया जाए कि पानी की कीमत सिर्फ गर्मियों में या उस वक्त ही नहीं समझें जिस वक्त कमी हो, पानी का मूल्य तब ज्यादा समझें जब इफ़रात हो।
तो फिर... होली? अरे... होली मनाए जमकर, लेकिन खुद से एक वादा करें कि पानी को धन से भी ज्यादा किफायत से खर्च करेंगे, सिर्फ तभी नहीं, जब पानी की समस्या हो, तब भी जब अथाह पानी हो।
सभी को होली की शुभकामना

Monday, 7 March 2011

क्रमशः मनाली



मनु-आलय... यानी मनाली
मनु हमारे आदि पुरुष हैं और यहाँ की किंवदंतियों के हिसाब से सृष्टि के प्रलय के बाद मनु अपनी नाव सहित यहीं आकर रूके थे। रूके होंगे... एक तो हिमालय और दूसरा सृष्टि के पुर्नसृजन के लिए इससे बेहतर जगह कोई हो सकती है क्या... यदि प्रलय सिर्फ भारतीय उप-महाद्वीप में ही आया हो तो... ।
अब सृष्टि के पुर्नसृजन के किस्से भारतीय पुराणों, इस्लाम और यहाँ तक कि ईसाईयों में भी एक ही तरह के हैं... हमारे लिए मनु इस्लाम और ईसाईयों के लिए वो नूह हुए... तो मनु मंदिर के बारे में उत्सुकता गहरी थी। साढ़े तीन किमी का रास्ता तय कर जब हम मनु मंदिर के पास पहुँचे तो लगा कि हम हकीकत में उसी काल में आ पहुँचे हैं। गाय-बकरियों के बीच...। यहाँ पहुँच कर एकबारगी विश्वास आ गया कि जरूर मनु महाराज अपनी नाव लेकर यहीं आए होंगे, यहीं उन्हें श्रद्धा भी मिली होगी... लेकिन ईड़ा...? वो तो मैदानी ही होगी... क्यों... चलिए छोड़िए इस बेकार के विचार को...।
धीरे-धीरे लौटने का समय करीब आने लगा था... एक-साथ दो चीजें अंदर चल रही थी, प्रकृति से दूर चले जाने इस सौंदर्य से अलग हो जाने की टीस तो अपने घर लौटने की उत्कंठा... कोई जगह चाहे स्वर्ग-सी सुंदर हो, लेकिन आखिर अपना घर, अपना घर होता है ना... !
तो सबसे खूबसूरत जगह रोहतांग दर्रा ... हम खूबसूरत चीजों को बचाकर रखते हैं खूबसूरत दिनों के लिए... इस बीच दो बार सुन चुके थे कि रोहतांग बंद है, अब तो चार दिन गुजर चुके हैं बर्फ गिरे... अब तो रास्ता खुल ही गया होगा...? लेकिन नहीं... रोहतांग तो गर्मियों में ही खुलता है, अभी बर्फ का मैदान घुमना हो तो सोलांग वैली जाना पड़ेगा।
सोलांग... नमक का मैदान

सोलांग वैली मनाली से मात्र 16 किमी दूर है। वहाँ पेड़-पौधे नहीं है, बस हर तरफ चकाचौंध सफेदी है। जिस दिन हम सोलांग के मैदान पर पहुँचे उस दिन सूरज भी आलस छोड़ कर बाहर आ चुका था। उस बर्फ... नमक के मैदान पर सूर्य की किरणों से जो रिफ्लेक्शन पैदा हो रहा था, उससे परेशानी हो रही थी। वो मैदान असल में मैदान था, नर्म बर्फ में पैर धँस रहे थे, यहाँ स्कीईंग, पैराग्लाईडिंग, आईस स्कूटर और पता नहीं कौन-कौन से खेल चल रहे थे। पर्यटकों का मेला-सा लगा हुआ था। बाजार भी था, लेकिन बर्फ और धूप ने मिलकर आँखों को चौंधिया दिया था। वहाँ रहने से ज्यादा मजेदार वहाँ के फोटो देखना लगा।
... और घर की ओर

अंतिम दिन था... वन विहार होटल के सामने ही था... बाहर से दिखता था कि यहाँ देवदार का जंगल होगा, लेकिन ये अहसास नहीं था कि ब्यास भी यहीं से बहकर निकलती होगी। दिल्ली के लिए बस 3.30 पर थी और इस तरह लगभग आधा दिन था। इसमें मोनेस्ट्री देखी और वन विहार भी। वन विहार देवदार का घना-सा जंगल है और उसके पीछे से ब्यास नदी बह रही है। एक बार फिर पहाड़ से उतरती नदी... ग्रामीण... खालिस... अनगढ़ सौंदर्य... देखने और भोगने को मिला... हूक उठी यदि गर्मी होती तो क्या हमारे स्पर्श के बिना यूँ ही पानी बहता रह सकता था, लेकिन अभी... नहीं हाथ ड़ाल कर देखा था... बर्फ-सा ठंडा पानी थी, गर्मियों की तिस्ता भी याद आई थी, और हाँ पार्वती भी तो...। एकाध और आसपास की जगह देखी और लिजिए बारिश होने लगी। हमें लगा, जैसे हमारा स्वागत हुआ, हो सकता हो वैसी ही विदाई भी हो... मौसम बहुत सर्द हो गया। पिछले नौ दिनों में इतना सर्द नहीं हुआ था। बस में बैठे हुए उसके चलने की दुआ करने लगे थे... जब तक हमारी बस चली तब तक बस बूँदे ही बरस रही थी, बादल नहीं उतरे थे विदाई में...।

Sunday, 6 March 2011

पुनश्चः मनाली

सौंदर्य निरापद नहीं होता





कुनमुनाते हुए जब बाहर निकले तो सूरज हल्के-हल्के मुस्कुरा रहा था। मॉल रोड पर टोनी के चाय के स्टॉल पर पहुँचे तो नजारा ही दूसरा था। बदले मौसम का असर नजर रहा था। पर्यटक तो कम थे लेकिन स्थानीय लोग झुंड के झुंड बनाकर सूरज का स्वागत करते नजर रहे थे... लगा कि इस मौसम में यहाँ के लोग सूरज के निकलने को जरूर उत्सव की तरह मनाते होंगे। जहाँ से गाड़ियाँ आती-जाती हैं, वहाँ से तो बर्फ साफ की जा चुकी थी, लेकिन मनाली मॉल रोड पर वाहनों पर प्रतिबंध है, इसलिए यहाँ तो लोगों से चलने से बर्फ जम चुकी थी, जहाँ से ज्यादा आवाजाही थी, वहाँ बर्फ थो़ड़ी पिघलने भी लगी थी। याक मॉल रोड पर चुके थे और पर्यटक उन पर बैठकर फोटो खिंचवा रहे थे। हर तरफ रौनक नजर रही थी। उष्मा की रौनक...



खाने के बाद मीठी से नींद लेकर जब शाम की चाय के लिए बाहर आए, तो हल्की फुहारें शुरू हो चुकी थी। गर्म चाय का गिलास हाथ में लेकर आसमान की तरफ नजरें उठाई थी, ये जानने के लिए कि आज का इरादा क्या है कि बादलों की चिंदियाँ उतरती नजर आने लगी, छाता खोलकर मॉल रोड के अंतिम सिरे की तरफ बढ़ गए। धीरे-धीरे स्थानीय लोग और पर्यटक सभी गायब होने लगे... बादल अब कतरनों में बरसने लगे। छाते हटा दिए थे, सिर पर रूई की तरह ठहरने लगी थी बर्फ... हथेली में लेने का हौसला दिखाया तो, लेकिन ऊनी दस्तानों के अंदर जब पिघल कर उतरी तो सिहरन दौड़ने लगी... तुरंत हाथ खींच लिए। पागलपन यूँ कि कभी बर्फ समेटे तो कभी समय को थाम लेने की बेतुकी-सी हूक उठे... रंग-बिरंगी दुनिया पर सफेदी छाने लगी थी... धीरे-धीरे सब कुछ सफेद हो गया था, श्वेत, धवल, उज्जवल... तभी एक स्थानीय युवक ने पूछाआपका फोटो ले सकता हूँ?

क्यों नहीं, लेकिन एक शर्त है, आपको भी हमारे फोटो खींचने पड़ेंगे।

जरूर...



फोटो खींचने के दौरान उसका साथी दुकानदार कश्मीरी युवक भी खड़ा हुआ, कहने लगातंग चुके हैं, पिछले बीस दिनों से रोज यही-यही हो रहा है। किसी एक दिन खूब बरस जाए और खत्म हो जाए... ऐसा तो नहीं... रोज-रोज बस यही।

अरे... कहाँ तो हम इसे ही थामने की नामुमकिन-सी इच्छा को दबा रहे हैं और ये तंग चुका है। तभी लगा कि सौंदर्य भी निरापद नहीं होता... ये भी तो आपदा है...

जब तीसरा चक्कर लगाकर लौटे तो देखा कि वो दोनों युवक और उसके साथी खुले से मॉल रोड पर बर्फ से खेल रहे हैं और लगा कि मुश्किलों में भी जिंदगी बहकर ही जाती है। कोई भी क्षण स्थायी सच नहीं होता है, हर क्षण का सच बदलता है... अरे... फिर से वही। ठंड बढ़ने लगी थी, इसलिए अब लौटना तो था ही... खत्म होना भी तो सच है, चाहे जीवन हो, सफर हो या फिर आनंद...

हिडिंबा और आस्था का प्रवाह

ये हम हमेशा करते हैं, कि जहाँ-जहाँ आसानी से चल कर जाया जा सके, वहाँ पैदल ही जाते हैं। कहीं भी पहुँचते ही वहाँ की ट्रेवल गाईड और नक्शा जरूर खरीदते हैं, ताकि उस जगह को थोड़ा ज्यादा जान और समझ सके। तो मॉल रोड से हिडिंबा मंदिर (अब वहाँ तो उसे हिडिंबा देवी मंदिर कहा जाता है, लेकिन हमारे लिए तो वो राक्षसी है ना...!) लगभग डेढ़ किमी दूर है और वहाँ बहुत आराम से पैदल चलकर जाया जा सकता है। बर्फ की सड़क थी और बर्फ के ही पेड़-पौधे... क्लब हाउस जाने वाले रास्ते से बाँई ओर जाने वाली सड़क हिडिंबा देवी मंदिर की ओर जाती है। थोड़ी सीढ़ियाँ भी चढ़नी पड़ती है। मंदिर को देखकर अनायास मनोहर श्याम जोशी और शिवानी के उपन्यासों में वर्णित हिमाचल के मंदिरों की याद गई। बहुत ही साधारण मंदिर, लेकिन उसकी असाधारणता थी, सफेद बर्फ... हर तरफ बस बर्फ ही बर्फ.... टीन की छत वाले लीपे हुए फर्श पर एक तरफ हवन चल रहा था, स्थानीय लोग बड़ी श्रद्धा से अंदर जाकर आराधना कर रहे थे... लगा कि हम भारतीयों के अंदर आस्था किस कदर बहती है कि देवी आराधना के लिए उन्हें तो दुर्गा की दरकार है, सरस्वती या काली की, हिडिंबा भी चलेगी। खैर हमें तो लगा कि यहाँ आकर ही पूरा मनाली घुम लिया। देवदार के पेड़ों पर जमी बर्फ यूँ लग रही थी जैसे ये बर्फ के ही पेड़ हो... वैसे पैदल 3 किमी चलना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, लेकिन रबर के जूते पहन कर बर्फ में चलना खासा थकाने वाला साबित हुआ। दोपहर में खासी गहरी नींद आई... रात को जब पिघलती बर्फ पर चहलकदमी कर रहे थे, तब आसमान में पूरा चाँद दिखाई दिया... साफ आसमान पर चाँद यूँ लग रहा था जैसे ये भी बर्फ का ही हो...





यहाँ आए तीन पूरे दिन बीत गए थे। अब घुमने में थोड़ी तेजी दिखानी होगी। अगले दिन मणिकर्ण पहुँच गए। कुल्लू... हुड़कचुल्लू (राजेश ने बाद में कुल्लू को देखकर ये कविता लिखी थी) से और 35 किमी दूर मणिकर्ण एक गुरुद्वारा है, लेकिन वहाँ जाने का सबब गंधक के चश्मे हैं। चावल की पोटली लेकर गंधक के पानी में थोड़ी देर रखी... बुलबुले उठाता उबलता प्राकृतिक पानी... धुआँ ही धुआँ... साथ ही पहाड़ों से उतरती पार्वती भी...

जब गुरुद्वारे की तरफ बढ़े तो सीढ़ियाँ चढ़े तो एक बुजुर्ग सरदारजी ने पके चावल की पोटली देखकर अपनी दुकान से एक पोलीथिन दी राजेश को और ये कहकर गले लगा लियाबड़ी दमदार पर्सनेलिटी है साहब आपकी...

अंदर बहुत भीगा-भीगा-सा कुछ बह निकला। हम सौजन्यता वश उनकी दुकान का सामान देखने लगे। एक कड़ा पसंद आया तो उन्होंने सूखे प्रसाद का पाउच भी पकड़ा दिया। जब पैसे दिए तो उन्होंने बहुत अपराध से भरकर कहाअरे मैंने तो आपसे भी दुकानदारी कर ली। आदतन आते इस विचार को हमने झटक दिया कि शायद ये उनकी दुकानदारी का स्टाइल होगा... मानसिक प्रदूषण से कितना और कैसे बचे?

वशिष्ठ मंदिर

लिजिए लगता है कि सारे ही पौराणिक पात्र यहाँ से रिश्ता रखते हैं। हिडिंबा की वजह से भीम तो खैर यहाँ आए ही होंगे... वहीं उपर ही घटोत्कच का भी मंदिर है। महाभारत का मसाला तो है ही रामायण का भी है। वशिष्ठ मंदिर में भी गंधक का चश्मा है, बताने वाले ने बताया कि यहाँ तो पानी में गंधक के क्रिस्टल भी नजर आते हैं, लेकिन वहाँ का फर्श इतना ठंडा था और जूते उतार कर जाने की बाध्यता में हम ये साहस नहीं दिखा सके। गए तो यहाँ ऑटो से लेकिन लौटे पैदल... ब्यास नदी के किनारे-किनारे हायवे से चलते हुए पहाड़ों और उन देवदारों पर जमी बर्फ को निहारते, अभिभूत होते थके-हारे लौटे, लेकिन आनंद लेकर...

कुल्लू... हुड़कचुल्लू

जब से आए हैं तब से ही ये सवाल रह-रहकर परेशान कर रहा था कि मनाली तो खैर बहुत खूबसूरत है, लेकिन इसके साथ कुल्लू क्यों जुड़ता है। जबकि हमारे टैक्सी ड्रायवर ने हमें बताया कि कुल्लू में तो बर्फबारी भी नहीं होती है। तो ये देखने के लिए कि आखिर कुल्लू में क्या है, बहस करते-करते पहुँच गए। कुल्लू पहुँचे तो 6 दिनों में पहली बार फ्रेश ब्लू कलर का आसमान देखा... शायद सूरज के साथ आसमान और निखर जाता हो। और तो कुछ वहाँ था नहीं, सिवा कल-कल करती ब्यास नदी के...