Thursday, 15 December 2011

ज़हन और दिल पर क़ाबिज बाज़ार



रात को कितनी ही जल्दी क्यों न करें सोते-सोते 11.30 हो ही जाती है, लिहाजा सुबह जब नींद खुलती है तो सूरज खिड़कियों पर दस्तक दे रहा होता है। कुमारजी श्याम बजा बाँसुरिया सुना रहे होते हैं और चाय के प्याले के साथ सुबह के अखबार हुआ करते हैं, जिनमें ज्यादातर निगेटिव खबरें होती हैं...। लगभग हर सुबह का यही क्रम हुआ करता है। और हर दिन की शुरुआत अखबारों में छपी खबरें और विज्ञापन देखते-देखते मन के उद्विग्न हो जाने से होती है। यूँ लगता है कि या तो दुनियाभर में बस सब कुछ गलत ही गलत हो रहा है या फिर लगता है कि हमारे आसपास बस अभाव ही अभाव है... सुबह पूरी तरह नकारात्मकता से पगी हुई, तो दिनभर का आलम क्या होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
अच्छा खासा बड़ा, खुला, रोशन और हवादार घर है, लेकिन अखबार में छपने वाले फ्लैट के लुभावने विज्ञापन अहसास दिलाते हैं कि साहब आपके पास तो वॉकिंग जोन, स्विमिंग पुल, कम्युनिटी हॉल वाली टाउनशिप में कोई फ्लैट नहीं है औऱ यदि वो नहीं है तो फिर आपके जीवन में एक बड़ा अभाव है। स्लिमिंग सेंटर के विज्ञापनों में एक हड्डी की मॉडल देखकर लगता है कि कमर और पेट पर कितनी चर्बी चढ़ रही है और ब्यूटी पार्लरों के विज्ञापन चेहरे पर उम्र के निशान दिखाने लगते हैं किसी कॉस्मेटिक सर्जन के विज्ञापन पढ़कर चेहरे की सामान्य बनावट में कमी नजर आने लगती है और कभी लगता है कि यदि डिंपल होता तो शायद चेहरा खूबसूरत होता... किसी सेल का विज्ञापन घरेलू सामानों के अभाव को तो कपड़ों के विज्ञापन नए डिजाइन, पैटर्न आदि के कपड़ों का अभाव अलग तरह के मन को उदास करता है, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, म्यूजिक सिस्टम, गाड़ी, एयरकंडीशनर, मोबाइल, लैपटॉप आदि यदि नए भी खऱीदे हो तो लगता है कि टेक्नॉलॉजी पुरानी हो गई है। तो चाहे घऱ के किसी भी कोने पर नजर डालों बस कमियाँ ही कमियाँ नजर आती हैं...। यूँ लगता है जैसे जीवन में कमियों के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। कभी-कभी तो विज्ञापन ये भ्रम तक दे डालते हैं कि हो ना हो, हमें कोई-न-कोई बीमारी जरूर है। और ये सिलसिला रूकता ही नहीं, अखबार से शुरू होकर दफ्तर तक और दफ्तर से घर लौटकर रात को टीवी देखने तक ये बदस्तूर जारी रहता है।
घर से दफ्तर के बीच एक पूरा लंबा-चौड़ा बाजार पसरा हुआ है जिनमें सामानों की शक्ल में अलग-अलग आकार-प्रकार-रंग और पदार्थों के सपने टँगे होते हैं। आते-जाते ये सपने आँखों में उतर जाते और जिंदगी बस इन्हीं सपनों के इर्द-गिर्द चक्कर काटती सी लगती है। चौराहे के सिग्नल पर जब गाड़ी खड़ी थी, तभी पास में मायक्रा आकर रूकी... कितनी खूबसूरत गाड़ी है...! एक ठंडी आह निकली। शो-रूम पर हर दिन आते-जाते मेजेंटा रंग की ड्रेस पर ध्यान अटकता और हर दिन वो सपना जमा होता चला जाता है, बल्कि हर दिन कोई नया सपना साथ आता है। इनमें से कई पूरे किए, लेकिन ये फेहरिस्त कम होने का नाम ही नहीं लेती। इंटरनेट पर सर्फ करो तो पेंशन प्लान से लेकर गर्ल फॉर डेंटिंग तक और डायमंड ज्लैवरी से लेकर निवेश के विकल्पों को सुझाने वाले विज्ञापन... टीवी पर डिटर्जेंट से लेकर कोल्ड ड्रिंक तक और टीवी से लेकर बैंकिंग तक हर चीज का विज्ञापन शाम का समय खा जाता है... गोया बस हर जगह बाजार लगा हुआ है, खरीदो-बेचो... खरीदो-बेचो...।
कभी-कभी तो अपना आप भी बाजार का ही हिस्सा लगने लगता है। आखिर तो किसी भी वक्त खुद को बाजार से बाहर निकाल पाने की मोहलत ही नहीं मिलती है। हर वक्त कोई न कोई जरूरत की चीज याद आती है, कोई न कोई कमी, कोई न कोई सपना... क्या हम उपभोक्ता संस्कृति के प्रतिनिधि उदाहरण हैं? कभी-कभी तो लगता है कि सोते-जागते, हँसते-गाते, खाते-पढ़ते... पूरे समय दिमाग पर बाजार ही हावी रहता है। हो भी क्यों न...! यदि हम घर पर भी रहे तो अखबार, टीवी और इंटरनेट हर जगह बाजार पसरा मिलता है। लगता है कि एक पल को भी बाजार से मुक्ति नहीं है। देखते ही देखते बाजार न सिर्फ हमारे घरों तक आ पहुँचा है, बल्कि इसने हमारे उपर कब्जा कर लिया। अब बस खऱीदने और पुरानी चीजों को निकालने के अतिरिक्त और कोई विचार होता ही नहीं है, लगता है कि बस खऱीदो-बेचो, खऱीदो-बेचो यही है जीवन का ध्येय...।
दिसंबर मध्य में जब सर्दी ने अपनी आमद दर्ज करवा दी है। रात में हल्की धुँध-सी महसूस होती है और रजाई की गर्माहट शिराओं को और मेहंदी हसन की किसी अँधेरी खोह से आती आवाज में – मेरी आहों में असर है कि नहीं, देख तो लूँ... के तल दिमाग के तंतु जब शिथिल होने लगे, तब एक होशमंद विचार कौंधा कि बाजार असल में होश पर ही नहीं, बल्कि जहन और दिल तक पर काबिज़ हो गया है तभी एक सवाल उठा तो क्या बाजार से मुक्ति नहीं हैं?
जवाब मेरे पास नहीं है, क्या आपके पास है!

Friday, 11 November 2011

अभिभूत करते लोग... पार्ट – 1


आजकल मुझे वो चीजें अभिभूत करती है, जो हकीकत में कुछ है ही नहीं। चमचमाती गाड़ियाँ, खूबसूरत कपड़े, महँगे गैजेट्स, चौंधियाती पार्टियाँ, खूबसूरत चेहरे, डुबाता संगीत या फिर गहरी किताबें अभिभूत नहीं करती। करते हैं जमीन से जुड़े लोग, स्वार्थ को दरकिनार कर दूसरों के लिए सुविधा जुटाते, हँसते हुए संघर्ष करते, अपने दुख-दर्द को बहुत करीने से सहेजते-सहते, सीखने के लिए खुले हुए, नया करने के लिए राह बनाते-निकालते लोग, छोटे-छोटे, नाजुक और मासूम-से जैस्चर्स और मीठे-मीठे रिश्ते... कहीं ठहर जाते हैं, भीतर और उस तरह उतरते चले जाते हैं जैसे बारिश की फुहारों का पानी उतरता रहता है जमीन के अंदर.... गहरे.... गहरे और गहरे...। अजीब है, लेकिन है... इन दिनों ऐसा ही कुछ अभिभूत करता है। पिछले कुछ दिनों से कुछ ऐसे ही लोग आसपास से गुजर रहे हैं और जीने का उनका तरीका, परिस्थितियों से लड़ने का साहस और जीवट मेरी यादों की किताब में दर्ज हो रहे हैं, उनके जीवन के गहरे अर्थ खुलते हैं और नया जीवन दर्शन भी मिलता है।
दीपक - वो हमारे घर पुताई करने के लिए आया था। रैक की किताबों को बहुत गौर से देख रहा था। यूँ ही पूछ लिया पढ़ते हो...। उसने बड़ी विनम्रता से नजरें झुकाकर गर्दन हाँ में हिला दी। हमने बड़े आश्चर्य से फिर से अपना सवाल दोहराया – पढ़ते हो?
इस बार उसने बहुत आत्मविश्वास से हमारी आँखों में आँखें डालकर जवाब दिया – हाँ... पढ़ रहा हूँ।
उसके विनम्र आत्मविश्वास ने हमें चौंकाया – कौन-सी क्लास में...?
10 वीं में – उसने जवाब दिया।
कौन से स्कूल में ...?
उसने शहर के एक बड़े प्राइवेट स्कूल का नाम लिया...। हमने अपनी आँखों को थोड़ा फैलाया... – उसकी फीस तो बहुत ज्यादा है।
हाँ...- अबकी उसने आत्मविश्वास से मुस्कुरा कर जवाब दिया – तभी तो छुट्टी-छुट्टी काम करके फीस जमा करता हूँ। पिता मजदूरी करते हैं, वो हमें रोटी देते हैं। फीस की उम्मीद उनसे नहीं की जा सकती है। पढ़ना चाहता हूँ, इसलिए अपनी फीस का इंतजाम मुझे खुद ही करना चाहिए। बस... टुकड़ों-टुकड़ों में थोड़ा-थोड़ा काम करके साल भर में इतना पैसा जमा कर लेता हूँ कि स्कूल की फीस निकल जाए।
तीन दिन उसने बहुत मेहनत और लगन से काम किया। उसके काम का तरीका देखकर महसूस हुआ कि ये काम उसके पढ़ने के जुनून का हिस्सा है और उसके जुनून का इंप्रेशन भी...। वो काम कर जा चुका है, लेकिन जीवन के अनुभवों पर उसका नक्श हमेशा के लिए अंकित हो गया।
लक्ष्मी – पता नहीं कैसे वो हमारी झोली में आ गिरी थी। हरफनमौला... यूँ काम तो करती थी खाना बनाने का, लेकिन जो काम बताओ उसे पूरे उत्साह से अंजाम देती थी। खाना बनाने से लेकर कपड़ों को ठीक करना, छोटा-मोटा सामान खरीद कर ला देना, बालों में मेंहदी लगा देना या फिर मौका-बे-मौका फेशियल ही कर देना। दीपावली की सफाई की कल्पना तो उसके बिना की ही नहीं जा सकती थी। पिता मंडी में हम्माली करते हैं और माँ प्राइवेट स्कूल में खाना बनाती है। वो खाना बनाने का काम इसलिए करती है ताकि पैसा जमा करके ब्यूटीशियन का कोर्स कर सकें। अभी उसका टारगेट पूरा नहीं हुआ था... भागती हुई हमारे यहाँ खाना बनाने आती थी, यहीं से ट्रेनिंग के लिए... शाम को ट्रेनिंग से लौटते हुए घर आकर खाना बनाती थी और फिर अपने घर जाकर खाना बनाती थी। पिछले दिनों बस का इंतजार करते हुए मिली तो बिल्कुल बदली हुई...। धूप से बचने के लिए आँखों पर काला चश्मा था, जींस पर कुर्ता और छाता लेकर खड़ी थी। हमने पहचान कर लिफ्ट दी तो उसने बताया कि जहाँ उसने ट्रेनिंग की वहीं पर नौकरी भी करने लगी है। महीने भर की तनख्वाह के साथ ही हर फेशियल पर कमीशन अलग...। वो खुश है, क्योंकि उसने अपनी राह तलाशी और मंजिल भी पाई है।
यूँ ये लिस्ट बहुत लंबी है, लेकिन फिलहाल इसमें सिर्फ दो ही लोगों को शामिल किया है। जैसे-जैसे लिखती जाऊँगी इसे विस्तार दूँगी। चूँकि हरेक किरदार अपने-आप में एक पूरी कहानी कहता है, इसलिए ये जरूरी नहीं है कि इसे शृंखलाबद्ध तरीके से ही लिखा जाए। इसलिए इस कड़ी में बस इतना ही... अगली कब होगी, कहा नहीं जा सकता...।

Sunday, 6 November 2011

रास्ते में यूँ ही...!


अपनी गाड़ी खराब होने के दौरान बस के समय को साधने और किसी वजह से बस छूट जाने के बाद बस या ऑटो का इंतजार करना कैसा होता है, ये वो ही समझ सकता है, जिसे ये करना पड़े। जब कभी ऐसा होता तो लगता कि काश कोई महिला अपनी टू-व्हीलर या फिर कार में हमें मुख्य सड़क तक लिफ्ट दे दें, माँगना अपने राम को कभी आया ही नहीं। किसी को अपनी कोई चीज ही दी हो, चाहे उपयोग करने के लिए, उधार (ये तो सिर्फ पैसा ही दिया जाता है) या फिर उपहार में... जरूरत पड़ने पर माँगने में जैसे हमारी ही जान निकल जाती है, तो अब खड़े हुए बस या ऑटो का इंतजार करेंगे, लेकिन लिफ्ट... वो तो नहीं होना। ऐसे ही किसी समय में ये तय किया कि अब अपनी गाड़ी में हम उन महिलाओं और लड़कियों को लिफ्ट देंगे जो हमारे जाने के रास्ते में कहीं भी जाना चाहेंगी। दी तो लड़कों-पुरुषों को भी जा सकती है, लेकिन इसमें बड़ा झंझट है... कई सारे पेंच हैं।
हुआ ये कि जिस दिन ये तय किया उसके बाद कभी ऐसा मौका आ ही नहीं पाया। कभी हम निकले तो बस सामने खड़ी थी, जिसमें चढ़ने के लिए कॉलेज-यूनिवर्सिटी जाती लड़कियाँ इंतजार कर रही थी, तो कभी पूरे परिवार के साथ महिला खड़ी थी, तो कभी एकसाथ इतनी लड़कियाँ खड़ी बतिया रही थी कि उन सारी की सारी को गाड़ी में बैठाने की गुँजाइश ही नहीं थी, कुछ और नहीं तो खुद हमें ही इतनी हड़बड़ी होती थी कि गाड़ी रोककर ये पूछना तक समय जाया करना लगता कि – कहाँ जाना है, मैं छोड़ देती हूँ। देखिए नीयत भी हो, इच्छा भी... लेकिन नसीब...! उसका क्या...?

पता नहीं सब कुछ बड़े आराम से करने, सुबह की पूरी दिनचर्या को विलासिता के साथ शब्दशः निभाने और फेसबुक पर लपककर जुगाली करने के बाद भी जल्दी तैयार हो गई। लगा कि आज गाड़ी को भी थोड़ा दुलरा दिया जाए। धूप खासी थी फिर भी कपड़े का एक झटका इधर मारा, एक झटका उधर मारा और ऊब होने लगी तो लगा कि सेल्फ मारे और चलें काम पर। भई देर से जाओ तो शर्मिंदा होओ... जल्दी जाने में कैसी शर्म...? वहाँ पहुँचकर थोड़ा पढ़ने का समय ज्यादा मिल जाएगा। तो दफ्तर के लिए निकल पड़े। आज... हुई मन की...। मुख्य सड़क पर एक दुबली-पतली, छोटे कद की लड़की जींस-टीशर्ट पहने, सिर सहित मुँह को स्कार्फ से ढँके खड़ी थी... हमने गाड़ी रोकी और फिल्म चढ़े दूसरी तरफ वाले शीशों के अंदर से झाँका... लेकिन लड़की ने तो कोई भाव ही नहीं दिया। हम थोड़े आहत हुए, लेकिन तुरंत ध्यान आया... उस बेचारी दिखाई ही नहीं दे रहा होगा... तो थोड़ा झुककर शीशा उतारा... – कहीं छोड़ दूँ? आवाज तो क्या पहुँच रही होगी... बस उसने ही कुछ अपने से समझ लिया... वो करीब आई... मुस्कुराई और कुछ बुदबुदाई। जैसे उसने मेरी बात बिना सुने समझ ली... मैंने भी समझ ली...। दरवाजा खोला और वो अंदर आ बैठी। थोड़ी सकुचाई-सी वो बैठी रही...मैंने पूछा पढ़ती हो (क्योंकि स्कार्फ से चेहरा ढँका होने पर उसका स्टेट्स कि काम करती है या पढ़ रही है, पता नहीं चलता है, फिर बात करने के लिए कोई तो बात हो...)?
उसने कहा – हाँ।
मैंने पूछा – कहाँ?
उसने जवाब दिया – जीडीसी...
ओह तो फिर तो मैं तुम्हें वहाँ तक छोड़ सकती हूँ। वो तो मेरे ऑफिस के रास्ते में ही है। - मैंने उत्साह में आकर कहा।
उसने कहा – मुझे लगा कि आपको दूसरी तरफ जाना होगा।
कहाँ रहती हो से लेकर, क्या पढ़ रही हो तक की सारी बातें हुई। मैंने उसका नाम भी पूछा, लेकिन उसने सिर्फ मेरा सरनेम पूछा और ब्राह्मण पाकर कुछ खुश भी हुई (स्कार्फ बँधे होने की वजह से उसका चेहरा नहीं देख पाई, लेकिन उसकी आवाज की चहक से मुझे ऐसा अनुमान हुआ)। एक-दो बार मन हुआ कि उससे कहूँ कि अब तो गाड़ी के अंदर हो, स्कार्फ हटा सकती हो... लेकिन कह नहीं पाई। उसका कॉलेज आ चुका था, अब तक भी उसने स्कार्फ नहीं हटाया था। गाड़ी रूकी तो उसने कहा – थैंक्स मैम, नाइस टू मीट यू...।
मैंने भी उसे कहा – सेम हियर... बाय। वो कॉलेज के अंदर चली गई और मैं अपने रास्ते... । विचार चल रहा था, यही लड़की यदि अगली बार कहीं मिली, चाहे स्कार्फ के साथ या फिर बिना स्कार्फ के... मैं उसे नहीं पहचान पाऊँगी...। फिर सवाल उठा कि मैं उसे पहचानना ही क्यों चाहती हूँ। कभी... दिखे तो लगे कि किसी दिन इस लड़की को मैंने उसके कॉलेज छोड़ा था...। फिर प्रतिप्रश्न – और ऐसा क्यों चाहती हो...? कोई जवाब नहीं मिला...। फिर इन कबाड़ से सवाल जवाब में से एक नायाब निष्कर्ष निकला। ‘अच्छा ही हुआ जो लड़की ने अपना स्कार्फ नहीं हटाया। यदि भविष्य में वो कहीं मिली तो पहचान का कोई चिह्न ही नहीं होगा, मेरे पास इससे ये अहसास भी नहीं होगा कि कभी इसे इसके कॉलेज तक लिफ्ट दी थी...कोई बेकार का अहंकार भाव नहीं उभरेगा... वाह!’ कुछ ऐसा लगा जैसे बाल कटवाने पर, या फिर हर दिन ले जाने वाले बैग की सफाई कर बेकार चीजों को निकाल दिया हो, या फिर कमरे या अलमारी की सफाई कर कबाड़ निकाल दिया हो और सब कुछ हल्का, खुला-खुला और बड़ा-बड़ा-सा लग रहा हो।
फिर विचार उठा, लेकिन वो तो मुझे पहचानती है ना...! हाहाहा.... तो ये उसकी समस्या है:-)

Wednesday, 2 November 2011

ताजमहल और उसका सपना…



बच्चों की भीड़ के बीच माँ उसे लेकर घर लौट रही थी। माँ ने उससे उसका बैग लेने की कोशिश की तो उसने माँ का हाथ झटक दिया। मेरे दोस्त मेरा मजाक उड़ाते हैं...- उसने बड़ी मासूमियत से मुँह फुलाकर माँ से कहा। माँ ने उसे हल्के से छेड़ा – क्यों...?
कहते हैं कि ये तो अभी भी बच्चा ही है, इसे लेने इसकी मम्मी आती है, इसकी मम्मी इसका बैग लेकर आती है... और... – माँ ने मुस्कुराते हुए कहा – इसमें क्या है? अभी तू बच्चा ही तो है।
उसने फिर मुँह फुला लिया। वो कहना चाहता है माँ से कि अब मैं खुद से घर आ सकता हूँ। मुझे घर का रास्ता याद है, लेकिन कह नहीं पाता, क्योंकि एक दिन ऐसे ही अकेले घऱ के लिए निकलते हुए जब वो सड़क क्रॉस कर रहा था तो स्कूटर की चपेट में आ गया था। सिर में चोट लगी थी औऱ स्कूटर वाले अंकल उसका ड्रेसिंग करवा कर उसे जब घर छोड़ने गए तो घर में कोहराम मचा हुआ था। स्कूल छूटे घंटा भर हो गया था औऱ वो घर नहीं पहुँचा था, बस पापा पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए निकल ही रहे थे। उस दिन के बाद से उसे हर दिन माँ ही स्कूल छोड़ती औऱ माँ ही लेने जाती थी। छोड़ते समय तो यूँ भी कोई विकल्प नहीं हुआ करता था, लेकिन स्कूल छूटते में कई बार ऐसा हुआ कि यूनिफॉर्म में एक ही उम्र के बच्चे जब स्कूल से छूटते तो उस भीड़ में माँ उसे पहचान नहीं पाती और वो माँ की नजर बचाकर निकल जाता। माँ बहुत देर तक स्कूल के गेट पर खड़ी रहती, फिर जब स्कूल खाली हो जाता और बड़े बच्चे (वो बड़ी क्लास के स्टूडेंट्स को यही कहता था) आने लगते तब माँ स्टॉफ रूम में जाती और तफ्तीश करती। निराश होकर घर लौटती तो उसे वो घर पर खेलता हुआ मिलता। उसके बाद से माँ वहाँ खड़ी होती है, जहाँ से बच्चों को लाइन से छोड़ा जाता। फिर भी कई बार वो गफलत में माँ की नजर बचाकर निकल ही जाता।

खाना खाते हुए वो माँ से पूछता है – आज आपने मेरे टिफिन में मीठे भजिए नहीं रखे थे?
रखे थे, तूने खाए नहीं क्या?
नहीं थे... सिर्फ अचार-पराँठा ही था। - उसने जोर देकर कहा। लेकिन माँ कैसे भूल सकती है... माँ ने तो खुद तले थे...। माँ को खुटका होता है, कहीं उसका टिफिन कोई और तो नहीं खा रहा है। माँ सोचने लगती है... कल जाकर इसकी क्लास टीचर से शिकायत करनी पड़ेगी। वो मीठे भजिए भूलकर अपने साथ खाना खाती बहन को बताने लगता है - आज है ना मोटी मैडम को धीरज ने पीछे से चॉक मारा और नाम जितेंद्र का ले दिया। उस बेचारे को मार पड़ी।
बहन पूछती है आज तेरी मैडम ने क्या पढ़ाया...?
वो दाल-चावल में शक्कर मिलाते हुए कहता है – आज है ना ताजमहल के बारे में बताया। वो कितना सुंदर है, मैंने उसका फोटो देखा है किताब में... बहुत सुंदर, एकदम सफेद झक्क...। अचानक वो मचल कर माँ से कहता है – मम्मी मुझे एक बार ताजमहल दिखा दो ना...।
माँ भी उसका मन रखने के लिए कह देती है – हाँ दिखा देंगे। और काम में व्यस्त हो जाती है। पता नहीं कैसे उसका ये कहना, बहन के अंदर कहीं खुभ जाता है। वो देर तक इस चीज का हिसाब लगाती रहती है कि यदि हम चारों ताजमहल देखने गए तो कितना पैसा लगेगा, हाँलाकि उसे ना तो इस बात की जानकारी थी कि वहाँ जाएँगें कैसे और टिकट कितना होगा, बस यूँ ही अनुमान लगा रही थी... 200 रु. पर हेड... लेकिन हम दोनों तो छोटे हैं ना। तो हमारी तो आधी टिकट लगेगी, मतलब 200 में तो हमारे दोनों का आना-जाना हो जाएगा। आठ सौ रु. में मम्मी-पापा का आना जाना। वहाँ ठहरेंगे कहाँ...? फिर ठहरने के लिए भी तो पैसा चाहिए होगा...। बहुत माथापच्ची करने के बाद उसका हिसाब बैठा ज्यादा से ज्यादा पाँच हजार रु....। पापा क्या इतना पैसा भी खर्च नहीं कर सकते। पता नहीं कैसे ये बात आई-गई हो गई। फिर एकाध बार ताजमहल का जिक्र हुआ तो उसने बहुत अनुनय से माँ से कहा... माँ बस एक बार दिखा लाओ ना ताजमहल...। उसका अनुनय बहन के मन में गाँठ की तरह पड़ गया। जीवन चलता रहा, वक्त गुजरता रहा। यादें धुँधला गई, सपने कहीं बिला गए।

हालाँकि फतेहपुर सीकरी और आगरा उसके टूर का हिस्सा नहीं था, लेकिन इतिहास से फेसिनेटेड आदित्य ने अपने प्रोफेसरों को एक दिन वहाँ रूकने के लिए मना ही लिया। एक तो बिना किसी विघ्न के यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट टूर से लौट रहे थे, दूसरा फंड भी कुछ बच रहा था, इसलिए पहले फतेहपुर सीकरी और फिर आगरा पहुँचे थे। ताजमहल में घुसते हुए उसे बहुत रोमांच हो रहा था... लेकिन लंबा रास्ता पार कर जैसे ही वह उस भव्य, खूबसूरत और झक्क सफेद ताजमहल के सामने जाकर खड़ी हुई, पता नहीं कैसे कोई स्मृति उड़कर उसके सामने आ गई और उसके मन में हूक उठी...। बचपन नजरों के सामने कौंध गया और उसे अपना नन्हा-सा भाई माँ से अनुनय करता याद आया – माँ एक बार ताजमहल दिखा दो...। उफ्...! कितनी छोटी-सी ख्वाहिश थी। फिर ताजमहल को वो वैसे देख नहीं पाई, अंदर भी गई... पीछे भी और फोटो भी खिंचे-खिंचवाए... लेकिन कुछ कसकता-सा रह गया उसके मन में।

जिंदगी की राह में ऐसे मकाम आने लगे/ छोड़ दी मंजिल तो मंजिल के पयाम आने लगे... गज़ल चल रही थी उसके मोबाइल में। यूँ ताजमहल देखने का उसका सपना नहीं था। पता नहीं ये उसके साथ ही होता है या फिर सबके साथ होता होगा कि सपनों की ऊँचाई उतनी ही होती है, जितनी ऊँची नजर जाती हो...। तो एक बार फिर वो ताजमहल के सामने वाली पत्थर की उस फेमस बेंच पर बैठकर फोटो खिंचवा रही थी, जो ये भ्रम देती है कि ताजमहल हमारी ऊँगली की टिप के नीचे हैं। फिर से भाई का वो सपना उड़कर उसके करीब आकर, उससे सटकर बैठ गया और बहुत मासूमियत से उससे पूछ रहा है कि तुझे तो भाई का सपना याद है, क्या उसे याद है कि उसने भी ये सपना देखा था...!

Wednesday, 26 October 2011

पता होता है तो घर खो जाता है...!


तथ्य तो ये है कि कार्तिक आधी उम्र जी चुका है, लेकिन सत्य यह है कि अभी तक तो क्वांर ही नहीं बीता... तो निष्कर्ष यूँ कि जरूरी नहीं है कि जो तथ्य हो वो सत्य हो ही और ये भी जरूरी नहीं है कि जो सत्य हो, उसमें तथ्य हो ही... ऊ हूँ... बात जरा मुश्किल हो रही है। थोड़ा आसान करके समझें... दीपावली से पहले सारे आर्थिक सर्वेक्षण ये गा रहे हैं कि देश में गरीबी कम हुई है लेकिन करीब बन रही कॉलोनी के सारे चौकीदार साल की इस सबसे अँधियारी रात को एक-एक दीए से रोशन करने की कोशिश में लगे हैं... कारण... इससे ज्यादा तेल जलाने की उनकी कुव्वत भी नहीं है और साहस भी नहीं है... तो तथ्य ये कि गरीबी कम हो रही है और सत्य ये कि गरीब तो वहीं के वहीं है, वैसे के वैसे ही... अभी भी कुछ समझ नहीं आ रहा है, छोड़िए... कुछ और बात करते हैं।
हाँ तो कार्तिक की खुनकभरी सुबह-शाम चाय का गर्म प्याला अभी तक खुले में ही मजा दे रहा है। सुबह की चाय अखबार की उबाऊ और अवसाद देने वाली खबरों के साथ और शाम की चाय आखिरी सिरे पर दिन भर की जुगाली के साथ...। तो उस शाम हमारी चाय में परिवार के और लोग भी शामिल हुए... तमाम दुनिया जहान की बातों के बीच न जाने कहाँ से वो रहस्यमयी खुशबू सरसराती हुई घुस गई... अरे... ये तो रातरानी की खुशबू है, हमने आश्चर्य जताया, लेकिन हमने तो अभी तक रातरानी लगाई ही नहीं, तो फिर ये खुशबू कहाँ से आ रही है। हमारे आसपास बहुत किफायती लोग रहते हैं, ना तो जमीन बेकार छोड़ी और न ही किसी मुँडेर पर कोई गमला नजर आता है... पानी की भी किफायत और जमीन की भी... पैसों की तो खैर है ही...। तो फिर ये खुशबू कहाँ से आ रही है...? घर के आसपास लगे पौधों में जाकर सरसरी तौर पर देख भी लिया, लेकिन शाम के धुँधलके और पेड़-पौधों के गुँजलक में क्या रातरानी दिखे, फिर जब अभी तक लगाई ही नहीं है तो होने का तो सवाल ही नहीं उठता है।
किचन में सिंकती रोटी के साथ फिर से वही मादक और जंगली-सी सुगंध... रात के खाने के बाद टहलते हुए भी फिर वही... उफ्...! अब तो कॉलोनी छोड़कर सड़क पर टहलो तो वहाँ भी... जैसे वो सुगंध हमारा ही पीछा कर रही है। मुश्किल ये है कि दिन के उजाले में वो खुशबू नहीं होती कि उस बेल का पता मिले और शाम के धुँधलके में जब खुशबू का पता होता है तो वो घर ही खो जाता है। पिछले 15 दिनों से यही लुकाछिपा का खेल चल रहा है, लेकिन न रातरानी की खुशबू हारी और न ही हमें जीत मिली... फिर एक दिन सोचा कि क्यों न रातरानी को लगा ही लिया जाए, अब उसे लगाया तो है, लेकिन उसे फूलने में वक्त है... पर, ये खुशबू...! उफ्.. तो लब्बोलुआब ये है कि रातरानी हमारे आसपास नहीं है ये तथ्य है, लेकिन उसकी खुशबू सत्य... तो क्यों न उस खुशबूदार सत्य से रिश्ता रखें... रातरानी के तथ्य का फायदा क्या है? शायद अब सत्य-तथ्य की गुत्थी समझ आए...!

Friday, 21 October 2011

नींद आ जाए अगर आज तो हम भी सो लें...


पता नहीं वो सपना था या विचार... रात के ऐन बीचोंबीच एक तीखी बेचैनी में मैंने अपने शरीर पर पड़ा कंबल फेंका औऱ उठ बैठी। चेहरे पर हाथ घुमाया तो बालों की तरफ से कनपटी पर आती पसीने की चिपचिपाहट हथेली में उतर आई। सिर उठाकर पंखे की तरफ देखा, फुल स्पीड में चलते पंखे ने अपनी बेचारगी जाहिर कर दी...। सिरहाने से पानी का गिलास उठा लिया, एक ही साँस में उसे पूरा गले में उँडेल लिया... लेकिन कुछ अनजान-सा अटका हुआ है, जो किसी भी सूरत में नीचे नहीं जा रहा है। सुबह-शाम-दिन-रात एक अपरिचित बेचैनी है, बड़ी घुटन। सबकुछ अपनी सहज गति से चल रहा है, लेकिन कहीं-कुछ चुभता है, गड़ता है और परेशान कर रहा है। थोड़ी कोशिश की तो नींद आ ही गई ... हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगें, अभी कुछ बेकरारी है, सितारों तुम तो सो जाओ...। सुबह फिर उसी बेचैनी में नींद खुली थी, उनींदी आँखों से घड़ी को देखा तो सात बजने में बस कुछ ही देर थी... पंखे की हवा ठंडी लग रही थी, लेकिन सोचा बस बिजली गुल होने ही वाली है... दिमाग के गणित से निजात कहाँ...?
चॉपिंग बोर्ड पर हाथ प्याज काट रहे हैं, लेकिन दिमाग का मेनैजमेंट जारी है। सब्जी छोंकने के दौरान ही दाल पक जाएगी और उसी गैस पर फिर चावल रख दूँगी। सब्जी बनते ही दाल छौंक दूँगी... दस बजे तक सारा काम हो ही जाएगा। फिर दो-चार पन्ने तो किताब के पढ़ ही पाऊँगी, आज नो इंटरनेट... बेकार समय बर्बाद होता है। कड़ाही में मसाला भून रहा है, लेकिन दिमाग में अलग ही तरह की खिचड़ी पक रही है। आज भी पुल से नहीं जाना हो पाएगा... अखबार में ही तो पढ़ा है कि यहाँ किसी पोलिटिकल पार्टी की आमसभा है, तो जाम की स्थिति बनेगी...। रिंग रोड से जाना ही सूट करता है। हालाँकि इस रोड पर बहुत गड्ढे हैं, लेकिन कम से कम जाम... अदिति कहती है कि तुम्हें मेडिटेशन करना चाहिए... लेकिन दिल और दिमाग दोनों को साध पाना क्या आसान है, खासकर तब जब दोनों की गति हवा की तरह हो... वो कहती है कि किसी को इतना हक नहीं देना चाहिए कि वो आपको दुख पहुँचा सके... उफ्! भूल गई... कहीं पानी ओवरफ्लो तो नहीं हो रहा है। दौड़कर देखा, बच गए। आखिरकार हम नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा पानी, बिजली, ईंधन औऱ पर्यावरण पर...। लेकिन क्या इतने अनुशासन के बाद जीवन में रस बचा रहेगा। तो क्या अनुशासन को उतार फेंके जीवन से...? फिर से सवाल...।अदिति का कहना सच है, जो भी दिल के करीब आता है, जख्म बनके सदा... तो क्या करें...? दिल के दरवाजे बंद कर के रखें! ... कितने दिनों से एक ही किताब पढ़ रही हूँ, आखिर इतनी स्लो कैसे हो सकती हूँ... मसाला तेल छोड़ने लगा है, लेकिन प्रवाह सतत जारी है, मशीन का बजर बज गया। घड़ी ने साढे़ दस बजा दिए। ना तो इंटरनेट हो पाया और न ही किताब के पन्ने पलटे गए। सोचा था आज साड़ी, लेकिन अब समय नहीं है, सूट... पिंक... नहीं यार आज मौसम अच्छा है, कोई तीखा रंग। सिल्क... पागल हो क्या? मौसम कितना खराब है, दिन भर घुटन होती रहेगी... फिर... कोई सूदिंग-सा कपड़ा... कॉटन...। दिमाग ने सारी ऊर्जा सोख ली... अभी तो दिन बाकी है।
यार दो ही भाषा आती है, कितना अच्छा होता पाँच-सात भाषाएँ जानती... तो कितना पढ़ पाती, जान पाती, समझती और महसूस कर पाती...। उफ्...! अदिति कहती है कि - कितनी भूख है यार तेरी... बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले...। कहीं तो लगाम लगानी ही पड़ेगी ना...! कोई न कोई नुक्ता तू ढूँढ ही लाती है दुखी होने के लिए... छोड़ इस सबको... जीवन को उसकी संपूर्णता में देख...। काश कि वो मुझे वैसे दिख पाता...। – ओ...ओ... अभी बाइक से टकराती... ये दिमाग पता नहीं कहाँ-कहाँ दौड़ता फिरता है। उफ्... आज फिर किताब घर पर ही रखी रह गई। ले आती तो एकाध पन्ना पढ़ने का तो जुगाड़ भिड़ा ही लेती...। कब तक फिक्शन ही पढ़ती रहूँगी, कभी कुछ ऐसा पढूँगी जो नॉन-फिक्शन हो...। अरे... अभी तो पढ़ी थी वो डायरी...। हाँ, वो है तो नॉन फिक्शन...।

खिड़की से आती स्ट्रीट लाइट ने एक बार फिर ध्यान खींचा और मैंने पर्दा खींचकर उस रोशनी को बाहर ढकेल दिया। आँखों के सामने अँधेरा घिर आया... अंदर-बाहर बस अँधेरा ही अँधेरा... कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। कई-कई रातों से नींद के बीच कुछ-न-कुछ बुनता हुआ-सा महसूस होता है, लगता है जैसे नींद भी कई-कई जालों में फँसी हुई है। लगता है कि कोई ऐसा इंजेक्शन मिल जाए, जिसे सिर में लगाएँ और रात-दो-रात गहरी नींद में उतर जाएँ...। कुछ अजीब से परिवर्तन हैं – संगीत सुहाता नहीं, डुबाता नहीं... सतह पर ही कहीं छोड़ जाता है, प्यासा-सूखा और बेचैन... किताबें साथी हो ही नहीं पा रही है, वो छिटकी-रूठी हुई-सी लगती है। कुछ भी डूबने का वायस नहीं बन रहा है... ना संगीत, ना किताबें और न ही रंग... क्यों आती है, ऐसी बेचैनी, क्यों होता है सब कुछ इतना नीरस और ऊबभरा... ? ऐसी ही बेचैनी में उठकर अपने स्टूडियो में आ खड़ी होती हूँ। जिस कैनवस पर मैं काम कर रही हूँ, उसके रंग देखकर ताज्जुब हुआ... कैसे पेस्टल शेड्स दाखिल हो गए हैं, जीवन में...! हल्के-धूसर रंगों को देखकर हमेशा ही कोफ्त होती रही है, लेकिन मेरे अनजाने ही वे रंग मेरे कैनवस पर फैल रहे हैं... उफ् ये क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है, क्या है जो बस धुँआ-धुँआ सा लगता है, कुछ भी हाथ नहीं आ रहा है।
दिल को शोलों से करती है सैराब, जिंदगी आग भी है पानी भी... आज तो बस शोलें ही शोलें हैं... तपन है तीखी। अदिति कहती है कि तुम्हें बदलाव की जरूरत है... बदलाव कैसा...? कहती है एक ब्रेक ले लो... ब्रेक... किससे... खुद से, यार यही तो नहीं हो पाता है। खुद को ही कभी अलग कर पाऊँ तो फिर समस्या ही क्या है...? कितनी दिशाओं में दौड़ रही हूँ, खींचती ही चली जाऊँगी और अपने लिए कुछ बचूँगी ही नहीं....। कहीं कोई मंजिल नजर नहीं आ रही है... दौड़ना और बस दौड़ना... क्या यही रह गया है जीवन... ? कहीं किसी बिंदू पर आकर निगाह नहीं टिकती है, अजीब बेचैनी है... स्वभाव में, विचार में, जीवन में तो फिर निगाहों में कैसे नहीं होगी? पढ़ने के दौरान कई सारे पैरे पढ़ने के बाद भी मतलब समझ नहीं आता... लगता है कि एकसाथ कई काम करने हैं और फिर तुरंत लगता है कि क्या करना है और क्यों करना है?
रफी गा रहे हैं – तल्खी-ए-मय में जरा तल्खी-ए-दिल भी घोले/ और कुछ देर यहाँ बैठ ले, पी ले, रो ले...। चीख कर रोने की नौबत आने लगी थी... मुँह को हथेली से दबाया और खुद को चीखने की आजादी दे डाली... एक घुटी हुई सी चीख निकली और फिर देर तक सिसकियाँ... गज़ल चल ही रही थी – आह ये दिल की कसक हाय से आँखों की जलन/ नींद आ जाए अगर आज तो हम भी सो ले... गहरी... मौत की तरह की अँधेरी नींद की तलब लगी थी... शायद मैं भी सो गई थी...

Tuesday, 4 October 2011

...क्या फिर कारखानों में उत्पादित होगी बेटियाँ...!


कागज के उस छोटे-से टुकड़े ने जैसे पूरे घर में तूफान ला दिया था। टेबल पर पड़े उस कागज को सभी ऐसी नजर से देख रहे थे जैसे वो कोई बम है और उसके फटते ही सब कुछ खत्म हो जाएगा। लक्ष्मी देवी का चेहरा तो जैसे दहक रहा था, राधिका को ये समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्यों लग रहा है कि उससे कोई भारी अपराध हुआ है, लक्ष्मी देवी, सुरेश जी और अमोल सभी जैसे उससे नाराज है और वो खुद भी…, लेकिन बहुत सोचने के बाद भी वो खुद समझ नहीं पा रही है कि आखिर उसका अपराध क्या है?
लक्ष्मी देवी दहाड़ी थी – हमें ये नहीं चाहिए। तू कल ही डॉ. उपाध्याय से मिल और इससे छुटकारे का कोई उपाय कर।
लेकिन माँ…- राधिका के गले में शब्द ही जैसे फँस गए हो। अमोल ने भी बहुत कातर दृष्टि से राधिका की तरफ देखा था। अमोल ये तय नहीं कर पा रहा था कि उसका स्टैंड क्या होना चाहिए। हालाँकि ये तय था कि अमोल लक्ष्मी देवी और सुरेश जी के निर्णय के खिलाफ किसी भी कीमत पर नहीं जा सकता, लेकिन कहीं उसके विचार में ये सवाल जरूर उठता है कि आखिर राधिका की क्या गलती है? आखिर अमोल अपनी माँ से बात करने का साहस जुटा ही लेता है – माँ… ये पहला है। अगली बार इस पर सोचें तो…!
लक्ष्मी देवी चीखीं थी – अगली बार…! अगली बार नहीं इसी बार…। हमें ये झंझट नहीं चाहिए।
राधिका ने डबडबाई आँखों से एक बार लक्ष्मीदेवी की तरफ और एक बार अमोल की तरफ देखा था। अमोल ने बेचैन होकर नजरें चुरा ली थी, जबकि लक्ष्मीदेवी के चेहरे की दृढ़ता से राधिका ने खुद को बहुत बेबस महसूस किया था।
आखिरकार सारी तैयारी हो चुकी थी। राधिका पता नहीं किस उम्मीद में किसी चमत्कार की आस में अडोल बैठी थी कि सुरेशजी की कड़कती आवाज से चौंक गईं – चलो या फिर मुहूर्त निकलवाएँ?
राधिका डर गई थी। उसने सहारे के लिए अमोल की तरफ देखा तो उसने भी नजरें चुरा लीं। राधिका को लगा कि इस पूरी दुनिया में वो नितांत अकेली है, कोई भी उसका साथ देने के लिए नहीं है, जिस इंसान का बहुत विश्वास से हाथ पकड़कर वो इस घर में आई थी, उसने भी उसे मझधार में छोड़ दिया है।
पीली-बेदम राधिका की आँखें लगातार मूँदी जा रही थी। कमरे की रोशनी से उसे बेचैनी होने लगी तो अमोल से गुजारिश कर लाइट बंद करवा दी। एनेस्थिशिया का असर था या रात की अधूरी नींद का, कमजोरी थी या फिर लंबे तनाव के बाद गहरे अपराध बोध का उसे लगने लगा था कि वो लगातार धरती के अंदर धँस रही है… गहरे, गहरे काले अतल में…। उसी नींद-नशे के बीच की सी स्थिति में राधिका को आवाज सुनाई दी… माँ… माँ… माँ…। उसकी चेतना का कोई हिस्सा सक्रिय हुआ। वो बुदबुदाई – हाँ बेटा।
सिसकी की तीखी सीत्कार…। – तूने मुझे दुनिया में आने का अधिकार तक नहीं दिया!
राधिका घिघियाने लगी… – मैंने नहीं चाहा था कि ऐसा हो…
लेकिन… हुआ तो वही ना…! – बच्ची ने तल्खी से कहा। – तू तो माँ थीं ना… सदियों से तेरी कहानी साहित्य, इतिहास और कला में दोहराई जा रही है। खुद भूखे रहकर बच्चों का पेट भरने वाली, खुद जागती रहकर बच्चों को सुलाने की सुविधा देने वाली, अपने खून को बच्चों के पसीने पर लुटा देने वाली ममतामयी, वात्सल्य से भरी हुई माँ…। तूने अपने ही बच्चे की हत्या पर कैसे सहमति दे दी…? वो भी सिर्फ इसलिए कि मैं बेटा न होकर बेटी थी!
राधिका ने फिर अपना बचाव किया – मैं तुझे खोना नहीं चाहती थी… लेकिन मेरे आसपास की दुनिया ने मुझे ऐसा करने नहीं दिया। मैं बेबस थी।
माँ सच है तू बेबस है, तू लड़ नहीं पाई, लेकिन मैंने तो सुना था कि तुम्हारे यहाँ का इतिहास, धर्म और साहित्य माँओं के बलिदानों की कहानियों से भरे हुए हैं! भरे हुए हैं उन कहानियों से जिनमें माँ ने अपने बच्चों के लिए सारी दुनिया से लड़ाई लड़ी और तू इतनी कमजोर निकली…? मुझे आने तो देती… मैं तेरे आँगन को किलकारी, मुस्कान, अपनेपन और प्यार से भर देती। मैं तेरा अकेलापन दूर करती, जब तुझे जरूरत होती मैं तेरे साथ खड़ी होती। तेरी हिम्मत, तेरी ताकत बनती, तेरा सहारा होती… लेकिन शायद दूसरों की तरह ही तूने भी मुझे इस लायक नहीं समझा…। – उस आवाज ने कहा।
मैं… मैं… मैं भी लड़ना चाहती थी, लेकिन अकेली थी, किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। – राधिका ने साफ किया।
तुझे अपने बच्चे को बचाने के लिए साथ की जरूरत थी, सच और न्याय के लिए तू अकेले नहीं लड़ सकती थी! – वो आवाज कुछ क्षण के लिए रूकी – सही किया तूने… अच्छा किया जो मुझे मार डाला, क्योंकि जहाँ सच और न्याय के लिए लड़ाई इसलिए न लड़ी जाए कि हम अकेले हैं, जहाँ स्त्री को देवी का दर्जा दिया जाए और उसकी पूजा का ढोंग तो किया जाता हो, लेकिन उसके जीवन को नकारा जाता हो। जो समाज स्वतंत्र और आधुनिक तो हो, लेकिन स्त्री की सुरक्षा और सम्मान का दायित्व नहीं उठा सकता हो। जहाँ बेटी और बेटे में फर्क किया जाता हो वहाँ मेरे होने का फायदा भी क्या था? क्या हो जाता एक मेरे बच जाने से… यहाँ तो हर घड़ी अजन्मी बेटियाँ मरती हो, जहाँ जीव हत्या तो पाप मानी जाती हो, लेकिन भ्रूण-हत्या पर सब मौन हो… जहाँ हर घड़ी बेटियों को प्रताड़ना, शोषण और अपमान का सामना करना पड़ता हो, वहाँ एक अकेले मेरे जिंदा होने का फायदा भी क्या था? – आवाज थम गई थी, थक गई थी।
बेटा इस समाज में औरत का जीवन बहुत मुश्किल है। हर कदम पर उसे विरोध, प्रताड़ना और शोषण का सामना करना पड़ता है। तू जिन इतिहास, धर्म और साहित्य की बात कर रही है ना, वो भी स्त्री के शोषण की कहानियों, घटनाओं से रंगे पड़े हैं। जन्म से पहले मारे जाने की दास्तां तो क्या नई है। जन्म के बाद भी उसे कई-कई मुसीबतों, परेशानियों और बंधनों में अपना जीवन गुजारती है। खाने, पहनने और पढ़ने के लिए पक्षपात की जो शुरुआती होती है, वो जीवन के अंत तक जारी रहती है। – राधिका ने बचे हुए साहस को बटोरते हुए अपनी बात कही।
हाँ… हाँ शायद इसीलिए तूने मेरे जीवन के लिए संघर्ष नहीं किया? – थकी-बुझी आवाज – सही किया… जो तून मुझे पैदा होने से पहले ही मार दिया। पैदा हो भी जाती तो क्या होता? भाई के आते ही कदम-कदम पर पक्षपात सहती। पढ़ना चाहती, लेकिन पढ़ाया नहीं जाता। तू जो मेरे जीवन-मृत्यु का फैसला तक नहीं कर पाई, तू क्या मेरे भविष्य का फैसला कर पाती… पता नहीं तूने खुद अपने लिए कभी कोई फैसला किया भी है या तेरे सारे फैसले दूसरे लेकर तुझे सुना देते हैं… जैसे ये… कि तेरी कोख में पल रहे बच्चे का क्या किया जाना है? उसे जीने दिया जाना है या फिर मार दिया जाना है। जब ये निर्णय तक तुझसे नहीं हो पाया तो तू क्या मेरी जिंदगी और मेरे भविष्य का निर्णय कर पाती? जिस समाज में औरत के जन्म से लेकर मृत्यु तक का निर्णय कोई और करे, उस समाज में जन्म लेकर भी क्या हो जाता? अब सोचती हूँ तो लगता है कि ठीक ही किया माँ तूने… जो मुझे इस नर्क में आने से पहले ही मार दिया। जिस दुनिया में अपने ही घर में बहन-बेटियाँ सुरक्षित न हो, जिस दुनिया में औरतों को प्यार करने का हक तक नहीं दिया जाता हो, जिस दुनिया में स्त्रियों की कीमत ढोरों से भी कम आँकी जाती हो, जिस दुनिया में माँ को ईश्वर का दर्जा तो दिया जाता है, लेकिन उसके बीज रूप को ही कुचल दिया जाता हो। भला बताओ जब बीज को ही कुचल दिया जाए तो फिर पेड़ कहाँ से आएँगें…? आज तो दौड़ रहे हैं सीमेंट की सड़क पर चार पहियो में बैठकर जब धूप पड़ेगी, तो सिर छुपाने कहाँ जाएँगें…? तब कहाँ जाएँगें, जब बेटों के लिए बहुओं की जरूरत होंगी… भाईयों की सूनी कलाइयों को बहनों के प्यार भरे धागों की जरूरत होगी। तब पेड़ों की छाँह चाहेंगे तो कहाँ से होगी…, तब बेटियों की खेती करेंगे तब भी बेटों के लिए दुल्हनें नहीं ला पाएँगें… । इसे ही तो कहा जाएगा अपनी जड़े खोदना… विज्ञान ने इतनी तरक्की तो कर ली कि ये जान लें कि कोख में पल रहा जीव नर है या मादा… लेकिन अभी तक इतनी तरक्की नहीं की है कि बिना औरत के अपनी दुनिया, अपना वंश बढ़ा सके…। इसके लिए तो औरत की जरूरत पड़ेगी ही… अपने मकान को घर बनाने में, अपनी दुनिया को अपनी जिंदगी बनाने में औरत की ही जरूरत होगी और आपकी दुनिया का ये दुर्भाग्य है कि वो औरत किसी कारखाने में नहीं बनती है, किसी खेत में नहीं उगती है। वो तो पैदा होती है… और बढ़ती है। लेकिन नहीं… बहुत सवाल हो गए, आपकी दुनिया की गज़ालत और जहालत से मैं दूर ही भली। आपने अच्छा ही किया जो मुझे इससे दूर ही रखा… अच्छा किया जो मुझे इस नर्क में आने से पहले ही मुक्त कर दिया। अच्छा किया माँ… जो मुझे तूने जन्म होने से पहले ही मार दिया…। अच्छा किया तूने… मुझे खुद ही तेरी दुनिया में नहीं रहना। बहुत अच्छा किया…।

Sunday, 18 September 2011

चार खूँटों से बँधी जिंदगी...!


सलीका - उठते ही सोने से फैले बालों को बाँधने के क्रम में वह ड्रेसिंग टेबल की तरफ गई और कंघी उठाकर बालों में गड़ाते हुए जैसे ही उसने आईना देखा… ऊब की लहर ऊपर से नीचे और हताशा की लहर नीचे ले ऊपर की तरफ दौड़ी। हर दिन वही चेहरा... उसी तरह की नाक, वही आँखें... सब कुछ वैसा ही, वहीं... उफ्! उसे अपने दिन का मूड समझ आ गया। वो वहीं स्टूल पर धपाक से बैठ गई। उसी हताशा में उसने एक बार फिर अपने चारों ओर नजरें दौड़ाई... हर चीज उसी जगह, कई दिनों से... बल्कि कई सालों से हरेक चीज है अपनी जगह ठिकाने से... सलीके से... । एकाएक उसे लगा कि ये सलीका ही उसकी परेशानी है। मन किया... सब कुछ को हाथ से फैला कर तितर-बितर कर दे। कुछ उठाकर जमीन पर पटक दे... कुछ... कुछ ऐसा करे जो उसे बदला सा महसूस कराए... लेकिन... लेकिन ये दिमाग। करो... कर ही डालो... फिर बिसूरते हुए समेटना भी तुम ही...।

नफासत - दफ्तर जाते हुए – वही रास्ता, सालों से वही… और वहीं दुकानें, पेड़, सड़क यहाँ तक कि गड्ढे तक... पता होता है कहाँ गाड़ी धीमी करनी है और कहाँ गियर बदलना है। इतनी उकताहट कि लगता है कि कुछ दिन यूँ ही सोते रहे... शायद आसपास की दुनिया एकाएक बदली हुई-सी दिखे, लेकिन ये हो ही कैसे। कई बार उसे लगता है कि क्यों नहीं वो खुद ही अपने आप को बदल डालती? थोड़ा हेयर-स्टाइल बदल ले और थोड़े कपड़ों का स्टाइल... खुद भी काफी बदली नजर आएगी... लेकिन क्या ये बदलाव अच्छा होगा...? लीजिए सलीके के बाद दूसरी समस्या आ खड़ी हुई... नफासत...!

विश्वास - दफ्तर में वही जद्दोजहद... वही जगह, एक ही से चेहरे, वैसे ही एक्सप्रेशन्स और उसी तरह की बातें...। हर जगह सब कुछ इतना जाना पहचाना कि आँखें बंद कर यदि हाथ बढा़ओ तो जो हाथ आए वो परिचित चीज निकले...। उफ्....! यहाँ क्या वो खुद बदलाव नहीं कर सकती? कुछ नए लोगों से दोस्ती करे, कुछ नए लोगों को जानें, उनसे बातें करें... उनकी दुनिया में झाँके कुछ पात्र, कुछ कहानी, कुछ अनुभव उठा लें... लेकिन... लेकिन क्या ये इतना आसान है! एकाएक परिवर्तन से कईयों की भौहें तनेगी... फिर इसमें भी कौन दोस्ती के लायक है और कौन नहीं? किससे आपकी वेवलेंथ मैच करेगी और किससे नहीं... ये सब जानते-जानते पता नहीं किस ट्रेप में फँस जाए...। आखिर तो झटकना भी कहाँ आसान है, उसके लिए...? तो एक और समस्या या संकट... विश्वास का...!

सुविधा - शाम ढलते हुए ऑफिस से लौटना... 15 मिनट उपर हो या फिर 10 मिनट नीचे... सड़कों के हाल एक-ही से...। रोशनी का एक-सा जमावड़ा, ट्रेफिक जाम, हर दिन जैसा शोर। पटरी पार कर सड़कों को घरते ठेले, पुलिसवालों की मशक्कत-चिढ़ और खीझ...। उसी तरह की मनस्थिति... फिर से वही सब कुछ घर पहुँचकर... चाय या फिर कॉफी...। बनाना, खाना, टीवी देखना, टहलना, दिन भर का राग दोहराना...। अच्छे-बुरे पढ़ने को दोहराना। किसी अच्छे अनुभव को सुनाना-सुनना। छाया-गीत तक रेडियो के करीब पहुँच जाना। ज्यादातर उद् घोषक के बुरे चुनाव पर खीझना या फिर किसी अच्छे गाने को इत्मीनान से सुनने के चक्कर में घड़ी कि टिक-टिक को नजरअंदाज कर देना और फिर सोचना उफ् आज फिर देर...। सोते हुए जिस भी तरफ सिर करो... कमरे की हर चीज जानी पहचानी लगती है। कभी पूर्व तो कभी पश्चिम में सिर की दिशा रखी और नजरों को हर एंगल पर घुमा लिया... बदला कुछ भी नहीं... सब कुछ वैसा ही नजर आया। क्यों नहीं ऐसा कर लेती कि किसी शाम टीवी छोड़ दें... देर रात तक सड़कों पर आवारगी करते रहे या फिर गहरे गाढ़े अँधेरे को ओढ़कर किसी मीठी-सी धुन में खुद को डूबने-उतरने के लिए छोड़ दें। छाया-गीत का लालच छोड़ दे या फिर सुबह की चिंता छोड़ दे... देर रात तक अपनी फूलझड़ियों, छालों, फूलों और काँटों का हिसाब करते रहे... या फिर घड़ी को ताक पर पटककर समय को अँधेरे में से गुजर जाने दे...। नहीं होता, बहुत सोचते रहो तब भी नहीं होता... देर से सोए तो सुबह देर से उठेंगे या जल्दी उठ गए तो दिन भर काम करना मुश्किल होगा... फिर वही क्रम दोहराया जाएगा आखिर यहाँ मसला अ-सुविधा का है...।

वह सोचती है कि जिंदगी के चारों कोनों को खूँटे से बाँधने के बाद स्पेस, आजादी और चेंज की ख्वाहिश करना कितना हास्यास्पद है ना...! चाहना-चाहना-चाहना... अपने कंफर्ट ज़ोन में बैठकर सिर्फ चाहने से क्या बदलेगा? बदलने के लिए उसे तो छोड़ना ही पड़ेगा ना... तो...?

Sunday, 11 September 2011

दो कप भावना और आधा कप बुद्धि...!


यूँ गणपति स्थापना को चार-पाँच दिन हो चुके थे। आते-जाते अकाउंट्स डिपार्टमेंट के बाहर की रौनक-सजावट नजर आ ही जाती थी, सुबह-शाम गणपति की आरती का प्रसाद भी संपादकीय विभाग में आ जाता था। गणपति की स्थापना यूँ तो संपादकीय विभाग में भी हुई थी, लेकिन ये अलग बात है कि न तो वे कहाँ विराजे हैं, ये नजर आता था और न ही ये कि आरती कब होती है और कौन करता है। शायद संपादकीय के कर्मचारी अपनी कथित बुद्धिजीविता का प्रदर्शन कर रहे हों। जो भी हो, हमारे विभाग में ऐसी कोई हलचल नहीं है। तो ऑफिस में तो त्योहार का कोई भी निशान नजर नहीं आ रहा था।
अकाउंट्स के प्यून ने हमें भी आरती में शामिल होने का न्यौता दिया। याद आया... गणपति मंडप की कितनी खूबसूरत सजावट की गई है, लेकिन अभी तक हमने वहाँ जाकर नहीं देखा। चलो इसी बहाने देख पाएँगें। शाम की आरती का समय... थोड़ा धुँधलका-सा हो चला है। विचार की चकरी चल रही है, आरती के लिए समय का निर्धारण भी कितना सोच-विचार कर किया गया है ना...! दिन-रात के संधि समय में जब दिन विदा हो रहा हो और रात के आगमन की तैयारियाँ हो रही हो... जरा फर्लांग भर की ही तो दूरी है... नहीं! दिन-रात में नहीं... संपादकीय और अकाउंट्स विभाग की बिल्डिंग्स के बीच...। तो उस सजे हुए मंडप में अगरबत्ती की भीनी-भीनी सी खुश्बू, घंटी, करतल और सामूहिक कंठ स्वर... एक-सी लय और दीए की लौ...। आरती की आवाज सुनकर एक-एक कर लोगों का उस मंडप में आना... अद् भुत माहौल... लगातार दिमाग, विचार, तर्क औऱ बुद्धि से घिरे हुए हम जैसे लोगों के लिए ये माहौल बड़ा जादुई है। एक-सी ताल में जय देव जय देव जय मंगलमूर्ति... के बीच कहीं अंदर कुछ सोया हुआ जाग गया... तर्क पर आस्था की चादर उतर आई है और विचार अगरबत्ती के धुएँ के साथ हवा में विलिन हो गए... रह गई वो खुशबू जो तर्कहीन, विचारहीन औऱ बहुत हद तक अबौद्धिक है। लौटे तो बहुत हल्के और तरल होकर... सारा ‘मैं’ कहीं गल गया, झर गया...।


वहाँ से निकले तो लगा जैसे अपने प्राकृतिक क्षेत्र से निकल कर किसी दूसरे की जमीन पर आ खड़े हुए हैं। लगा कि असल में भावना इंसान में इनबिल्ट होती है और तर्क विकसित होते हैं। इस दृष्टि से भावना प्रकृतितः हमारी विरासत है, लेकिन तर्क हम बोते, पनपाते और फिर सजाते सँवारते हैं। जन्म से ही भावना हममें होती है, लेकिन बुद्धि या तर्क का विकास उम्र क साथ होता चलता है। थोड़ा आगे चलें तो भावना संस्कृतियों की वाहक है और तर्क सभ्यताओं के...। थोड़ा और आगे बढ़े तो इस विचार तक (फिर विचार...!) पहुँचते हैं कि सभ्यताओं ने बाँटने का और संस्कृतियों ने जोड़ने का काम किया है। तर्क सिर्फ मानवता को ही नहीं बाँटते हैं, बल्कि इनका काम व्यक्तित्व तक को विखंडित करना है। हम जान ही नहीं पाते कि कब तर्क या बुद्धि हमें खंडित कर देते हैं। फिर बुद्धि का लाभ क्या? क्योंकि अक्सर ये पाया जाता है कि बुद्धि ही हमारे दुख का कारण है। ज्यादातर हमारी खुशियों का आधार भावनाएँ हैं...। तो फिर जीवन में भावना और बुद्धि या तर्क का कांबिनेशन कैसा होना चाहिए ...! डोसे के घोल के प्रपोशन जितना... दो कप भावना (चावल) और आधा कप बुद्धि (दाल)...। सही है ना...!

Thursday, 1 September 2011

मृत्यु बोध के जागते ही...!



कहीं कुछ बेतरह अटका पड़ा है। कई अच्छे-बुरे विचार ऐसे में आ-जा रहे हैं। ऐसे में ही अपने आसपास की दुनिया में बुरी तरह लिप्तता के बीच अचानक कहीं से मृत्यु का विचार आ खड़ा हुआ। मृत्यु पर विचार करने का वैसे तो कोई खास कारण नहीं है, लेकिन शायद कभी पढ़ी फिलॉसफी का असर हो शायद या फिर उम्र का... कि अचानक विचारों के केंद्र में मौत आ गई...। या फिर बचपन में कभी पढ़ी-सुनी बुद्ध की वह कहानी जिसमें उनके शिष्य उनसे पूछते हैं कि – इस दुनिया में आपको सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक क्या लगता है?

तो बुद्ध कहते हैं कि – ये जानते हुए भी कि हमें एक दिन मर जाना है, हमारी दौड़ जारी है।

सचमुच... ये कितना आश्चर्यजनक है, हम सब जानते हैं कि हम सब एक दिन मर जाने वाले हैं, किसी के लिए कोई दिन और किसी के लिए कोई... या शायद आज ही... अभी ... फिर भी हम यूँ जी रहे हैं, जैसे हमें यही रहना है, हमेशा-हमेशा के लिए...।

कहीं से भी विचार करना शुरू करो मृत्यु पर विचार हमें एक ही जगह ले जाता है, जीवन का अंत...। चाहे हमारा दर्शन पुनर्जन्म और आत्मा की अमरता का विचार देता हो, लेकिन ये महज एक विचार है, विश्वास और अविश्वास की सीमा से परे... होने और न होने की सवाल से दूर, क्योंकि इसमें स्मृति नहीं जुड़ती है, इसलिए पश्चिम में प्रचलित दर्शन हमारे जीवन के ज्यादा करीब है कि – मृत्यु जीवन का अंत है... सारी संभावनाओं का अंत है। होना और चाहना का अंत है। और हमारे चाहने और न चाहने से अलग इसका अस्तित्व अवश्यंभावी है।

तो फिर सवाल उठता है कि - क्या हम जीवन-मृत्यु के बीच बस सफर पर नहीं हैं? प्रस्थान जन्म और गंतव्य मृत्यु...? उद्गम जन्म और विसर्जन मृत्यु... प्रारंभ जन्म और अंत मृत्यु... ! बस इसके बीच कहीं जीवन टँगा हुआ है..., शायद इसीलिए इतना दिलफरेब, बिंदास और निश्चिंत... हम सब जानते है कि हरेक की मृत्यु यकीनी है... हमारे जीवन की पूर्णाहुति है, हमारे होने की नियति है। हम चाहे या न चाहे उसके साए से अलग कोई कभी नहीं हो सकता है, फिर भी हम उसे बरसों बरस भुलाए रहते हैं। दरअसल हम ये मान कर जीते हैं कि ये सच हमारा नहीं है, दुनियावी सच है, जैसे दूसरे और सच होते हैं, वैसे ही या यूँ कह लें कि ये तथ्य है, हमारे लिए... दुनिया के लिए चाहे सच हो... हमारे लिए नहीं... । लेकिन हमारे झुठलाने से भी न तो इसकी प्रकृति बदलती है और न ही तासीर... ।

कभी तमाम दुनियादारी औऱ पूर्वाग्रहों से दूर होकर सोचें तो लगेगा कि दरअसल हमारा जन्म ही कदम-दर-कदम मौत की तरफ बढ़ने के लिए हुआ है, क्योंकि उससे अलग हमारे होने की कोई औऱ परिणति हो ही नहीं सकती है। दुनिया के सारे दर्शन और अध्यात्म का अस्तित्व ही इस बात पर है कि आखिरकार हमें सब कुछ से ‘कुछ नहीं’ हो जाना है, हमें मर जाना है, सिर्फ याद बन कर रह जाना है... लेकिन यही सबसे महत्वपूर्ण सत्य को हम भूल जाते हैं। कभी-कभी तो यूँ लगता है जैसे इसी वजह से सारी दुनिया चल रही है। शायद सृष्टि के गतिमान रहने का रहस्य ही ये भ्रम है कि हम कभी मरने वाले नहीं है...

भौतिकता में आकंठ डूबे हुए प्राणियों तक मौत का विचार पहुँचता ही नहीं है, लेकिन जब कभी ये चेतना जागती है यही वो बिंदू होता है, जहाँ से आध्यात्मिकता हमारे जीवन में प्रवेश करती है। और सवाल उठता है कि इस दुनिया का हमारे लिए मतलब ही क्या है? फिर भी हम इस विचार, इस शाश्वत सच से विलग होकर अपना जीवन गुज़ारते हैं। हम भूले रहते हैं कि दरअसल हम उस मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं जिसका कोई विकल्प नहीं है, जिसमें चुनाव की स्वतंत्रता भी नहीं है और जिससे निजात भी नहीं है। हम इस भुलावे में रहते हैं कि हमारी राह हमें किसी दूसरी मंजिल की तरफ ले जा रही है, मौत का रास्ता कोई दूसरा है। हम इस भ्रम में जीते हैं... जीना चाहते हैं कि ये भयावह सच्चाई हमें और हमारे अपनों को छोड़कर शेष बची दुनिया के लिए है, बस यही इस सच्चाई की खूबसूरती है और यही दौड़ते रहने का अभिशाप भी... इसी की वजह से जीवन की दौड़ का अस्तित्व है... और इसी के होने से जीवन के अर्थहीन होने की चेतना भी... हम सब इस सच के साथ जीते हैं, लेकिन उसके अहसास से दूरी बनाए रखते हैं। कितना अजीब है कि हम लगातार मृत्यु के साए में जीते हैं, लेकिन लगातार उससे बहुत दूर होने के भ्रम को पाले रहते हैं। हर वक्त हमारे साथ चलते इस साए को हम महसूस तक नहीं करते हैं। हम दौड़ में हैं, लगातार, एक-दूसरे को धकियाकर आगे जाने की दौड़ में... सबसे आगे होने, होना चाहने की दौड़ में। एक मंजिल को पाकर दूसरी कई-कई मंजिल को पाने की दौड़ में, इस सच के बाद भी कि एक दिन यहीं सब कुछ छूट जाना है, एक... भ्रम... एक झूठ... जिंदगी को संचालित करता है और हमें वो खूबसूरत लगती है... कितना अजीब है ना...!

Friday, 19 August 2011

रोज शाम भविष्य में थोड़ा मर जाता हूँ...!



इतिहास निर्मित होने के दौर में इतिहास की गुत्थियों को जस-का-तस रखती किताब पढ़ना, क्या है ? - वस्तुस्थिति से मुँह मोड़ना! या फिर वर्तमान को इतिहास के संदर्भ से समझने की कोशिश करना...! ...पता नहीं! बहुत दिनों से अटका पड़ा पढ़ने का क्रम न जाने कैसे आज शुरू हुआ तो ओम थानवी की यात्रा संस्मरण (ऐतिहासिक-स्थल की यात्रा) मुअनजोदड़ो के पूरा होने का मुहूर्त बन ही गया। इस बीच अण्णा-आंदोलन-गतिरोध-भ्रष्टाचार और पक्ष-विपक्ष पर भी नजरें पड़ती रही।

जैसा कि होता है – खत्म होने पर हमेशा सवाल खड़ा होता है ‘औचित्य का’। यहाँ किताब को पढ़ने का। क्यों पढ़ी गई... ? जानना लक्ष्य था या फिर पढ़ना... यदि जानना लक्ष्य था तो क्या जान लिया और यदि पढ़ना ही लक्ष्य था तो यही क्यों? फिर सवालों का जंजाल... इसी में से निकलता है एक और पुराना सवाल जो गाहे-ब-गाहे जाग जाता है - ‘आखिर इतिहास पढ़ने-पढ़ाने का लक्ष्य क्या है?’, क्या वाकई हम इतिहास इसलिए पढ़ते हैं कि हम उससे सबक सीख सकें! आज तक हमने इतिहास से क्या सबक सीखे? अभी तो किसी ऐतिहासिक घटना पर हमारे इतिहासविद् और विशेषज्ञ निश्चित नहीं है। फिर अपने-अपने पूर्वाग्रह और उस आधार पर स्थापित सिद्धांत... ढेर सारी स्थापनाओं के प्रतिपादन और खंडन-मंडन के बाद भी अब तक इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सका कि 1. मुअनजोदड़ों के संस्थापक कौन थे और कहाँ से आए थे? 2. वैदिक सभ्यता ज्यादा पुरानी है या फिर मुअनजोदड़ो की! और 3. सभ्यता का अंत कैसे हुआ? अब तक लिपि पढ़ी नहीं जा सकी तो सभ्यता को जानने में कोई मदद नहीं मिली...। मान लिजिए कभी जान भी लें इन सारे और इनके जैसे और कई सारे सवालों के जवाब तो क्या फर्क पड़ेगा? क्या वर्तमान ज्यादा खुशनुमा बन जाएगा। आज तक कितनी सभ्यताओं, व्यवस्थाओं, राष्ट्रों, सरकारों, संस्थाओं और व्यक्तियों ने इतिहास से सबक ग्रहण किए हैं?

तो आखिर पढ़ ही लिए गए सारे दावे-प्रतिदावे, इतिहास को खोजने के ऐतिहासिक प्रयास ...तो... उससे क्या हुआ! क्या पाया?

शुरू हुआ खोने-पाने का शाश्वत हिसाब... भौतिक हो, जरूरी नहीं, लेकिन होता है। सफर में न हो तो सफर खत्म होने पर ... जीवन में न हो तो जीवन के अंत में होगा... चाहे हम कितना ही इंकार कर लें। दो और दो चार का गणित पीछा नहीं छोड़ता... हिसाब के रूप में न हो तो विश्लेषण के रूप में, होगा ही। और जब ये सवाल उठता है तो फिर अब तक हुए सारे कर्म अपना-अपना बही खाता लिए हाजिर हुए चले जाते हैं। हमारा भी हिसाब कर दो... हमारा भी कर दो... हमारा भी...। मतलब हिसाब से मुक्ति नहीं है। तो क्या यहीं से जुड़ते है अतीत-वर्तमान-भविष्य के सिरे...! ओम जी की ही किताब से अज्ञेय की कविता की पंक्तियाँ – ‘रोज सबेरे मैं थोड़ा-सा अतीत में जी लेता हूँ / क्योंकि रोज शाम को मैं थोड़ा-सा भविष्य में मर जाता हूँ।’

यही है चक्र... इतिहास को जानने का, वर्तमान को जीने का और भविष्य में मरने का... पैदा होने, जीने और मरने का...:(



Friday, 12 August 2011

बड़े नोट-सा दिन... रेजगारी-सी रात...!



दिन तो महीने के अंत में पगार की तरह फटाफट खर्च हो जाता। आखिर में हथेली में फुटकर.. रेजगारी की तरह रात बच जाती है। सब कुछ खर्च करने के बाद बची रेजगारी कितनी कीमती होती है ये तो खत्म हुई सेलैरी के बाद ही जाना जा सकता है। तो बची हुई रेजगारी को दाँत से पकड़ते हुए हर रात किफायत बरतने की जद्दोजहद के साथ आती और फिसल जाती है। बचाते-बचाते भी फिजूलखर्ची हो ही जाती थी।

उस रात दिन भर की दुनियादारी झड़ गई थी औऱ रात खालिस होकर उतरी थी। पूनम की तरफ बढ़ता चाँद अपनी रूठी चाँदनी से रात को रोशन करने की कोशिश ही कर रहा था कि न जाने कहाँ से भूरी-लाल बदली ने उसे अपनी आगोश में समेट लिया था। रात गाढ़ी हो चली थी, न चाहते हुए भी एक-एक कर सिक्के खर्च हुए जा रहे थे। अचानक जैसे आखिरी बचे चंद सिक्कों की कीमत का खयाल आ गया हो और मुट्ठी तो पूरी ताकत से भींच लिया...। बाहर बारिश जैसे सितार के तारों को छेड़ रही थी और अंदर रेडियो भी जैसे राग नॉस्टेल्जिया बजा रहा हो। घर आजा घिर आए, बदरा साँवरिया... यादों के कबाड़ से कुछ बहुत ही मजेदार चीजें निकल आईं जैसे - बचपन में मोटी रही लड़की का नाम भाइयों ने मोटा आलू कर दिया और उसकी शादी तक हम सब उसे मोटा आलू ही कहते रहे, इसी तरह मोटी-नाक वाले लड़के का नाम भजिया आलू रख दिया और बाद में दोनों के नामों को एक साथ इस्तेमाल करते हुए मोटा आलू और भजिया आलू कह-कह कर चिढ़ाते रहते... घिर-घिर आई बदरिया कारी... यादों की पिटारी में कई सारी कबाड़ है, कई तो ऐसी कि उसे हाथ लगाते ही कहीं अंदर काँटे गड़ने लगे। सुनाते-सुनाते ऐसी हँसी चली कि हँसते-हँसते आँसू ही आ गए... गुजरा जमाना बचपन का... बाँहें गर्दन के नीचे से गुजरी, प्यार और आश्वासन की थपकी दिमाग के सनसनाते हुए तंतुओं पर एक गति से पड़ने लगी, दिमाग थोड़ा-सा शिथिल हुआ... एक-एक कर सिक्के खत्म होते जा रहे हैं... रेडियो बजा रहा है शराबी-शराबी ये सावन का मौसम... बस यूँ ही-सा एक विचार आया... कितना भी सुख हो, कितना भी दुख... आखिर तो एक दिन सब खत्म होना ही है... एक दिन तो मर ही जाना है... तो फिर ये स्साली जिंदगी सही क्यों नहीं जाती है...?

सावन के झूले पड़े, तुम चले आओ... कहते हैं कि कितनी भी जरूरत हो एक सिक्का हमेशा बचा कर रखना चाहिए, उसे बरकती सिक्का कहते हैं, फिर वही रात है, फिर वही रात है ख्वाब की... तो एक दिन सब कुछ के खत्म हो जाने के विचार के बाद भी उस आखिरी सिक्के को हथेली में मुट्ठी भींच कर बचा लिया कि कल फिर से नई शुरुआत होगी... बरकत बनी रहेगी...।

Tuesday, 19 July 2011

काश ऐसा हो पाता....!


साढे़ सात बजते न बजते पूरा घर खाली हो जाता है... सब अपने-अपने काम पर निकल जाते हैं और घर में रह जाती है सुगंधा अकेले...। पहाड़ जैसा दिन सामने पड़ा हुआ है और करने के लिए कुछ होता ही नहीं है। घर फिर से 3 बजे गुलजार होगा, तब तक उसे कभी टीवी, तो कभी अखबार-पत्रिकाओं, मोबाइल फोन या फिर किताबों से सिर फोड़ना होता है। तो सुबह साढ़े सात के बाद वह फिर से बिस्तर में घुस जाती है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। कितनी ही कोशिश करे वो दिमाग की चर्खी को चलने से नहीं रोक पाती। कभी अपने खालीपन का कीड़ा, कभी पिता का स्वास्थ्य तो कभी माँ की चिंता... कभी भाई की चिंता, कभी बच्चों की पढ़ाई, पति का स्वास्थ्य तो कभी यूँ ही खुद का भविष्य...(कभी-कभी वो खुद से सवाल करने लगती है कि क्या जिंदगी यही है, इसी तरह से जाया होने के लिए... या इसका कोई मतलब है, लक्ष्य है....? उसका पति भी उसके इस तरह के सवालों से तंग आ चुका है, लेकिन वो क्या करे!) तो कभी कुछ और... कुछ-न-कुछ तो लगा ही रहता है उसकी जान को...। समझाने को तो वो किसी को भी ये समझा सकती है कि चिंता किसी भी समस्या का हल नहीं है, लेकिन खुद को समझा पाने जितनी समझ पता नहीं कैसे उसमें अभी तक नहीं आ पाई है। तो रात भर एक खलिश उसके नींद के उपर एक पलती झिल्ली सी पड़ी रही और उसकी नींद उसके नीचे कुनमुनाती रही। सुबह का अपना कर्म पूरा कर उसने खिड़कियों के खुले पर्दे खींच दिए। पंखे की स्पीड कम कर दी और चादर तानकर सोने की कोशिश करने लगी। वो झिल्ली अभी भी जहन पर पड़ी हुई है... क्या करे उसका...?
बारिश का मौसम भी कुछ अजीब होता है, पंखा चले तो ठंडा लगता है और बंद कर दें तो गर्मी लगने लगती है, तो जब सुगंधा को चादर में ठंड़ा लगने लगा तो उसने अपने सिर तक कंबल खींच लिया। कमरे में वैसे ही अँधेरा था, सिर तक कंबल खींच लेने से अंदर का अँधेरा औऱ गाढ़ा हो गया, तो अँधेरे और कंबल के गुनगुनेपन का आश्वासन पाकर नींद झिल्ली तोड़कर उपर आ गई। थोड़ी देर के लिए दुनिया और दुनिया की चिंताएँ कंबल के बाहर ही रह गई और सुगंधा सो गई। हल्की झपकी के बाद जब उसने कंबल हटाने के लिए हाथ उठाया तो उसे एक अजीब सी दहशत हुई... उसे लगा जैसे वो अंदर बहुत सुरक्षित है और जैसे ही उसने कंबल हटाया बाहर खड़ी दुनिया उसे झपट लेगी... और वो वहीं साँस रोके लेटी रही..., लेकिन जल्दी ही उसका ये भ्रम भी टूट गया। कलाबाई ने घंटी बजाई, तो उसकी आवाज कंबल को छेदते हुए आ गई... सुगंधा ने उठकर दरवाजा खोला। कंबल को घड़ी करने के लिए हाथ बढ़ाते हुए उसने गहरी साँस ली... – काश ऐसा हो पाता कि कबंल के नीचे का अँधेरा, उसे दुनियादारी से मुक्त और दूर कर पाता...। उसने बहुत एहतियात से कंबल को उठाया जैसे ये उसका सुरक्षा घेरा हो और वो उसे छूकर आश्वास्त होना चाहती हो...।

Sunday, 17 July 2011

....मुझको सन्नाटा सदा लगता है!


वो नहीं जानती है कि उसकी आँखें मुझे उसके सारे हाल की चुगली कर देती है। उसे तो बस ये भ्रम है उसके अंदर का तूफान बे-आवाज आता है और गुजर जाता है, किसी को उसकी खबर नहीं लगती है। मैं भी उसके भ्रम को भ्रम ही रहने देता हूँ। उस दिन भी हम दोनों एक रिसर्च पेपर के लिए नोट्स ले रहे थे, और उसके अनजाने ही उसकी बेचैन तरंगें मुझे लगातार झुलसा रही थी... जला रही थी। बार-बार उसका गहरी साँस लेना... मुझे भी बेचैन कर रहा था, लेकिन पता नहीं कैसी जिद्द में था कि बस... पूछा ही नहीं। ये जानते हुए भी कि वो खुद अपनी बेचैनी का पता कभी नहीं देगी...। हम दोनों के बीच बहुत बातें हुआ करती है, लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी होता है, जो अनकहा ही रह जाता है। पता नहीं उसमें से भी कितना हम दोनों समझ पाते हैं और कितना छूट जाता है!
वो एक प्रोजेक्ट से सिलसिले में बाहर जाने वाली थी। उसने कुछ कहा नहीं था, मैंने कुछ पूछा नहीं... सुबह-सुबह जब मैं उसके घर पहुँचा तो वे अपना सामान निकालकर ताला लगा रही थी। मुझे देखकर वह चौंकी नहीं... ऐसे जैसे... वो तो जानती ही थी कि मैं पहुँचूगाँ ही...। बिना कुछ कहे मैंने उसका एयरबेग उठा लिया। वो भी कुछ नहीं बोली और गाड़ी में बैठ गई। वो कहीं और थी... गियर बदलने की मजबूरी के बाद भी... पता नहीं कैसे मैनेज कर लेता हूँ और उसके हाथ पर अपना हाथ रख देता हूँ। वो सूनी आँखों से देखती है, कुछ नमी तैरती है और इशारे से सामने देखने की ताकीद करते हुए फिर कहीं गुम हो जाती है। गाड़ी के जाते ही मुझे लगने लगता है जैसे मैं बहुत थक गया हूँ और अभी यहीं आराम करना चाहता हूँ। खाली स्टेशन पर हाल ही में खाली हुई बेंच पर जाकर बैठ जाता हूँ।

उन तीनों दिन में लगभग हर दिन उससे बात हुई थी, लेकिन कल दिनभर कुछ ऐसा हुआ कि कुछ मैं बिज़ी रहा, कुछ वो और कुछ नेटवर्क... तो बात हो ही नहीं पाई। आज उसे लौटना है।
सुबह से ही जैसे मुझे किसी आहट का इंतजार है। आज मेरी छुट्टी है और दिन भर सामने पसरा है एक लंबे-चौड़े मैदान की तरह... अब मुझे उससे खेलने की स्कील जुटानी है। मोबाइल बजा तो कई बार... लेकिन मेरी चेतना जैसे किसी खास आवाज की राह देख रही है। शाम... जब आधी नींद और पूरी खुमारी के बाद जागा तो आखिर वो आहट सुनाई दी।
कहाँ हो...?
घर पर ही, कब लौटी? – जानते हुए एक बेकार-सा सवाल।
मैं आ रही हूँ। - सारी औपचारिकता को दरकिनार कर धरती-सी उदारता के साथ उसने सूचना दी।

दिन भर तेज धूप रही, लेकिन शाम घिरते ही ना जाने कैसे आसमान पर बादल जमा होने लगे। उसके आने की खुशी में मैंने घर की हर चीज को छूकर देखा... पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगा कि मेरी ही तरह मेरे घर को भी उसकी आमद का इंतजार है। उसकी ही गिफ्ट की हुई बाँसुरी की सीडी लगाई... और आवाज को बहुत धीमा कर दिया। बॉलकनी में दो कुर्सियाँ और टेबल लगाई, क्योंकि वो जब भी आती है, यहीं आकर बैठती है, बिल्डिंग के पिछले हिस्से में कॉलोनी के बगीचे के ठीक उपर ही है मेरी बॉलकनी...। घर के सारे दरवाजे-खिड़की और पर्दे खोल दिए। वो जब आई तब तक ठंडी हवाएँ चलने लगी थी। उसने पर्स सोफे पर पटका और सीधे बॉलकनी की कुर्सी में जाकर धँस गई। वो अपने टूर के बारे में बता रही थी, मैं उसे सुन रहा था... देख रहा था। अचानक उसकी बेचैन साँस ने मुझे फिर से छुआ, एक सिहरन हुई... वो उठकर अंदर आ गई...। उसने शिकायत-सी की - कितना शोर है!
पार्क में खेलते बच्चों की चिल्लपों के साथ ही आसपास के और भी लोग लगता है कि अच्छे मौसम को लूटने के लिए पार्क में जमा हो गए थे और उन सबकी सम्मिलित आवाजें... नीचे से गुजरते वाहनों का शोर... मुझे भी महसूस हुआ कि वाकई बहुत शोर हो रहा है। वो ड्राइंग रूम के सोफे पर आकर बैठ गई। सोफे की पुश्त पर सिर रखा – ये लाइट और ये म्यूजिक सिस्टम बंद कर सकते हो? – उसने जैसे गुज़ारिश की।
यार... आजकल मैं लाइट और साउंड को लेकर बहुत संवेदनशील हो चली हूँ। मुझे लगता है कितना शोर है आसपास... कितनी आवाजें आ रही है। मुझे रोशनी बेचैन करने लगी है। टीवी, रेडियो, वाहनों यहाँ तक कि पंखे के चलने की आवाज... और कभी-कभी तो घड़ी की सुईयों के सरकने की आवाज तक मुझे बेचैन किए देती है। - उसने अपनी हथेलियाँ खोलकर उँगलियाँ अपने बालों में कस ली। बाहर तेज बारिश होने लगी तो पार्क पूरा खाली हो गया। एक तरह से सारी कृत्रिम आवाजें बंद हो चली थी। वो उठकर बॉलकनी में आ गई।
मैंने उससे पूछा - चाय पिओगी...?
हाँ, नींबू है...?
नींबू चाय पीना है? – मुझे याद आया... उसे पसंद है। उसने कहा कुछ नहीं... बस गर्दन हिलाकर हाँ कर दी।
यूँ भी शाम उतर रही थी और फिर घने बादलों ने रोशनी और भी कम कर दी थी। धीरे-धीरे अँधेरा गाढ़ा होने लगा था। मैं किचन में चाय बनाने चला आया। चाय लेकर लौटा तो लाइट जा चुकी थी। बारिश बहुत तेज होने लगी थी... अब सिर्फ बादलों के बरसने की आवाज के अतिरिक्त और कोई आवाज शेष नहीं थी। स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी में उसने चाय का गिलास उठा लिया था। उसने बहुत मायूसी से कहा – शोर है दिल में कुछ इतना/ मुझको सन्नाटा सदा (आवाज़) लगता है। बिजली की चमक में उजाले में मैं उसकी आँखों में समंदर उतरते देखता हूँ और खुद को उसमें डूबते पाता हूँ। एक गहरी साँस आती है, मेरा समंदर तो ये भी नहीं जानता है कि कोई उसके खारे पानी में घुट कर मर रहा है।
चाय का सिप लेकर गिलास को दोनों हाथों में थामते हुए वे कहती है – नाइस टी...।

Sunday, 3 July 2011

संघर्ष खुद से....!


मैंने उसे बहुत गहरी नींद से जगाया था। हड़बड़ा कर उठी थी वो... मैंने उसे आदेश-सा दिया, मेरे साथ चल, मुझे तुझसे कुछ बात करनी है...। मैं समझती हूँ कि वो बहुत गहरी नींद में थी, लेकिन मैंने उसकी कलाई को बहुत सख्ती से पकड़ लिया, और घसीटती हुई ही उसे ले जाने लगी थी। रात गहरी थी, सन्नाटा घना... वो अनमनी-सी, समझ नहीं पा रही थी कि मैं उसके साथ ऐसा क्यों कर रही हूँ!
लग तो मुझे भी रहा था कि मैं ये क्या कर रही हूँ? क्यों? का जवाब था मेरे पास, क्योंकि एक खऱाश, खलिश, घुटन मुझे लगातार महसूस हो रही थी और मुझे लगने लगा था कि बस उसकी वजह वो ही है। हम चलते चले जा रहे थे। एकाएक लगा कि एक नदी उग आई है, (तब मेरा विश्वास यकीन में बदल गया कि, मैं सपना देख रही हूँ, क्योंकि नदियाँ क्या ऐसे उगा करती है? सदियों तक पानी बहता है, तब जाकर नदी का रूप लेता है। खैर).... उछलती-कूदती शोर मचाती नदी रात के अँधेरे में थोड़ी और शैतान लगने लगी है। किनारे पर रखे पत्थरों पर हम दोनों ही बैठ गई। मुझे पता नहीं चला कि कब मेरी उँगलियों की पकड़ ढीली हो गई। मेरे चेहरे की सख्ती थोड़ी ढल गई। उसने अब मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा – हाँ, बोल...।
मेरी नजर सीधी-काट देने वाली – तू जानती नहीं है क्या?
क्या? – उसका बहुत मासूम-सा सवाल
तू नहीं जानती है कि मुझे कितनी घुटन हो रही है, खुद को मैं कितना उपेक्षित होते हुए देख रही हूँ...! – मैंने तल्ख होकर उससे पूछा था।
उसके चेहरे पर बहुत भोलापन उतर आया... – नहीं, तू क्यों घुटती है, औऱ तेरी उपेक्षा कौन कर सकता है?
तेरी वजह से हो रहा है ये सब... – मैने थोड़ा नर्म होकर उससे कहा। मेरे अंदर कुछ बेतरह सुलग रहा था। - तेरे दिखने ने मेरे होने को खत्म कर दिया है। ये मत समझना कि मैं तुझसे जलती हूँ... – मैंने तीखी बात को अंदर ही ठेल दिया।
बस तू मुझे मुक्त कर दें... मुझे घुटन होने लगी है। ये भौतिकता मुझ से नहीं सधती है। लगातार सतर्कता... जैसे सारी ऊर्जा एक ही जगह जाया हो रही है। - रोकते-रोकते तक कड़वाहट उभर ही आई।
जाया हो रही है? - उसने आहत भाव से पूछा।
हाँ, सारी चेतना जैसे एक ही जगह बह रही है, तेज प्रवाह से... भौतिक होने पर... दैहिक होने पर... मुझे उससे निजात चाहिए। - मैंने जैसे फैसला सुना दिया।
मेरे करने से कहाँ कुछ बदलता है? - उसने अपनी बेबसी जाहिर की। - कितना भी करो, भौतिकता से कहाँ निजात है। कौन हमारे होने तक पहुँच पाता है, या पहुँचना चाहता है! किसके पास है इतनी फुर्सत...? - ना चाहते हुए भी उसकी पीड़ा छलक पड़ी थी।
पता नहीं ये पूरे चाँद की रात का असर है या यूँ ही-सा एक जुनून सवार था, मैं किसी भी कीमत पर हार मानने को राजी नहीं थी। कुछ चाहना अपना भी होता है मेरी जान... – ताना मारा था, मैंने।
तूने कब चाही मुक्ति... तू भी इसमें धँसे रहना चाहती है। आखिर तो किसे पसंद है, हर दिन, हर वक्त की जलन, चुभन, उबलन और बेचैनी...। बाहर सबकुछ खूबसूरत होना बहुत बड़ी राहत है, ये तो तू भी जानती ही है ना...! – उसे घायल करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही हूँ। कभी-कभी होता है ना एक तरह का पागलपन सवार... बस ये कुछ ऐसा ही था, जब हम जानते हैं कि ये सरासर पालगपन है, फिर भी उसे जारी रखे रहते हैं, क्यों... ये तो सोचते ही नहीं।
उसकी बड़ी-बड़ी आँखे डबडबाने लगी थी, हालाँकि मेरे अंदर कुछ नर्मा रहा था फिर भी एकदम से नहीं। - जब सब कुछ अच्छा लगे तो फिर क्या ठीक करना और क्यों ठीक करना...?
वो एक तरह से मिन्नत ही कर रही थी – देख मैं भी तो तेरे साथ ही लगी हुई हूँ..। तुझसे अलग कहाँ हो पा रही हूँ? जो जैसा तू चाहती है, वैसा ही मैं भी तो कर रही हूँ। तू बता और क्या करूँ, जो तेरी घुटन कम हो..।
वो उठकर मेरे करीब आ गई। मेरी गोद में सिर रख दिया तो मेरे अंदर कुछ बहुत तेजी से पिघलने लगा। मेरी ऊँगलियाँ उसके बालों में घूमने लगी। मैंने उससे वादा लिया – तू हमेशा मेरे ही साथ रहेगी ना...! मुझे कभी अकेला तो नहीं छोड़ेगी ना...! तू जब बाहर हो जाती है ना, तो मैं बहुत अकेली पड़ जाती हूँ। मैं तेरा भीतर हूँ, चाहे जलता हुआ, उबलता हुआ हूँ, लेकिन तेरे होने का साक्षी और साथी भी... तू जानती है ना...!
उसने सिर उठाया, आँखों में अब भी आँसू थे। सिर हिलाकर हामी की और मुझे कमर से कस लिया। कहीं मेरी आँखें भी भीग गई थी। आँसू को ढ़लकने से बचाने के लिए सिर उठाया तो चाँद का अक्स नदी में नजर आया। यूँ ही एक विचार आया कि चाँद तक खुद को निहारता है, तो फिर इंसान की तो बिसात ही क्या है?

Wednesday, 22 June 2011

कैसा होता, जो यह पैसा न होता !


शायद वो सवाल तब उठा होगा जब पड्डू की दुकान पर उसने 10 पैसे के सिक्के के आकार की गोल-गोल सफेद गोलियाँ काँच की बर्नी में पहली बार देखी होगी। वो गई तो थी 10 पैसे में चार मिलने वाली नारंगी की गोलियाँ लेने, लेकिन उन सफेद गोलियों को देखकर उसका मन बदल गया। लालच आया कि इन सफेद बड़ी-बड़ी गोलियों का स्वाद लेकर देखा जाए, लेकिन पड्डू ने ये कह कर उसे मायूस कर दिया कि ये गोली 10 पैसे में एक ही आएगी। वो उसकी दुकान के उस अनगढ़ पत्थर पर मजबूती से अपने पैर जमाए सोचने लगी कि अब क्या करें?
हाथ में पैसे तो 10 ही है। एक गोली मिलेगी तो उसमें से भाई का भी हिस्सा होगा... मतलब आधी-आधी... ऊँ हूँ... लेकिन... उसने तुरंत निर्णय ले लिया – ठीक है आधी-आधी ही सही। कम-से-कम इस सफेद गोली का स्वाद तो पता चलेगा। ठीक है यही दे दो।
वो गोली लेकर घर आ गई। दोनों के हिस्से में आधी-आधी गोली आई। मीठी और मिंट वाली वो गोली उसे बहुत अच्छी लगी, लेकिन है बहुत महँगी। कहाँ तो नारंगी की गोली 10 पैसे में चार आती है और कहाँ ये 10 पैसे में एक ही देता है... पड्डू ठगता है। किसी ओर दुकान पर पता करूँगी। जब आसपास की दो दुकानों पर भी यही भाव रहा तो उसके मन में बहुत गंभीर सवाल उठा – ये पैसा क्यों है? क्या होता यदि ये पैसा नहीं होता?
उस रात खासी बारिश हो रही थी और घर की लाइट गुल हो चुकी थी... पढ़ाई से मुक्ति थी... इसलिए कल्पना के घोड़े खूब तबड़क-तबड़क करने लगे थे। पता नहीं उसकी ये आदत कब से है कि वो अपने अंदर उठने वाले सवाल कभी बड़ों से नहीं पूछती, खुद ही अपनी छोटी-सी समझ से उत्तर देती रहती। तो उसी ने खुश होकर उत्तर दिया – तो पड्डू से वो कितनी भी और कौन-सी भी गोली लेकर आ सकती।
और पड्डू के पास ये गोलियाँ कहाँ से आती?
अरे ये तो बहुत आसान है। जब पैसा होता ही नहीं, तो पड्डू भी चाहे जितनी गोलियाँ फैक्टरी से ला सकता। और फैक्टरी में क्या गोलियों को बनाने के पैसे नहीं लगते?
कैसे लगते, जब पैसे होते ही नहीं तो फैक्टरी वाले भी तो सारा सामान फोकट में ही लाते। (हालाँकि पैसों की उपस्थिति में पैसों के न होने की कल्पना करना कितना मुश्किल हुआ, ये बस वही बता सकती है... फिर भी...)
साँई फैक्टरी वाले को मुफ्त में जितनी चाहिए उतनी शकर देता, क्योंकि साँई को भी शकर कारखाने से मुफ्त में शकर मिलता। शकर के कारखाने में किसान गन्ना मुफ्त में देता... लेकिन यहाँ एक मुश्किल आ गई – किसान की जरूरत कैसे पूरी होती?
अरे... किसान को भी जो चाहिए, जितना चाहिए सब मुफ्त में ही तो मिलेगा ना...? जब किसान तो अपनी जरूरत का सारा सामान बिना पैसों के मिलेगा तो फिर उसे पैसों की क्या जरूरत होगी? कितना आसान है ना ऐसे जीना? पता नहीं बड़ों ने क्यों पैसे जैसी चीज बनाकर जिंदगी को इतना मुश्किल कर दिया। हर वक्त, हर जरूरत के वक्त ये दीवार की तरह आ खड़ा होता है...!
तर्कों की कड़ी-दर-कड़ी जोड़कर मिले निष्कर्ष पर उसने खुद ही खुद को शाबासी दी और अपनी खोज पर खुश हुई... लेकिन फिर तुरंत ही मायूस होकर उसने फिर सवाल किया – तो फिर पैसे की जरूरत ही क्यों थी?
ये पता नहीं कैसे वो जानती थी कि हर वो चीज जो है या जिसका आविष्कार हुआ है, वो इसलिए है क्योंकि उसकी लोगों को जरूरत है, (तब तक उसने आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, जैसा कुछ सुना नहीं था) लेकिन वो फिऱ भी इस सवाल का जवाब नहीं दे पा रही थी कि जब बिना पैसों के सारी चीजें बहुत आसान है तो फिर पैसे की ईजाद हुई ही क्यों होगी?
बहुत सालों तक उसके छोटे-से दिमाग में बड़ों की दुनिया का ये गड़बड़झाला नहीं बैठा, वो सोचती तो बहुत थी, लेकिन वो ये जानती थी कि वो बहुत छोटी है और बड़ों की दुनिया बहुत उलझी हुई है, उसके सोचने से कुछ बदलने वाला नहीं है। यूँ ही तो हर बात पर उसे ये सुनने को मिलता था कि – तू छोटी है, तू नहीं समझेगी। या फिर ये बड़ों की बात है, तेरी समझ में नहीं आएगी। जब तू बड़ी हो जाएगी, तब अपने आप समझ आ जाएगी।

बचपन से निकलने के बाद भी बहुत बुनियादी बातें उसकी अकल में नहीं समाती थी, इसीलिए जब सोवियत संघ ढहा तो उसे आत्मिक कष्ट हुआ। उसने बस सुना ही सुना था कि वहाँ हरेक को उसकी जरूरत के हिसाब से घर मिलते हैं और एक ही तरह का कपड़ा बनता है और तमाम तरह की समानता की बातें..., तो फिर बचपन का सवाल दूसरी तरह से आ खड़ा हुआ...। जरूरतें पूरी होती है, फिर भी क्यों लोग असंतुष्ट रहते हैं?

तो साहब उसे ‘पैसा क्यों है?’ ये बात समझ में आ ही गई आखिर... कब? जब उसने खुद कमाना और खर्च करना शुरू किया। तब उसने जाना कि पैसे का आविष्कार जरूरत पूरी करने के लिए नहीं हुआ है, हवस... लालच पूरी करने के लिए हुआ है। आखिर बिना पैसे के ये कैसे तय होगा कि किसकी जरूरत कितनी है? और किसको कितना मिलना चाहिए? जरूरत तो सिर्फ दो जोड़ी कपड़ों की है, लेकिन यदि उसे कपड़ों से अपनी अलमारी भरनी है तो फिर पैसों की जरूरत होगी ना... आखिर तो जरूरत और हवस में बहुत फर्क है ना औऱ इस फर्क को पाटता है ना पैसा... ओ... ओ... अब पैसा नहीं। कम पैसा और ज्यादा पैसा...। औऱ जब ये गिरह खुली तो दुनिया की बहुत सारी गिरहें उसके सामने खुलती चली गई...।

Sunday, 12 June 2011

बस यादें रह जाती है...


पता नहीं कितने बचपन में बीमार रहती थी वो... ताई जी कहती हैं कि बहुत बचपन में तू बहुत बीमार रहती थी। उन दिनों तो आने-जाने के साधन भी नहीं हुआ करते थे। आधी-आधी रात को बारिश पानी में कोई एक छाता पकड़ता था और मैं (ताई जी) तुझे उठाए अस्पताल भागा करती थीं। उसे तो कुछ याद नहीं है। जब से होश संभाला है, छोटे भाई को ही बीमार होते देखती रही है। कभी पीलिया, तो कभी टॉयफॉइड...। और बस पूरा घर जैसे काँपने लगता था। माँ सारा-सारा दिन उसका सिर गोद में लेकर बैठी रहती थी, माँ हटती तो ताई... पापा ऑफिस से छुट्टी ले लिया करते औऱ ताऊजी आधी छुट्टी कर घर आ जाते। वो बस दर्शक बनी देखती रहती... कितना लाड़ करते हैं, सब बीमार बच्चे से... कोई आस उसमें भी जागती। पैंपर शब्द से तब तक वो परिचित नहीं थी। लेकिन पता नहीं कैसी मिट्टी थी, उसकी कि कभी उसका बुखार तक 100 से उपर नहीं जाता था। इस बात का मलाल था उसे... क्या पता आज भी हो...।
उस दिन भी भाई की बीमारी का ग्यारहवाँ दिन था। बुखार उतरता और फिर चढ़ने लगता...। कभी-कभी तो थर्मामीटर अविश्वसनीय छलाँग लगता और बुखार 104 डिग्री या फिर 105 के करीब पहुँच जाता... घर का हरेक सदस्य घबराने लगता, कोई इस डॉक्टर के पास ले जाने की बात करता तो कोई दूसरे...। वो बस दर्शक हुआ करती। आखिरकार डॉक्टर ने सलाह दे ही डाली कि बच्चे को अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा। उन दिनों प्रायवेट अस्पताल बहुत ज्यादा नहीं हुआ करते थे और जो होते थे, उनकी विश्वसनीयता भी नहीं थी, सो सिविल अस्पताल में भाई को भर्ती करा दिया गया। दिन-भर एक-के-बाद एक टेस्ट होते रहे और शाम तक पता चला कि पीलिया तो खैर था ही अब डबल टॉयफॉयड भी हो गया है। बुखार भी उतरते-उतरते ही उतरेगा। माँ उदास होकर भाई के लिए मौसंबी का रस निकाल रही थी। काँच का काँटे वाला कटोरा... मौंसबी को दबा-दबाकर नरम करने के बाद नींबू की तरह उसे बीच में से काटकर उस काँटे वाले उभरे हिस्से पर पूरी ताकत से दबाकर माँ रस निकाल रही थी। नीचे सारा रस इकट्ठा हो रहा था। काँच के ही गिलास पर गीला कपड़ा लगाकर सारा रस उसमें उँड़ेलती, फिर कपड़े को भी पूरी ताकत से निचोड़ देती। ना तो छिलकों में कुछ बचता और न ही कपड़े में जमा कूचे में... सारा रस गिलास में उतर आता और धीरे-धीरे गिलास में रस की मात्रा बढ़ती जाती... वो बड़ी हसरत से गिलास में धीरे-धीरे बढ़ते रस को देखती। उसका मन होता कि छिलकों को उलटाकर आधी कटी निचुड़ी हुई फाँकों को खा ले... लेकिन माँ की झिड़की के डर से बस देखती रहती। माँ का ध्यान भंग हुआ तो उन्होंने आँखों से इशारा किया कि देख लें यदि इसमें कुछ बचा हो तो... फिर जाने क्या सोचकर आखिरी वाली मौसंबी में थोड़ा-सा रस छोड़ दिया और उसने कृतज्ञ होकर माँ की तरफ देखा। रस में ढेर सारा ग्लूकोज डालकर जब भाई के दिया तो वो रोने लगा। वो समझ ही नहीं पा रही थी कि इसमें रोने की क्या बात है? वो कह रहा था मुझे नहीं पीना और सब उसे पुचकार कर और थोड़ा-सा पी लेने की मनुहार करते... एक घूँट पी ले, ऐसा कहकर फुसलाते। उसे बड़ा आश्चर्य़ हुआ कि कोई कैसे फल और जूस के लिए भी इंकार करता होगा। फिर भाई को समझाने के लिए गिलास में से थोड़ा रस किसी कटोरी में डाला कर उसे दे दिया.... कि देख अब कम कर लिया है, अब तो पी ले...।
फल काटकर उसे बहुत मान-मनौव्वल कर खिलाए जाते और वो 10 साल की छोकरी सोचती कि कोई ऐसा बीमार कैसे हो सकता है कि वह फल खाने से ही इंकार कर दे। और फिर खुद से एक वादा करती, यदि वो बीमार हुई तो कभी...कभी... फल खाने से इंकार नहीं करेगी... लेकिन वो ऐसी बीमार कभी हुई ही नहीं। (बाद में जब वो बड़ी हुई तो उसने इजाद किया कि – लड़कियाँ शारीरिक रूप से मजबूत होती है, उन्हें बड़ा करने में माता-पिता को ज्यादा मुश्किलें नहीं आती हैं। भाई ने पहले तो बहुत मजाक उड़ाया फिर एक दिन किसी रिपोर्ट को पढ़कर उसने भी स्वीकार कर लिया कि हाँ लड़कियाँ 'हमारी' तुलना में ज्यादा मजबूत होती है।)

टीवी पर किसी म्यूजिकल रिएलिटी शो को देखते हुए, वो एक-एक कर मौसंबी छील रही है। बस यहीं उसे अपना बचपन याद आ रहा है। न जाने कैसे आँसू उतर आए... जबकि अभी एक सूखी-सी मौसंबी को डस्टबिन के हवाले कर आई है। पता नहीं तब से ही फल उसकी कमजोरी है या फिर उसे पसंद थे, इसलिए उसके अंदर उस तरह से सब कुछ ठहर गया... लेकिन फलों को लेकर उसकी दीवानगी उसके ससुराल में 'विख्यात' है। मौसंबी साफ करके उसने प्लेट टेबल पर रख दी। सभी लोग प्रोग्राम देखते हुए खा रहे हैं। वो भी... लेकिन उसे लगा कि उस दिन अस्पताल में निचुड़ी हुई मौसंबी में जो स्वाद आया था, उसके बाद अब तक नहीं आया... क्यों...?

Sunday, 29 May 2011

इंतजार... उसकी स्लेट के धुलने का...


हर सुबह मैं इस हसरत से जागता हूँ कि आज उसकी स्लेट पर कुछ अपने मन का लिखूँगा और लगभग हर दिन पाता हूँ कि उस पर इतना कुछ घिचपिच होता है कि मेरे लिखने के लिए जगह ही नहीं बचती। कुछ जिद्द तो मेरी भी है कि घिचपिच में मैं अपना कुछ नहीं लिखूँगा...। तो हर दिन यूँ ही जाया हो रही है जिंदगी...। आज भी बहुत गर्म-सी सुबह जब चाय की ट्रे लेकर उसने मुझे जगाया तो आँखों में झुंझलाहट थी... – आज सन्डे है और आज भी मैंने ही चाय बनाई है।
मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया – ठीक है, कल मैं बना दूँगा।
उसके चेहरे का तनाव ढीला हुआ और उसने भी रूठी-सी मुस्कुराहट फैलाई...। आज भी बहुत गर्मी है... है ना..? – थोड़ी देर बाद उसने कहा और मुझसे सहमति चाही। मैंने उसकी तरफ देखा... तुम्हारा सिरदर्द कैसा है? वो और मृदु हो आई, बोली - नहीं सिरदर्द नहीं है, क्या तुम्हें गर्मी नहीं लग रही है?
आज भी पूरी स्लेट घिचपिच है। अखबार पढ़ते हुए पूरे समय वो चुप थी... एक बेचैन चुप...। मैं उसकी बेचैनी को देख रहा था, बरसों-बरस उसे दूर करने की कोशिशें की, अब हारने लगा हूँ। समझ नहीं पाता कि ये क्यों है और कब तक ऐसी ही रहेगी। आम तौर पर उसे देखकर ये अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि वो बेचैन है। बेतरह शांति होती है, उसके चेहरे पर, लेकिन मैं जान पाता हूँ कि ये शांति कितनी बाहरी है। - मेरे होंठो का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे/ तूने मुझको बाग़ जाना देख ले सेहरा हूँ मैं... कहती हुई-सी, चुनौती देती हुई। वो घर का हर काम एक अद्भुत लय के साथ करती है, लेकिन जैसे ही खुद के साथ खड़ी होती है, सारी लय ऐसे टूट जाती है, जैसे मंत्रमुग्ध हो चुकी संगीत सभा में झटके से सितार का कोई तार टूट जाए। अब वो अपने साथ है, कभी कोई पत्रिका उठाती है, पलटती है, कुछ एकाध पन्ना पढ़ती है... रख देती है। फिर किताबों की रैक की तरफ जाती है, लेकर आती है कोई किताब... कभी कोई पढ़ा हुआ फिक्शन... मुझे लगता है चलो इसे पढ़कर कुछ व्यवस्थित होगी, लेकिन उसके कवर को सहलाती रहती है, फिर कहीं कोई पन्ना खोलकर उसे पढ़ती है और बंद कर फिर से रैक की तरफ लौट जाती है। इस बार उसके हाथ में नॉन फिक्शन है। शायद किसी लेखक की डायरी-सा कुछ। बहुत मनोयोग से पढ़ती है, लेकिन फिर लगता है कि सब कुछ टूट गया है और वो उसे वहीं पटक देती है। अब वो लेटकर छत को ताकने लगी है, कोई टूटा-फूटा संदर्भहीन वाक्य कहती है और फिर चुप हो जाती है। झटके से उठती है... बालों को समेटकर जूड़ा बनाती है – बहुत बेचैनी है, कितनी गर्मी हो रही है। मैं उसे देख रहा हूँ, बहुत बेबसी से उसकी भीतरी बेचैनी को सतह पर आते, जिसे वो लगातार गर्मी के पीछे छुपा रही है।
बहुत देर से अपने म्यूजिक कलेक्शन का ड्रावर खोले बैठी है। कोई सीडी निकाल कर लगाती है। पंकज मलिक का गाना – पिया मिलन को जाना... बजता है। सुनो कैसे सरल शब्दों में कैसी फिलॉसफी कह दी है। - वो अभिभूत होकर कहती है। मैं उसे सुनने लगता हूँ। वाकई! – जग की लाज मन की मौज दोनों को निभाना... सच में अद्भुत...। उसकी आँखों में चमक आ जाती है। मैं देख रहा हूँ धूप-छाँह का खेल... मैं उसकी स्लेट को टटोलता हूँ, लेकिन घिचपिच बरकरार है। एकाएक वो चिढ़कर म्यूजिक सिस्टम बंद कर देती है।
मुझे कुछ बहुत अच्छा खरीदना है... – वो कह रही है।
क्या बहुत अच्छा? - मुझे उम्मीद होती है। शायद कुछ लय बँधे।
कितने दिनों से कुछ अच्छा म्यूजिक, कोई अच्छी किताब नहीं खरीदी।
जो कुछ है तुम्हारे कलेक्शन में वो सब कुछ तुमने सुन-पढ़ लिया है? – मैं उसे चिढ़ाता हूँ।
हाँ, जो कुछ अच्छा था, सब सुन-पढ़ लिया है, अब मुझे कुछ नया चाहिए।
नया... और अच्छा...? – मैं उसे फिर चिढ़ाता हूँ। वो सोचने लगती है।
हाँ, नया और अच्छा...- फिर खुद ही हड़बड़ाती है – नहीं मतलब कुछ बहुत पुराना जो हमारे लिए नया है। मतलब जिसे हमने नहीं सुना-पढ़ा है। हाँ कुछ क्लासिकल और इंस्ट्रूमेंटल तो नया मिल ही सकता है ना...। कुछ ऐसे क्लासिक्स जो हमने नहीं पढ़े हैं।– उसके चेहरे पर चमक लौटती है।
चलो, आज चलते हैं।– मैं कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ। बिना स्लेट देखे।
आज... – कुछ मेरे अंदर कौधता है, वो कुछ सोचती है – नहीं, आज नहीं... कौन सन्डे बर्बाद करे। - मैं बुझ जाता हूँ। स्लेट पर अब भी घिचपिच है।

अधूरी नींद में घड़ी देखती है। उठो पाँच बज गए हैं... चाय पिलाओ।
ऊँ... हाँ... दस मिनट...। – मैं गहरी नींद में हूँ, वहीं से जवाब देता हूँ। थोड़ी देर बाद सुबह की झुँझलाहट को खींचकर लाती हुई वो उठाती है। - सुबह भी मैं ही चाय बनाऊँ और दोपहर को भी।
मैं थोड़ा आँखें तरेरता हूँ – मैंने कहा था मैं बनाता हूँ, तुम्हें इतनी क्या जल्दी थी?
हुँ...ह... आधे घंटे से सो रहे हो। दस मिनट पता नहीं कब होते...! – झूठमूठ गुस्सा दिखाती है। जब मैं शरारत से मुस्कुराता हूँ, तब। स्लेट थोड़ी साफ होती दिखती है। वो सारे पर्दे खींच देती है। शाम कमरे में उतर आती है। मैं इशारा करता हूँ, लाईट जला दो...।
अच्छा लग रहा है। - वो खारिज कर देती है। फिर से उठकर म्यूजिक सिस्टम की तरफ बढ़ती है। कोई बहुत पुरानी कैसेट लगाती है। जगजीतसिंह गा रहे होते हैं। - बरसात का बादल का दीवाना है क्या जाने/ किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है। हम दोनों ही डूबने लगे हैं। दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है/ मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है। उसकी स्लेट कुछ-कुछ साफ होते दिख रही है, लेकिन दिन उतर गया है, मैं उदास हो जाता हूँ। मगर उसपर शाम के चढ़े नशे को देखता हूँ, तो कहीं से उम्मीद की किरण झाँकती है।

बाहर निकलते ही ठंडी हवा का झोंका छूकर गुजरता है। हुँ.... शब-ए-मालवा... वो किलकती है। - अच्छा लग रहा है ना...! दिन में तो कितनी गर्मी थी।
चलो... अंत भला तो सब भला। मैं खुद से ही कहता हूँ।
पता है मुझे गर्मी क्यों पसंद है। क्योंकि उसकी शामें और रातें बहुत खुली-खुली लगती है। ऐसी जैसे कि दिन फैलता-पिघलता रात में घुल रहा है। अँधेरे कमरे की खुली हुई खिड़की से बाहर के खुलेपन को दिखाती हुई वो कहती है, - लेकिन फिर भी बारिश तो बारिश है, कब आएगी बारिश... वो बच्चों की-सी विकलता से पूछती है।
पार्श्व में बेगम अख्तर गा रही है – हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब/ आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया...।
वो फिर किलकती है, मुझे बारिश का बेसब्री से इंतजार है। मैं कहता हूँ – मुझे भी...। सोचता हूँ - क्योंकि बारिश में उसकी स्लेट भी धुल जाएगी और मैं अपने मन का कुछ लिखूँगा, कोई कविता जो उसे परिभाषित करे... फिर खुद ही बुझ जाता हूँ, कर पाएगी क्या कोई...?

Saturday, 14 May 2011

उसकी क़ुर्बत (नजदीकी, निकटता)....


वो अक्सर बंद रहती है, कभी-कभी ही खुलती है। मैं उससे कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा खुला होना मुझे अपनी सफलता लगती है, लेकिन कह नहीं पाता हूँ। मुझे लगता है कि वो समझती है कि मैं उसे प्यार करने लगा हूँ, लेकिन वो कभी कुछ नहीं कहती। मैं भी उसे कुछ कह नहीं पाता। जब कभी वो मेरे साथ होती है, मैं उसे जीना चाहता हूँ, पर अक्सर वो मुझे बंद ही मिलती है। बहुत सारी उलझनों के साथ वो मेरे सामने आती है और मैं उसे सुलझाने में ही व्यस्त हो जाता हूँ, ऐसे ही वो लम्हे गुजर जाते हैं। उससे दूर उसका साथ मैं ज्यादा जी पाता हूँ, उसकी यादों को सजाता रहता हूँ, उससे प्यार करता हूँ, उससे बात करता हूँ, खोलकर अपना दिल उसके सामने रख देता हूँ, उससे दूर वो मेरे सामने खुलती है, महकती है, गुलाब और रजनीगंधा की तरह...।
आज उसका फोन आया – क्या कर रहे हो?
मैं कहना चाहता हूँ, तुम्हारी यादों को तरतीब दे रहा हूँ, लेकिन कह नहीं पाता। जवाब देता हूँ – कुछ नहीं... बोलो....।
वो हमेशा सीधे ही सवाल पूछती है। कभी हलो हाय नहीं कहती। पता नहीं वो मुझसे ही ऐसे बात करती है या ये उसका स्टाइल ही है, बिना किसी लाग-लपेट के सीधे काम की बात। पूछती है – फुर्सत है?
मैं सोचता हूँ कितना खड़ा बोलती है। याद आता है, जब वो बंद होती है, तब बहुत विनम्र होती है, बहुत नपी-तुली... उसके शब्दो में ‘संतुलित’...। जब खुलती है तो प्राकृत हो जाती है। हँसी आई थी ये सोचकर कि हमेशा ही उल्टा करती है।
मैं फिर कहता हूँ – बोलो...
वो आदेश देती है - घंटे भर में म्यूजिक प्लेनेट पहुँचो।
मुझे उसका आदेश देना अच्छा लगता है। वो अक्सर कहती है कि – स्त्री शासित होना चाहती है। क्योंकि यही उसका इतिहास रहा है, उसकी आदतों का इतिहास। और हँस पड़ती है। आज मुझे लगा कि कभी-कभी पुरुष भी चाहता है कि कोई उस पर शासन करे। शायद वो भी बदलाव चाहता है। या फिर भारहीन या मुक्त होना चाहता है, हर वक्त निर्णय लेने की दुविधा से...। या फिर किसी को, जिसे वो पसंद करें, शासन करने का अधिकार देना चाहता है। जो भी हो, मेरे मन के किसी कोने ने मुझसे कहा कि आज वो खुली हुई है।
आज मैं उसे बहुत करीने से पाता हूँ। बहुत सारे चटख और खुले रंग की लाइनिंग के कुर्ते के साथ फिरोजी रंग का चूड़ीदार और दुपट्टा... पूरी तरह से फेमिनीन... अक्सर तो वो अपनी ड्रेसिंग को लेकर लापरवाह ही हुआ करती है। आज वो खुली हुई है।
जब हम वहाँ से निकले तो उसके हाथ में बहुत सारी सीडीज थी। वो मेरे साथ बैठी है, मैं जानना चाहता हूँ – अब कहाँ? लेकिन नहीं पूछता, इंतजार करता हूँ, उसके कहने का... वो चुप है। चाभी घूमाता हूँ और एक्सीलरेटर पर पैर रखकर गाड़ी आगे बढ़ा लेता हूँ। फिर से उम्मीद करता हूँ कि वो निर्देश दें, वो अब भी चुप है। मैं उसकी तरफ देखता हूँ, वो सामने देख रही है, निर्विकार... निर्लिप्त... निस्संग...। न वो कहती है और न मैं पूछता हूँ कि – कहाँ? आज वो खुली हुई है।


मेरा म्यूजिक सिस्टम भी जैसे उसी का इंतजार करता है। कभी-कभी तो मुझे उसे हाथ लगाते हुए ही डर लगने लगता है कि कहीं वो मुझे करंट मारकर झटक ही न दें। बस इसी डर से मैं उसे कभी हाथ ही नहीं लगाता हूँ, जब कभी वो आती है, तब वही इसे ऑन करती है, जैसे आज किया। वो एक-एक कर सीडीज खोलती जा रही है। जैसे बच्चे को अपना मनपसंद खिलौना मिलने पर खुशी होती है, बस खुशी का वही रंग उसके चेहरे पर नजर आ रहा है। वो आज खुली हुई है, अक्सर तो वो बंद ही होती है, अपनी उलझनों के दायरों में...। मुझे म्यूजिक की समझ वैसी नहीं है, जरूरी भी क्या है? कोई इंस्ट्रूमेंटल पीस... शायद संतूर बजने लगा है, अच्छा लग रहा है। वो हमेशा की तरह जमीन पर बैठी है और उसका सिर सोफे पर टिका हुआ है। पैर फैलाते हुए पूछती है, क्या पिला रहे हो? मेरा मन किया कि मैं उसका सिर अपनी गोद में रखकर सहलाऊँ, लेकिन पूछता हूँ – क्या पीना चाहती हो?
वो शरारत से मुस्कुराती है, क्या है तुम्हारे पास...? वही सॉफ्ट ड्रिंक्स...
मैं झेंप जाता हूँ। जब मैं लौटता हूँ, तो उसे जमीन पर कुशन लगाते हुए देखता हूँ। वो इशारे से मुझे अपने पास बैठने के लिए बुलाती है। मैं बच्चों की तरह उसकी बात मानकर जमीन पर उस जगह बैठ जाता हूँ, जहाँ पर अभी तक वो बैठी हुई थी। अचानक वो कुशन पर सिर रखकर लेट जाती है। सिर पर उसकी बाँह पड़ी हुई है और दुपट्टा गले में सिकुड़ गया है। उसकी उठती-गिरती साँसें मेरे सीने पर हल्के-हल्के दस्तक दे रही है। उसकी बंद आँखें मुझे उसे देखते रहने की सुविधा दे रही है। मैं उसे चूमना चाहता हूँ, लेकिन... ।
जून उतर रहा है और बादलों की आवाजाही तेज हो गई है। अचानक बादल कड़कते हैं और बिजली गुल हो जाती है। शाम हो रही है और अँधेरा घिर आया है। वो आँखें बंद किए हुए ही कहती है, पर्दे हटाकर खिड़कियाँ खोल दो...। मैं वैसा ही करता हूँ। भूरे बादल कमरे में आ पसरते हैं, उनके बीच उसका चेहरा रह-रहकर कौंध जाता है। वो एक क्षण को आँखें खोलती है, मुझे लगता है कि वो मुझे आमंत्रित कर रही है। मैं उठकर उसके करीब चला जाता हूँ, वो फिर से आँखें बंद कर लेती है। मैंने उससे कभी नहीं कहा कि मैं उससे प्यार करता हूँ, मुझे लगता है कि वो ये समझती है। मैं उस पर झुक जाता हूँ और... पहली बार... उसे चूम लेता हूँ। उसकी आँखें अब भी बंद है। मुझे अक्सर लगता था कि जब कभी मैं उसके करीब जाऊँगा... बहुत करीब... तो सालों से संचित उन्माद से सारे बंधन तहस-नहस कर दूँगा। लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि मैं संयत हूँ – उसकी क़ुर्बत में अजब दूरी है, आदमी हो के खुदा लगता है...। मैं फिर अपनी जगह लौट जाता हूँ। बारिश के पहले की आहट है। हवाएँ सनसनाने लगी है, मुझे महसूस हो रहा है कि वो खुद में गहरे उतर गई है, और मैं यहीं कहीं छूट गया हूँ। एकाएक मैं खुद को फालतू लगने लगता हूँ। चौंकता हूँ उसकी आवाज सुनकर... उसकी आँखें मूँदी हुई है और वो गा रही है – आप ये पूछते हैं दर्द कहाँ होता है/ एक जगह हो तो बता दूँ कि यहाँ होता है...।
उसने कभी बताया था कि अपने बचपन में उसने कुछ दिन संगीत सीखा है, सुना पहली बार। सुर अनगढ़ है लेकिन आवाज दर्द और उसके अहसास से भरी हुई है। वो डूब गई, बहुत गहरे क्योंकि ऐसा लग रहा है कि उसकी आवाज बहुत दूर से आ रही है, आज वो खुली हुई है। मैं अपने मोबाइल का रिकॉर्डर ऑन कर देता हूँ, - आप आए तो सुकूं आप न आए तो सुकूं/ दर्द में दर्द का अहसास कहाँ होता है... दिल को हर वक्त तसल्ली का गुमां होता है/ दर्द होता है, मगर जाने कहाँ होता है।
वो गा रही है, एक-एक कर उसने गज़ल के सारे शेर गाए... मैं आश्चर्य में हूँ, मैंने पहली बार उसे इतना स्थिर, इतना शांत पाया। अब वो चुप है, उसकी आँखें अब तक बंद है। बहुत देर तक मैं उसके बाहर आने का इंतजार करता हूँ। बाहर से आने वाले झोंके के साथ मिट्टी की सौंधी-सी खूशबू अंदर भर आती है। मैं इंतजार करता हूँ, उसके चिहुँकने का, उसे पहली बारिश जो पसंद है... नहीं उसे बारिश ही पंसद है, लेकिन वो नहीं लौटती, शायद वो सो गई है। मैं धीरे से उठता हूँ, बॉलकनी में चला आता हूँ। पर्दा खींचकर मोबाइल में रिकॉर्ड हुई उसकी आवाज सुनता हूँ। सुनते-सुनते खुद भी डूब जाता हूँ। बड़ी-बड़ी बूँदें बरसने लगती है। एक बार फिर उसकी गज़ल खत्म हो जाती है, फिर भी चल रही है, अंदर...। हल्की-हल्की फुहारें लग रही है, मीठा और अच्छा-सा लगने लगा है। मुझे वहम होता है कि पर्दा सरका, मन करता है कि एक बार वहम की तस्दीक कर लूँ, लेकिन नहीं करता। फिर लगता है कि वो मेरे पैरों के पास आकर बैठी है और अपना सिर उसने मेरी गोद में रख लिया है, मैं उसके सिर को थपक रहा हूँ। मैं फिर से तस्दीक करना चाहता हूँ, लेकिन डर के मारे आँखें नहीं खोलता...।
मुझे भी आज पता नहीं कैसे मुक्ति का अहसास हो रहा है, एकदम शांति और भारहीनता, जैसे अंतरिक्ष में होती होगी... । शायद इसलिए कि आज वो खुली हुई है... और मैंने उसके खुले होने को कैद कर लिया है, अपने ज़हन में और अपने मोबाइल में भी...

Tuesday, 10 May 2011

छीजते हम...



कुछ अटका हुआ है, कुछ छूटा तो कुछ भटका हुआ है। बहुत सारा कुछ भूला हुआ याद आता है और बहुत सारा याद रहता-सा भूल जाते हैं। कुछ रिश्ते जो अभी जिंदा हैं, धड़कते हैं और याद दिलाते हैं अपने जीवित होने की... कुछ जो दरक गए हैं, हमारे न चाहते हुए भी... उनकी किरचें बिखरी हुई है, यहीं कहीं... चुभती है, टीसती है, दर्द देती है। नहीं चाहते थे कि कुछ भी टूटे, लेकिन जो अंदर बनता है वो बहुत नाज़ुक होता है, पता नहीं किससे उसे ठेस लग जाए... बहुत एहतियात बरता था, लेकिन बचा नहीं पाए... हम ही कहीं असफल रहे। गहरे पैठे थे वो अंदर कहीं, हम भी नहीं जानते थे कि कितने अंदर तक जा धँसे हैं, कुछ रिश्तों का वजूद जिंदगी से भी पुराना होता है, तो जब वे चटखते हैं तो जैसे जिंदगी की नींव ही हिल जाती है...। जिंदगी उन रिश्तों से नाभिनाल की तरह जुड़ी हुई रहती है, फिर भी कैसे दरक जाते हैं... दुनियादारी....!
वो मजबूत दरख्त-से रिश्ते जब उखड़े तो जैसे तूफान ही आ गया। कितना कुछ बिखरा और तिनके-सा उड़ गया, हमें होश ही नहीं रहा, जब होश आया तो मोटा-मोटी नुकसान तक ही पहुँच पाए, हालाँकि ये बाद में पता चला कि नुकसान इतना ज्यादा था कि उस तूफान को आए अर्सा बीत गया, लेकिन उसकी भरपाई नहीं हो पाई, बल्कि हर याद के साथ वो नुकसान उभर-उभर आता है। अपनी जिद्द और टूटन को संभालते हुए पता नहीं कहाँ क्या खो दिया, अब तक समझ नहीं पाए हैं, जब कभी कच्ची जमीन पर रखा हुआ पैर धसकता है तो याद आता है कि ये भी उसके साथ छिटका है, टूटा है। बहुत नाजुक-सा कुछ बहुत बुरी तरह से क्षत-विक्षत हुआ है, क्या गलत हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ और जो हुआ उसे रोका क्यों नहीं गया, क्या उसे ठीक नहीं किया जा सकता है? अब कुछ नहीं हो सकता है, प्रेम के धागे-सा कुछ चटख गया है। जोड़ा तो है, जतन से लेकिन गाँठ है, उभरी हुई, चुभती हुई।
जब कहीं अंदर कुछ कड़ा मिलता है तो चौंकते हैं, - ये हमारा तो नहीं, लेकिन अंदर है तो हमारा ही होगा। बना हुआ नहीं होगा तो बनता रहा होगा! बहुत कोशिश करने के बाद भी ‘अंतर’ को सख्त होने से नहीं बचा पाए।
पूछते हैं खुद से ही कि कभी मुलायम मखमल रही इस जमीन में ये सख्त पत्थर कहाँ से आ गए? कैसे हो गया इतना सख्त और क्या हो गया इतना कड़ा, हमें पता क्यों नहीं चला? ये उसी नुकसान के अवशेष हैं, जो कभी हुआ था।
जिद्द अब भी है, लेकिन हमारे अंदर ही कुछ ऐसा है जो हमसे भी ज्यादा जिद्दी है। हमारे जिद्द के पत्थर में कहीं दरार ढूँढ कर अंदर बहने लगी है वो रोशनी और हम रोक नहीं पा रहे हैं। वो दिखा रही है – देखो कहाँ-कहाँ से छीजे हो, कितने उथले हुए हो, कितना कम हुए हो, कितना छोटे हुए हो?
जो टूटा है, उसका नुकसान तो खैर है ही, लेकिन अपने अंदर की धड़कती संवेदनाओं के मर जाने की टीस क्या दर्द नहीं देती है...? तो क्या रिश्तों का टूटना महज उतना ही है? दिखता चाहे उतना ही हो, लेकिन दर्द, त्रास और वेदना उससे कई गुना ज्यादा है... टूटने की और खुद के कम होते रहने की भी...।

Sunday, 24 April 2011

नए-पुराने शहर के बीच... कहीं...

तेज गर्मी में शॉपिंग का प्लान... सुनकर ही पसीना आने लगा था, लेकिन जब मामला जिम्मेदारी का हो तो उससे कन्नी नहीं काट सकते हैं। तो ठंडे होते सूरज का इंतजार करते जब बाजार पहुँचे तो गर्मी का अहसास तो पता नहीं कहाँ बिला गया, और बाजार की भीड़ को देखकर खुद के कुछ ज्यादा सुविधाजीवी होने पर लानत-मलामतें भेजी... हम तो खैर मजबूरी में शॉपिंग बैग उठाए हैं, लेकिन लोग शौकिया शॉपिंग कर रहे हैं... क्या मौसम कभी कोई सीमा-रेखा खींच सकता है? दो-तीन घंटे माथापच्ची करने और पूरी तरह से निचुड़ जाने के बाद जब उस चकमक दुकान से बाहर आए तो एक बारगी लगा कि खुले में आ गए, लेकिन एक-दूसरे को ठेलती-ढकेलती और टकराती भीड़, वाहनों से निकलता दमघोंटू धुआँ, गर्मी और तेज चिल्लपों के बीच लगा कि कैसे भी जल्दी से घर पहुँच जाएँ। अपना रास्ता बनाते सरपट दौड़े जा रहे थे, कि एकाएक एक हाथठेले को देखकर रूक गए... कितने बरसों बाद... खिरनी, शहतूत और फालसे... याद आया हाँ, इसी मौसम के तो फल है।
कितने सालों बाद दिखे इस शहर में... बचपन में तो गर्मियों की लंबी-उबाऊ दोपहर, शाम को घर से निकलकर खेलने के इंतजार में खिरनी खाकर चिपकते होंठों और फालसे की बीजों से चारोली निकालते-निकालते ही तो बीतती थी। अपने बड़ों से सुना था कि बच्चों को मौसमी फल जरूर खाने चाहिए, क्यों...? इसलिए कि वे प्रकृति की देन है... छोड़िए भी, ये पुरानी बातें हो चली है। सारे गुजरे जमाने के शगल... नए शहर में रहते हुए कभी याद ही नहीं आया... खिरनी, शहतूत, फालसे और.... बचपन...।

कैरी-पुदीने की चटनी-सा पुराना शहर
एक पतली-सी दीवार के इस-उस ओर बसी दो घनी और खुली दुनिया, पतली सँकरी गलियों में खुलते, नीची चौखट के दरवाजे जिनसे गुजरने के लिए नवाँना पड़ता है सिर... जैसे नवाँया हो किसी मंदिर के सामने... उन दरवाजों से झाँका जा सकता हो घरों के अंदर, ली जा सकती हो, घर में बनाए जा रहे किसी देशी-ठेठ पकवान की खूशबू। सिर जोड़े खड़ी छत की मुँडेंरे... एक छत पर चढ़ो तो चलते-चलते पहुँच जाओ गली की आखिरी छत तक। अपने-अपने घरों के दरवाजों पर खड़ी माँ-भाभियाँ जो एक दूसरे से हँसी-ठिठौली करती है, यहाँ-वहाँ की बातों के बीच रानू-चीनू के जीतू-टीनू से चलते ‘चक्करों’ की बतकही... तो कभी पानी जैसी ‘मामूली’ चीज पर झगड़ भी पड़ती है, फिर कभी चुन्नू-मुन्नू के बीच की दोस्ती की नाजुक-सी डोर के सहारे रिश्तों के सिरों को फिर से लपक लेती है। खिड़कियों से कभी चीनी तो कभी अचार की कटोरियाँ यहाँ से वहाँ होती है। शर्माजी के दरवाजे पर पड़े अखबार को वर्माजी जल्दी उठकर लपक लेते हैं और जब शर्माजी जागते हैं तो वर्माजी के पूरे पढ़ लिए जाने का बड़ी कसक के साथ इंतजार करते हैं, लेकिन किसी भी सूरत में उनके हाथ से अखबार छीन नहीं सकते हैं। किसी एक घर में आए मेहमान की पहुँच गली के सारे घरों तक होती है। यहाँ कुछ भी निजी नहीं है। सबकुछ सबका साझा है, सुख है तो दुख भी।
एक पूरी दुनिया, संस्कृति और जीवन दर्शन है यहाँ... कम हो रहा है, लेकिन अभी भी जिंदा है... यूँ ही कहीं दिख जाता है, शहतूत, खिरनी, फालसे के ठेलों पर तो कभी गोल-गप्पे की रेहड़ी या फिर बर्फ के गोले के खुशनुमा मीठे रंगों सी दुनिया, आत्मीय, खुली हुई, रंग-बिरंगी और स्वादिष्ट, ठीक वैसी, जैसी गर्मियों में स्वाद देती है केरी-पुदीने की चटनी... फिर भी त्याज्य है ये दुनिया, जरा पैसा आया नहीं कि भागते हैं कॉलोनी की तरफ... होना चाहते हैं ‘आधुनिक’, और चाहने लगते हैं प्रायवेसी.... क्यों?
पित्ज़ा, बर्गर-सा नया शहर
‘कॉलोनी’ बचपन में सुने कुछ ऐसे शब्दों में से एक है, जिसका असल अर्थ बहुत सालों बाद, थोड़ा बहुत पढ़ने के बाद समझ आया था। बचपन में तो बस शहर से बाहर बसी बस्तियों के लिए कॉलोनी नाम का इस्तेमाल हुआ करता था। बड़ा ग्लैमरस और एच-एस ... जिससे खौफ भी हुआ करता था। बड़े हुए थोड़ा इतिहास और थोड़ी राजनीति पढ़ी तो समझ आया कि असल में कॉलोनी का मतलब क्या है? .... उपनिवेश.... राजनीतिक रूप से परतंत्र इकाई... जीती हुई टैरेटरी, जिस पर राजनीतिक अधिपत्य है, जैसा 47 से पहले हम थे। आज... आज कॉलोनी मूल शहर/बस्ती से दूर एक नई बस्ती... ज्यादा खुली, ज्यादा आधुनिक, प्राइवेट और बहुत हद तक उदासीन...।
ऐसा शायद हर शहर में ही होता होगा कि एक पुरानी बस्ती होती है और एक नई... उपनिवेश... कॉलोनी। अरे हाँ... यहाँ जो कॉलोनियाँ होती है, वे भी परंपरागत अर्थों में उपनिवेश ही है, यहाँ के मूल निवासी वे वंचित लोग हैं, जो अच्छे दाम के लालच में अपनी जमीन बेचकर या तो कहीं और दूर चले जाते हैं या फिर वहीं कहीं सिमट कर रह जाते हैं। बाहरी लोग यहाँ बसते हैं... वही अधिपत्य...। हाँ तो पुराने शहर से नए शहर की तरफ लौटे तो ये जगह चौंधियाएगी... काँच के शो-रूमों से झाँकती, लुभाती, रंग-बिरंगी चीजें। खुली-चौड़ी सड़कें, इतने खुले-खुले मकान कि एक ही घर में रहने वाले लोग अपनों से इंटरकॉम पर बात करें तो आस-पड़ोस के लोगों से बातें तो खैर यूँ भी यहाँ मीडिलक्लास मेंटेलिटी का पर्याय है। यहाँ पानी तो नहीं हाँ, पैप्सी-कोला-मिरिन्डा की पेट बॉटलें मिल जाएँगी। इमली, फालसा या खरबूजा तो नहीं दिखेगा हाँ, कीवी, किन्नू, चेरी जरूर अपने रंगों से आपको लुभाएँगे। सड़कों पर लोग नहीं होंगे, बस वाहन ही वाहन होंगे (हाँ वाहन तो लोग ही चलाएँगे, पर...)। एक बड़े से घेरे में बने बंद घरों की दीवारों को छेद कर सिर्फ टीवी की आवाजें आएँगी।
दरअसल ये दो दुनिया है, दो संस्कृतियों, दो जीवन दर्शन की तरह.... एक बिदांस, बिना कुंठा के एकदम खुली हुई और दूसरी... हर कदम पर सावधान, अपने अहं को सींचती, अपने में कैद... एक देशी और दूसरी विदेशी... एक अपनी और दूसरी उधार की... ठीक वैसे ही जैसे कि उपनिवेशों की सुविधाएँ, चाहे हम उठाए, लेकिन वो है तो दूसरों की देन ना...!
शायद इसीलिए इस खुशहाल वर्तमान में रहने के बाद भी बार-बार मन लौटता है, अतीत में, बचपन के मौसम में.... इमली, सत्तू, धानी, खिरनी, शहतूत, बेर और गु़ड के स्वाद में... यहाँ मौजूद पित्ज़ा-पास्ता, बर्गर, कीवी, किन्नू और चेरी के स्वाद से ऊबकर... सुविधाओं से अभाव की ओर... व्यक्तिगत से सार्वजनिकता की ओर... तर्क से भावना की ओर... क्या इसे ही जड़ों की तरफ लौटना कहते हैं?

Sunday, 17 April 2011

लहरों के हवाले है मन...


हर वक्त का लड़ाई-झगड़ा अच्छा नहीं है। ये सीख हरेक को अपने बचपन में मिलती रही है और यदि आप घर में बड़े हो तो आपको तो इसके साथ ये भी सुनने को मिलेगा कि तुम बड़े हो ना! समझदार हो, वो बच्चा है या बच्ची है उसकी बात सुन लो...। बड़े होने पर कई बार ऐसा होता है कि हम इसके उलट काम करने लगते हैं और कई बार उसी लीक को पकड़कर आगे का जीवन तय करते हैं। कुछ स्वभाव से लड़ाकू हो जाते हैं और कुछ समझदार...। औऱ कुछ ऐसे भी होते हैं, जो समय-समय पर सुविधानुसार बदलते रहते हैं... जैसे हम...। इसे प्रयोग भी कह सकते हैं और सुविधा भी। यूँ हर वक्त समझौतावादी होना या फिर हर वक्त हथियार लेकर लड़ना दोनों ही प्रवृत्ति ठीक नहीं है। मौका देखकर अपनी रणनीति तय करना ही अक्लमंदी मानी जाती है, लेकिन जब मामला अक्ल तक पहुँचने से पहले ही मन पर अटक जाए तो...? मुश्किलें संभाले नहीं संभलती है।
पता नहीं ये ग्रह-नक्षत्रों के परिवर्तन के प्रति मन की संवेदनशीलता है, रोजमर्रा के जीवन के प्रति उदासीनता या फिर लक्ष्यहीनता से पैदा हुई ऊब है। गर्मी के तपते दिनों और बेचैन करती रातों में अंदर भी कुछ उबलता, तपता-तपाता रहता है। जीवन अपनी गति और प्रवाह के साथ सहज है, लेकिन मन नहीं...। कहीं अटका, कहीं भटका, उदास, निराश और हताश, किसी बिंदू पर टिकता नहीं है, इसलिए हल तक हाथ पहुँचे ये हो नहीं सकता... तो फिर...? क्या किया जाए? सहा जाए या फिर लड़ा जाए...?
सवाल ये भी उठता है कि क्यों हर वक्त हथियार तान कर लड़ने के लिए तैयार रहे। कई बार बिना लड़े भी तो मसले हल होते हैं। तो क्या ऐसे ही हथियार डाल दें? लिजिए संघर्ष से संघर्ष करने के तरीके पर ही संघर्ष शुरू हो गया।
अज्ञेय को पढ़ते हुए लगा कि लड़ा जाए... क्योंकि शोधन करने पर ही परिष्कार हो सकता है। लड़ते रहे.... लड़ते रहे.... ना जीत मिली ना हार। संघर्ष घना होता चला गया। बेचैनी बढ़ती रही, अनिश्चय से पैदा होता तनाव भी... कुछ परिणाम नहीं। कब तक ये संघर्ष, कब तक ये बेचैनी और तनाव, जवाब... मौन। बचपन की सीख याद भी आ गई... हर वक्त का लड़ाई-झगड़ा... फिर फायदा भी क्या है?
कहा ना! प्रयोग करने की आदत है या फिर कह लें सनक... टेस्ट चेंज करने लिए ओशो को पढ़ा तो लगा कि कभी-कभी खुद को छोड़ देना भी काम कर सकता है। छोड़ दिया बहने और डूबने के लिए... देख रहे हैं, किनारे खड़े होकर... मरेंगे नहीं ये विश्वास है। उबरेंगे, कुछ लेकर, कुछ नए होकर...।

Wednesday, 30 March 2011

उगा है गाँठों का झुरमुट


कभी-कभी ऐसे ही बेवजह कुछ उलझ जाता है कि कोई सिऱा पकडाई में ही नहीं आता। सब कुछ सहज होता है, लेकिन कोई गाँठ ऐसे उभर आती है, जैसे वो वहीं थी, कई-कई बरस से, और हमारी नजर ही नहीं पड़ी उस पर और इस बार उस नाराज बच्चे की तरह ऐंठी हुई है, जिसे डाँट दिया हो और उसकी नाराजगी को भूल कर सब लोग काम पर लग गए हो। बहुत देर इंतजार करने के बाद वो कुछ ऐसा करे, जिससे सबका ध्यान उसकी ओर जाए। लेकिन जब ध्यान चला जाए और उसे मनाने के प्रयास किए जाए, तो उसकी अकड़ कम होने की बजाए कुछ और बढ़ जाए। पुरानी गाँठे, पुराने ज़ख्मों की तरह अड़ियल हो जाती है, खुलने में ही नहीं आती है। जितनी कोशिश करो, उतनी ही कड़ी होती चली जाती है।
कुछ ताजा, कुछ भूला-भटका, कुछ कहीं अटका और कुछ जहन में कहीं उलझा... सब मिलकर धमाचौकड़ी कर रहे हैं और हमारे पास सिवा उसे निस्संग होकर देखने के कोई और उपाय ही नहीं हो। एक अच्छे-से दिन के आखिरी सिरे पर उभर आया वो गूमड़... बिना किसी तर्क, बिना किसी कारण के। उभरी हुई गाँठ नजर आ रही है, गीले-उलझे धागों का गुँझलक भी, बस नहीं नजर आ रहा है तो कोई सिरा...। यूँ बेसबब कोई इस तरह से बेचैन होता है क्या? अक्सर अपनी बेचैनी पर इसी तरह के सवाल से रूबरू होते हैं, हो सकता है इस बेचैनी का कोई सिरा कहीं गहरे अतल में अटका हुआ हो, हो सकता है कि इसका कोई सिरा ही न हो, यूँ इस तरह के कयासों का कोई फायदा है क्या?
ये पहली बार नहीं है और शायद आखिरी बार भी नहीं... कभी-कभी इसकी जड़ें कहीं दूर अतीत में जाकर मिलती है तो कभी आज ही में कहीं अटकी हुई और कभी-कभी तो भविष्य का अज्ञात तक आकर इसमें जुड़ जाता है, कितनी ही कोशिश कर लें कि आज को ही देखें... अभी को, इसी पल को, लेकिन हमारी कोशिशों, चाहने और सोचने से परे चलता है ‘अंतर’ का संसार...। यहाँ कोई तर्क, कोई विचार, प्रयास, बहलाना, फुसलाना या फिर बहकाना कुछ भी नहीं चलता है। यहाँ के नियम तो अज्ञात है, लेकिन उल्लंघन पर सजा मिलती है कड़ी। हम ये नहीं कह सकते हैं कि – ‘यहाँ नो इंट्री का साइनबोर्ड नहीं है, ये हमारी गलती नहीं है।’ बस गलती की सजा मिलेगी ही मिलेगी, चाहे हम ये न जाने की गलती क्या है? तो अब सचमुच नहीं पता कि आखिर किस नियम का उल्लंघन हमने किया है, लेकिन सजा भोग रहे हैं। और ये भी नहीं जानते हैं कि सजा की अवधि क्या होगी...