Wednesday, 22 December 2010

बाबूजी धीरे चलना...


सुबह के क्रम के तहत अखबारों पर नजर डाली जा रही थी, खबरों को पढ़ने के दौरान तो इयरफोन लगाए ही जा सकते हैं। पास की कुर्सी पर आकर बैठे नए-नए भर्ती हुए रिपोर्टर ने हलो की, हमने भी गर्दन हिलाकर हलो कर दी और मशगूल हो गए अखबार देखने में...। थोड़ी देर बाद लगा कि शायद वो हमसे कुछ पूछ रहा है। हमने एक कान से फोन हटाया... – क्या सुन रही हैं मैम?
उसने सवाल किया तो बजाए जवाब देने के इयरफोन निकाल कर उसके हाथ में दे दिए। यूँ भी मजा तो खराब कर ही चुका था वह। गज़ल चल रही थी मुहब्बत करने वाले कम न होंगे... नहीं बेग़म अख़्तर नहीं मेंहदी हसन की आवाज में... अगर तू इत्तफ़ाकन मिल भी जाए... ये लाइन दोहराई जा रही थी। शायद तीन-चार दफा हो गया था, उसने धीरे से इयरफोन निकाल कर पूछा – कैसे सुन लेती हैं मैम आप इस तरह की चीजें? एक ही लाइन को कितनी देर से गाए चले जा रहे हैं हज़रत...।
हमने मुस्कुरा कर जवाब दिया सुकून मिलता है, डूबने का स्कोप होता है और... उसने तुरंत हमारी बात काटी – इतना समय किसके पास है?
हमने बहुत धीरज से अपने कंधे उचका दिए... गोयाकि उसकी बात एक नासमझ की बतकही हो... फिर खुद ही लगा पुरानी पीढ़ी के हो चले हैं, समय की कीमत ही नहीं जानते हैं, सच तो यह भी है कि दौड़ने की उम्र से आगे जा चुके हैं, फिर खुद को ठीक किया... नहीं, ये आज की पीढ़ी हैं, इन्हें न संगीत की समझ है ना शायरी की... हाँ शीला की जवानी या मुन्नी बदनाम हुई टाइप की चीजें ही इनके लिए ठीक है।
लेकिन ये समय का काँटा धँसा तो धँसा ही रह गया। शाम टीवी के आगे अपनी थाली लिए बैठे तो (कहा जाता है कि टीवी देखते हुए खाना नहीं खाना चाहिए, मोटे होने का डर बना रहता है, लेकिन समय का जुगाड़ कहाँ से करें? देखिए, हम भी कहने लगे कि समय कहाँ हैं?) दीपिका पादुकोण अपनी मनमोहिनी मुस्कान के साथ कहती दिखी - इंडिया को चाहिए सब कुछ लाइटनिंग फास्ट... लिजिए सब कुछ तेज गति से ही चाहिए...। ज्यादा सीसी और तेज पिकअप वाली गाड़ियाँ, तेज नेटवर्क वाली मोबाइल और इंटरनेट सर्विस, तेज गति की फिल्में औऱ संगीत, छोटे लेख और कहानियाँ, तेज घटनाक्रम वाले उपन्यास, जल्दी और ज्यादा नाम-दाम देने वाला रोजगार, जल्दी और तेज तरक्की देने वाली एमएनसी... सुपर फास्ट ट्रेनें, फास्ट फूड, तेज रफ्तार जेट और पता नहीं क्या-क्या... बस जिंदगी तेज दौड़ रही है, दौड़... दौड़... और बस दौड़... तेज दौड़... आखिर कहाँ जाना है इतना तेज दौड़कर, जानता तो कोई कुछ नहीं, लेकिन ‘आसमान गिरा’ की तर्ज पर सारे-के-सारे दौड़ रहे हैं... बचपन भर खरगोश और कछुए की कहानी पढ़ी-सुनी, लेकिन आजकल लगता है कछुआ होना गुनाह है, अपराध है, अभिशाप है... सोचकर ही मन कुछ खट्टा हो गया, लेकिन क्या धीमा जीवन इतना बुरा है? यदि ये इतना बुरा होता तो इटली के लेखक और फुटबॉलर कार्लो पेट्रिनी 1949 में स्लो मूवमेंट नहीं चलाते। इटली में मैकडोनल्ड्स के खिलाफ शुरू हुए इस मूवमेंट में स्लो फूड से लेकर स्लो पेरेंटिंग तक की बात कही गई है। आखिर सोचें कि जीना, महसूस करना तो लाइटनिंग फास्ट नहीं हो सकता है ना? पहली बारिश में रूखी-सूखी धरती पर नन्हीं-नन्हीं बूँदों के पदचाप से उठती धूल और सौंधी खुशबू को क्या लाइटनिंग फास्ट स्पीड से देखा और महसूस किया जा सकता है... सुबह के सूरज को धरती से आसमान की तरफ हौले-हौले जाते देखने की क्रिया तो तेज नहीं हो सकती है। फूलों का खिलना, शाम का ढलना, मौसम का बदलना ये सब आहिस्ता-आहिस्ता होने वाली घटनाएँ हैं, जब प्रकृति किसी किस्म की जल्दी में नहीं है तो फिर हमें क्यों होना चाहिए? धीरे-धीरे अपने आस-पास को जानना, जीना-निहारना, जज़्ब करना न सिर्फ अपने परिवेश को जानना है बल्कि अपने अंदर बीजारोपण करने जैसा है। आखिर तो जीवन जीने के लिए है, आऩंद लेने के लिए, महसूस करने, खुश होने औऱ खुश करने के लिए है ना...। मशीन की तरह तेज गति से ना तो जीवन का आनंद लिया जा सकता है और न ही कुछ महसूस किया जा सकता है तो फिर बाबूजी धीरे चलना...

Friday, 10 December 2010

मुक्ति की चाह... किससे और क्यों...?


बेतरह उलझन और कठिन सामाजिकता निबाहने का दौर तो गुजर गया, लेकिन पता नहीं क्यों कहीं कुछ अटका पड़ा हुआ है, तभी तो कुछ बेचैनी-सी है। लगातार देर रात तक जागने और सुबह जल्दी उठ जाने के बीच आज की सुबह कुछ सुकूनभरी थी... लंबे समय के बाद सुबह की दौड़-धूप से दूर निपट तनहाई... छुट्टी की सुबह हो और ऐसा अकेलापन हो तो और मन क्या चाहेगा, जबकि उसकी शिद्दत से जरूरत भी हो...सुबह गुनगुना उनींदापन और मीठी-महकती उदासी के बीच सामाजिक जीवन को जीने के दौरान उभरे अर्थहीनता के आइसबर्ग को दूर ढकेल दिया और जरा खुद के करीब आ बैठे। पिछली कई रातों से ऐसा हो रहा है कि गहरी नींद के बीच एक शब्द ‘मुक्ति’ लगातार एक ही जैसी आहट और आवृत्ति के साथ जहन पर तब तक दस्तक देता रहता है,... जब तक कि नींद न उचट जाए... नींद उचटने के बाद सवाल – किससे मुक्ति? कैसी मुक्ति? हर बार की तरह जवाब नहीं।
दाग़ के अशआर औऱ शुमोना की आवाज के साथ... होशो हवास ताब-ओ-तवां दाग़ जा चुके/ अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया... घुलने की चाहत जागी थी। एकाएक मुक्ति की गुत्थी सुलझती हुई नजर आई थी। अपने भौतिक और अभौतिक होने से मुक्ति की माँग... घुलने... बह जाने... कुछ न होने की चाह...। भौतिक होने के अहम औऱ अभौतिक होने की कभी-कभी बोझिल हो जाती प्यास से मुक्ति... उस बोझ से मुक्ति की चाहत, जो सामाजिकता औऱ व्यक्तिगतता की वजह से खुद पर लादा हुआ-सा महसूस होता है। भौतिक के अदृश्य हो जाने और अभौतिक के घुल जाने की आकांक्षा... जागा कि ‘हम’ होने से ‘न-कुछ’ हो जाए... अपनी अनुपस्थिति में देखें दुनिया को, असंपृक्त, निर्लिप्त और निस्संग होकर... देखें कि जो दुनिया हमारे होने पर ऐसी है, वो हमारे द्वारा छोड़े खाली स्थान के साथ कैसी होगी? महसूस करें कि खुद के ‘दिखने’ और ‘होने’ से अलग खुद का होना क्या है और कैसा है? जानें कि जो अब्सर्ड हमारे होते हैं, क्या वही अब्सर्ड हमारे न होते भी होता है, हो सकता है ... महसूस करें कि अपने ‘होने’ से मुक्त होने के बाद का ‘होना’ कैसे होता होगा? अपनी भौतिकता की कभी नर्म तो कभी गर्म होती अनुभूति के बिना कैसा लगता है? और अपने अभौतिक होने के अहम के गल जाने, तरल होकर बह जाने के बाद अपना ‘होना’ कैसा होता होगा? क्या ऐसा होना हो भी पाता है, या फिर ये बस एक न-पूरी होने वाली आकांक्षा ही है... या इसका होना वैसा होता होगा, जैसे गाढ़ी नींद....! लेकिन गाढ़ी नींद तो जागने तक होने वाली मौत होती है, जिसमें कोई चेतना नहीं होती है... यहाँ मामला अपने ‘न-होने’ की चेतना के बाद दुनियावी चेतना का है... ठोस स्व के पिघलने, गलने औऱ बह जाने के बाद न-कुछ होकर दुनिया के कारोबार को देखने और महसूस करने की नामुमकिन-सी इच्छा... क्यों है ये?