Wednesday, 26 January 2011

ये दुनिया ऊँटपटाँगा....


हम अपने पड़ोसी के कुत्तों और रेडियो दोनों से परेशान रहते हैं... दिन में जोर-जोर से रेडियो बजता है और रात में जोर-जोर से कुत्ते भौंकते हैं। मतलब दिन-रात की परेशानी... ड्रायवर इसलिए परेशान है कि वो गाड़ी साफ करता है और कुत्ते आसपास मँडराते हैं और गंदा कर देते हैं। वो थोड़ा है भी विशेष... महीने के बीच में ही घोषणा कर दी कि – बस अगले महीने और आपके साथ काम करूँगा... फिर मैं आपके साथ काम नहीं कर पाऊँगा।
लगा कि एकाएक बड़ी मुसीबत में आ फँसे। पूछा – क्यों भाई?
जवाब मिला – कुछ खास नहीं बस अब मैं ड्रायवरी करना ही नहीं चाहता।
एक बार और कुरेदा... तब भी जवाब वही मिला। हमारा ईगो भी ऐंठ में आ गया। ठीक है, डेढ़ महीना है, हम ही सीख लेंगे गाड़ी... थोड़ा ठंडा हुआ तो... ठीक है जैसे पहले जाते थे, वैसे ही जाएँगें, ऊँ..ह..ह शहर में ड्रायवरों की कोई कमी तो है नहीं...एक ढूँढों तो हजार मिलेंगे... साहब हो रहे हैं ड्रायवरी नहीं करेंगे तो क्या करेंगे... पढ़े लिखे हैं क्या कि कहीं और कोई और काम मिल जाएँगें... आदि-आदि...। शाम को घर पहुँचकर जो खबर सुनाई तो एक बार फिर धमक सुनाई दी। फिर वही सवाल, वही जवाब... मान लिया, भाई छोड़ेगा ही। तीन-चार दिन बाद जब हमारे ईगो की ऐंठन कम हुई तो फिर प्यार से फुसला कर पूछा। जवाब ने जैसे आसमान से गिरा दिया।
जवाब मिला – मैं छुट्टी नहीं ले पाता हूँ।
लेकिन हमने तो कभी आपको छुट्टी के लिए इंकार नहीं किया।
हाँ, लेकिन आप छुट्टी के पैसे नहीं काटते हैं ना, तो मैं छुट्टी नहीं ले पाता हूँ। राजेश और मैंने एक-दूसरे को चौंक कर देखा... इसका क्या? याद आया पिछले चार महीनों में अपनी बीमारी और पिता की मौत पर वह 15-15 दिनों की छुट्टी ले चुका था, उसे छुट्टी के पैसे देने के पीछे भी हमारी सोच कोई मानवतावादी या फिर सहानुभूतिपूर्ण नहीं थी। बस जो हमें मिलता है, हम उसे आगे बढ़ा रहे थे। मतलब हमारे अपने वर्क प्लेस से हमें भी साल भर में कुछ निश्चित छुट्टियाँ मिलती है, तो हमें लगा कि उसे भी कुछ तो मिलना ही चाहिए... बस... लेकिन... खैर...। प्रस्ताव राजेश की ओर से आया – ठीक है ऐसा करते हैं, जब भी आप छुट्टी लोगे हम उसका पैसा नहीं देंगे और सन-डे को यदि हमने बुलाया तो हम उसका पैसा देंगे, चलेगा...?
वो खुश... अब मैं काम कर सकता हूँ। चलिए एक बड़ी समस्या हल हुई। इस बीच गाड़ी चलाना सीख लेने की उसकी रट कम नहीं हुई और आखिरकार चलाना सीख ली... अब ये बात अलग है कि उसकी अनुपस्थिति में सड़क पर गाड़ी दौड़ाने का साहस अभी तक नहीं आ पाया है, हाँ उसके होते ही आत्मविश्वास आसमान पर होता है।
जनवरी गुजर रहा है। संस्थान में हर कोई कुछ-न-कुछ सूँघने की कोशिश कर रहा है। छोटी-से-छोटी घटना का एक ही निष्कर्ष निकलता है अपरेजल... क्यों नहीं भई आखिर अप्रैल जो आ रहा है।
घर से निकले ही थे कि साथी का फोन आया पिछले साल हुए अपरेजल को लेकर बहुत सारा असंतोष उँडेलने और इस बार भी यदि ठीक नहीं हुआ तो संस्थान को छोड़ देने की परोक्ष चेतावनी देते हुए उन्होंने ये जानने चाहा कि – छाप-तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय के... अमीर खुसरो का ही है ना! मैं हिंदी के विकास पर एक राइट-अप तैयार कर रहा था।
हाँ, अमीर खुसरो का ही लिखा हुआ है।
ओके, थैंक्य यू... फोन काट दिया गया।
सिग्नल पर गाड़ी रूकी तो लगा कि ड्रायवर कुछ कहना चाह रहा है। उसने एक बार फिर झटका दिया – भाभीजी आपको और सरजी को ये लगता होगा ना कि मुझे बहुत कम समय के काम के लिए बहुत ज्यादा पैसा दिया जा रहा है?
जवाब ही नहीं सूझा... क्या दें, हड़बड़ाए... – अरे नहीं, हमारे पास काम ही इतना है क्या करें?
इसीलिए तो मैं चाह रहा था कि आप चलाना सीख लें, जरा-सा ही तो चलाना है। क्या है कि मुझे बड़ी शर्म आती है कि मैं इतना-सा काम करता हूँ और इतना पैसा लेता हूँ।
हम भी तब तक संभल गए – बल्कि तो यदि किसी दिन हम आपको दिन भर के लिए बुलाते हैं तो हमें लगता है कि आज दिन भर आपको परेशान किया।
जवाब मिला – उल्टा मुझे तो खुशी होती है, कि चलो आज के लिए आप जो देंगे उतना काम तो कम-से-कम आज मैंने किया...।
ये हैं हमारे ड्रायवर श्रीमान गोपाल कुशवाह... और एक ये हैं
नोटिस बोर्ड पर लगे नए नोटिस को पढ़ने के लिए लगातार लोगों का आना-जाना लगा हुआ था। थोड़ी भीड़ छँटी तो हम भी वहाँ पहुँचे। संस्थान के कर्मचारियों के लिए प्रबंधन ने निशुल्क योग प्रशिक्षण क्लासेस की व्यवस्था की है। ये ऐच्छिक है, आप चाहे तो काम के घंटों में से ही समय निकाल कर सीख सकते हैं। इस पर हमारे साथी की टिप्पणी थी – ये भी अच्छा है। योग सीख लो, अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ाओ और फिर गधों की तरह यहाँ का काम करते जाओ...।
हमारी समझ में ये नहीं आया कि इस पर हँसे कि रोएँ....पड़ोसी ने फिर से ऊँची आवाज में अपना रेडियो चालू कर दिया है... इस बार कैलाश खैर गा रहे हैं – ये दुनिया ऊँटपटाँगा, कित्थे हत्थ तो कित्थे टाँगा..... चक दे फट्टे...
हमें लगा सही है... नहीं क्या?

Tuesday, 18 January 2011

स्वागतम् ऋतुराज...


तमाम दिमागी ख़लल, भौतिक व्यस्तताओं और दुनियावी उलझनों के बीच भी हमारी चेतना का कोई हिस्सा अपने ‘होने’ को न सिर्फ बचाए रखता है, बल्कि गाहे-ब-गाहे हमें ये अहसास भी कराता रहता है कि वो न सिर्फ है, बल्कि उसके होने से हमारे अंदर भी कुछ उसी की तरह का कुछ ‘अनूठा’ जिंदा है, हम उतने मशीनी हुए नहीं है, जितना हमने अपने आप को मान लिया है। तो इस सबके बीच हमारी चेतना ने पकड़ ही लिया है कि बसंत आ पहुँचा है...। यूँ भी ऋतुएँ अपने आने के लिए केलैंडर की मोहताज नहीं होती है, हमारी इंद्रियाँ ही उनके आने को चिह्न लेती हैं, सर्दी, गर्मी और बारिश को तो... लेकिन जब बसंत आता है तो उसका आगमन मन तक पहुँचता है।
मौसम की चपेट में आए शरीर ने आखिरकार मन-मस्तिष्क को राहत का सामान मुहैया करा ही दिया... शरीर बीमार है तो जाहिर है सारी वैचारिकता, संवेदनाएँ और भावनात्मकताओं से भी निजात है। सिरहाने राग मारवा में संतुर बज रहा है औऱ हमने खिड़की के सारे पर्दे चढ़ाकर शरीर को दर्द में डूबने के लिए आजाद कर दिया है, ताकि दिल-दिमाग भी थोड़ी फुर्सत पा लें। सुबह से दोपहर हो चली है और संतुर के साथ खिड़की के शीशों पर बसंत की धूप लगातार संगत कर रही है... परेशान होकर लिहाफ हटाया और उस शरारती धूप को अंदर आने के लिए रास्ता क्या दिया, वो पूरे कमरे में पसर गई... फिर क्या था, हमने भी खुद को उसमें डूबने के लिए छोड़ दिया। यादों की रहगुजर उभर आई और फुर्सत का आलम देखकर मन नॉस्टेल्जिक हो उठा।
ये तब की बात है जब ऋतुराज बसंत का नाम और चेहरा अलग-अलग हुआ करते थे। जानते तो थे कि बसंत नाम की कोई ऋतु होती है, लेकिन कब आती है, ये नहीं जानते थे, दूसरी तरफ जब आती थी तो लगता था कि हो न हो ये दिन कुछ अलग है। मतलब पीले पत्तों का झरना, नई कोंपलों का आना, हवा की हल्की खुनक, शाम का खुलापन, दिन का फैलना ये सब महसूस तो होता था, लेकिन ये बहुत बाद में जाना कि ये ही तो ऋतुराज है। परीक्षा के दिन हुआ करते थे, किताबें के बीच घिरे हुए पता नहीं क्या-क्या महसूस हुआ करता था। एक तो किताबों का नशा दूसरा मौसम का.... नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिले... यूँ लगता था कि दिन का कुछ कर डालें... क्या? ...
ये तो स्पष्ट नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा कि दिन को तोड़-मरोड़ डालें या फिर कहीं छुपाकर ज़ेवरों के लॉकर में रख दें... या फिर विद्या की पत्तियों या फिर सूखे गुलाबों की तरह अपनी किताबों के पन्नों में रख दें... बस कुछ ऐसा करें कि ये दिन गुजरने नहीं पाएँ... यहीं रूक जाए, ठहर जाए हमें यूँ ही नशा देते रहें... यूँ ही मदहोश करते रहें.... ओ... बसंत....बसंत...बसंत... कितना खुशनुमा, कितना खूबसूरत, कितना नशीला...।
वो अब भी आया है... वो अब भी हमारे आसपास घट रहा है अब भी सूखे पत्ते वैसे ही झर रहे हैं, कोंपले वैसी ही फूट रही हैं, हवा में वैसा ही नशा है, शाम का खुलापन और दिन का फटना बदस्तूर है... उसी तरह से मदहोश करता, बहलाता, उकसाता, फुसलाता... लेकिन बस हम ही उससे अलग है, रूठे हुए, अलगाए हुए, उदासीन और निर्लिप्त... दुनियादार हुए पड़े हैं, बिना अहसास के, मशीन की तरह... जड़... लेकिन नहीं, उसका आना इतना नामालूम, इतना गैर-मामूली नहीं है कि हम उसे नजरअंदाज़ कर दें... तो .... स्वागतम् ऋतुराज...