Friday, 25 June 2010

LOVE STORY


Get up i am telling u about the life..- she said
oh come on... its midnight...let me sleep - i request her.
No.... when i will not be with u remember me... and all this....listen... and God knows what she recite all the night... it is morning.... it melt slowly and gently.... she stood up from bed and screm...lets go for the walk....
Have u gone mad? - first u did not sleep me whole night... and then... go for walk.... no...
i saw her with lots of affection...
she comb her hair and knot with clucher... i find her very beautiful at that moment. I remember that piece of ghazal – KAUN SI BAAT HAI TUMME AISI, ITNE ACHCHE KYUN LAGATE HO….and sung….she smile sweetly and said – BAND KARO, KITNE BESURE HO. I said….i am questioning not singing…she put unreal anger on face and said come fast - she orderd and went outside... i don't have any options... i questioned myself - why i am so helpless before her... there is no answer, except this, i love her...
outside there is mild cold...sun peeks from east... i hold her hand and suddenly i go front of her, sit on knee and proposed - lets get married.
she laugh whole hearted- u r mad....seriously u r.
what happened? - i stare her with wonder...- what about laughing in this...
why marriage? - she asked
i feel insecure about u...- i answered
why?
i don't believe u, i am living in this dread that some day u 'll leave me...
now she is be serious...- yaa i can go any time...
thats why i want to marry u. - i disclosed
she smile - u think if we will get married then i could not leave u. nothing can stop me...-
she said with solidity.
then how can i tie u? - i asked her with some innocence
no, u can't...- she said.- i don't believe in to hook up in relations....
i want to live with freeodm... confinement ruin relations, I don’t want my relation to be like this.
There is raining....and she screams with happiness.
In next morning, again in my deep sleep, i want to hold her unconciously....she is not
there....suddenly i wake up with hassel and searching her madly....but i did not find her except a slip of bye.

Monday, 21 June 2010

देह की नागफ़नी, नागफ़नी की देह


संघर्ष घना है, हमेशा की तरह। लेकिन इस बार उसका रूप बिल्कुल ही नया है। कहाँ से आ गया ये सब.... ये सब तो कहीं था ही नहीं। कहाँ तो विदेह हो जाने की तीखी आकांक्षा और अब ये दैहिकता की अंकुरित होती चेतना, दो सिरे। अपने होने का खास लगना, बहुत सारी आँखों में चिह्नित होते खुद को देखने का सुख और उस सुख से उपजा दुख। न दुख अपना न सुख.... फिर भी दोनों अपने। ये बीज इस मिट्टी में कहाँ से आया? ये जमीन तक इसके लिए अनुकूल नहीं थी और ये कब अंकुरित हुआ? चलो अंकुरित हुआ होता तो समझ में आता, लेकिन ये तो बीहड़ झाड़ी हो चली है। अब इसे उखाड़ने का दुरुह कार्य... लहूलुहान होना ही ठहरा..... । ये देह की नागफ़नी कहाँ से और कैसे आ गई? ये बिल्कुल अपरिचित झाड़ी..... कैसे उग आई...? और अब उग आई है तो इसका क्या किया जाए...... ? इसे यूँ ही पनपते रहने तो नहीं दिया जा सकता है ना.... ? यही संघर्ष है... नया तो नहीं है.... हाँ ऐसा कभी रहा नहीं.... अपनी भौतिकता के प्रति हमेशा की उदासीनता कहीं गुम हो गई और एकाएक लगाव पैदा हो गया..... और इस लगाव से उपजा है संघर्ष..... हमेशा तो वैचारिकता का ही वैचारिकता से द्वंद्व रहा करता था, लेकिन इस बार ये बिल्कुल नया है। हमेशा ही कहा जाता है कि जो होती हूँ, वही नहीं होना चाहती हूँ। खुद का अतिक्रमण करने की चुभती चाह....। बस यही अस्वाभाविक ख़्वाहिश है। अपने होने को हमेशा लाँघ जाने की चाह और उसके लिए इतने ही दुर्गम उपाय.... उस सबसे दूर जो स्वाभाविक होता है, उस सबकी ओर जो कृत्रिम होता है, यही चाह है, यही संघर्ष और यही त्रास। जो सहज होता है, उसी से बचना... ।
अपना भौतिक स्व इतना गहरा कैसे हो गया? वो इतना आँखों में खटकने कैसे लगा? अपना आत्मिक स्व कहाँ बिला गया, इस सबमें... और क्यों वो मुझसे अलग हो गया? क्या वाकई अलग हो गया? यदि हो जाता तो हो सकता है कि ये संघर्ष नहीं होता, लेकिन वो भी है। फिर वही होना और होना चाहना के बीच का तनाव...। ये कैक्टस की चुभती सी देह कहीं आँखों में अटकती है.... तो फिर देह का कैक्टस लहूलुहान किए हुए हैं। संघर्ष सघन है ..... कारण विरल.....।

Sunday, 13 June 2010

...मुझे ऐ जिंदगी दीवाना कर दे




उस दिन इयरफोन लगे हुए थे। 14 मिनट 21 सेकंड लंबी इस कव्वाली के आखिरी सिरे पर थी--कई-कई वार चढ़ी कोठे ते नी मैं उतरी कई-कई वारी..... न दिल चैन न सबर यकीं नू.... न भूलदी सूरत प्यारी.... आ जा सजणा.... ना जा सजणा ......तू जितीया ते मैं हारी... छेती आजा ढोलणा.... तैनू अखियाँ उड़ीक दिया.....
विरह..... तड़प, समर्पण और बेबसी का चरम..... डूबने की शुरुआत..... उतर जाने के लिए आँखें बंद की, सिर कुर्सी की पुश्त पर टिका दिया...... उस एक क्षण के लिए..... लेकिन तभी पड़ोस में काम कर रहे साथी को किसी ने आवाज दी। उसने तो नहीं सुनी लेकिन यहाँ सुनाई पड़ गई.... क्षण छूट गया, अब भी कानों में वो लंबी सरगम सुनाई पड़ रही थी, लेकिन आँखें खुली हुई थीं और हमारे सामने खुरदुरी हकीकत फैल गई थी। टेबल-कुर्सी, कम्प्यूटर, फोन, आते-जाते, हँसते-बतियाते लोग...... जागृति के सारे लक्षण फिर से साकार हो उठे थे.... घड़ी भर की निजात का ये क्षण भी हाथ से फिसल गया था।
रविवार की छुट्टी..... सुनहरी से साँवली होती जेठ की सुबह.... जमा होती खूब सारी उम्मीदें..... बादल, बारिश, फुहारों का इंतजार। सारा काम जल्दी-जल्दी निबटाया.... डूब जाने के लिए सारी अनुकूलताएँ...... एक क्षण, सादा.... अनायास-सा आता है, लेकिन उसके लिए कितने-कितने जतन करने पड़ते हैं! दोपहर को हमेशा की तरह केट नैप के बाद की चाय.... कप पड़े हुए थे..... बहुत पुरानी उपेक्षित-सी पड़ी सीडी हाथ आई.....सूरदास का भजन जसराजजी की आवाज.... विरह का दर्द....... कुब्जा के रंग में राचि रहे...... राधा संग अइबो छोड़ दिया...... श्रीकृष्णचंद्र ने मथुरा ते गोकुल को अइबो छोड़ दिया...... फिर से डूबने-डूबने के मुहाने पर...... इस बार तो बस डूब ही चुके थे...... सुरदास प्रभु निठुर भए..... सुरदास प्रभु निठुर भए.... हसबो इठलइबो छोड़ दियो......अभी आलाप चल ही रहा था कि वॉशिंग मशीन का बजर बज उठा.... सब खत्म.....। क्यों होता है, ऐसा?
इतने चौकन्नेपन की जरूरत नहीं है? अब बजर बजा है तो बजा है, लेकिन नहीं वो कहीं अटक गया है। अचानक-से याद आ गया – मैं अपने आप से घबरा गया हूँ, मुझे ऐ जिंदगी दीवाना कर दे......और रूलाई फूट गई.....क्योंकि ये तो सिर्फ एक उदाहरण है.... मसलन – कैसेट का अटक जाना, बाथरूम का टपकता नल या फिर जलती लाइट, प्रेसवाले लड़के की या सब्जी वाले की आवाज.... केलैंडर का फड़फड़ाना या फिर तेज हवा में भड़भड़ाते खिड़की-दरवाजे, चाय नाश्ते के जूठे पड़े बर्तन या फिर जूठे पड़े चाय के कपों में चींटी हो जाना...... फेहरिस्त बहुत लंबी है, कुछ भी हो सकता है, लौटा लाने के लिए.... एक सादे-से अनुभव को पाने के लिए कितने सारे षडयंत्र!
संक्षिप्त में यूँ है कि जाग्रतावस्था में खुद को कभी भी खुद से मुक्त नहीं पाया। हमेशा त्वचा की तरह से चिपकी रहती है ये भौतिक चेतना... बस गहरी नींद में ही इससे मुक्ति है, लेकिन मुश्किल ये है कि नींद में इस मुक्ति का अहसास नहीं होता है। इतनी-सारी सतर्कता, इतना सारा चौकन्नापन क्यों है? क्यों नहीं घड़ी-दो-घड़ी खुद को छोड़ पाती.... अपनी चेतना को समेट कर सुला पाती, कि खुद के पास बैठकर देख पाती कि इस चौकन्नेपन से मुक्ति के बाद कैसा लगता है, कि बाहर से बेखबर होकर भीतर के अँधेरे को देखना, पीना, जीना कैसा लगता है? क्यों बाहर इस कदर चेतना में अटका पड़ा रहता कि भीतर मुड़ने-जुड़ने के लिए अनुष्ठान करना पड़ता है, फिर भी सफल हो गए तो ठीक... आखिर तो बाहर को सहते-सहते कभी-कभी इस सबको झटक कर अलग खड़े हो जाने का..... भौतिक स्व से दूर होकर आंतरिक स्व को टोहने का सुख बहुत सुलभ क्यों नहीं है? क्यों भौतिक जगत हमारे बाहर भी पसरा हुआ है और भीतर भी..... क्यों इसी में सब कुछ अटका पड़ा रहता है, क्यों इससे निजात नहीं है? क्या इस बेचैनी और छटपटाहट की वजह भौतिकता, दृश्य जगत का ये असीम विस्तार ही तो नहीं, जो हमें घेरे हुए हैं, बाहर से और भीतर से भी.....?.

Monday, 7 June 2010

इश्क़-ए-हक़ीक़ी में अन्नपूर्णा देवी


4 जून के स्क्रीन में अन्नपूर्णा देवी पर एक खुबसूरत आर्टिकल पढ़ा...... खुबसूरत से अच्छा और कोई शब्द फिलहाल मिल नहीं रहा है...... क्योंकि उस अनुभूति को जिसे मैंने पढ़ने के दौरान और आज तक जी रही हूँ, शब्द नहीं दे पा रही हूँ, इसलिए फिलहाल सिर्फ खुबसूरत शब्द से ही काम चला रही हूँ।
ये एकसाथ ही बहुत ज्यादा जाना और बहुत कम सुना नाम है। ज्यादा जाना इसलिए कि उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब की बेटी, उस्ताद अली अकबर खाँ की बहन के साथ ही पंडित रविशंकर की पहली पत्नी अन्नपूर्णा देवी का परिचय ज्यादातर इतना ही है..... लेकिन वो इससे कहीं ज्यादा है..... फिर परिचय इतना ही क्यों है? क्योंकि वे इतना ही चाहती हैं..... अजीब है ना..... ? हाँ तो उनका हकीकत में परिचय पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, चंद्रकांत सरदेशमुख, आशीष खान, सुधीर फड़के और उन्हीं की तरह कई-कई संगीत के दिग्गजों की गुरु के रूप में दिया जाता हैं....., फिर भी वे न तो कंसर्ट देती है और न ही रिकॉर्डिंग करती हैं...... क्यों? ये उनका निर्णय है। वे कहती है कि संगीत मेरे ईश्वर के लिए है.... मेरे लिए है.....। बस यही वो बात है, जिसने मुझे लिखने के लिए मजबूर किया। एक तरफ प्रतिष्ठा और शोहरत के लिए कुछ भी कर गुजरने वाली इस दुनिया में खुद के वजूद को इस तरह ईश्वर के हवाले कर देने के पीछे का मनोविज्ञान क्या होगा?
स्वभाव की वो कौन-सी केमिस्ट्री है, व्यक्तित्व का वो कौन सा तार है जो उन्हें अपने स्थूल होने के प्रति इतनी अचल निस्संगता देता है और अपने हक़ीकी स्व के प्रति इतनी गहरी ईमानदार निष्ठा देता है? वो क्या है? जो किसी सपने, किसी ख़्वाहिश, किसी प्रलोभन से नहीं डोलता है? मान, प्रतिष्ठा, शोहरत, समृद्धि, प्रशंसा, महत्वाकांक्षा, सफलता, उपलब्धि हर चीज के प्रति इतनी ठोस निर्लिप्तता, अचल उदासीनता और निश्चल निस्संगता कैसे आती है? और वो कैसा मन है, जो इस दौड़ती भागती दुनिया के बीच भी वैसा ही अटल, वैसा ही निश्चल बना रह सकता है? क्या ये इस तरह का संतत्व...... अचीव किया जा सकता है, पाया जा सकता है? या वो बस स्वभाव होता है? क्या इतनी निर्द्वंद्वता कभी पाई जा सकती है? क्योंकि यही तो उस मंजिल तक पहुँचाती है, जिसे फ़कीरी कहते हैं...... सब होने से दूर.... सब पाने से अलग..... सब जीने से निस्संग..... बस इश्क-ए-हक़ीक़ी में गर्क होना.....। यही तो है ना जीवन का आनंद.......?

Friday, 4 June 2010

इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं


ऐसा शायद होता ही होगा.... तभी तो उत्सव से जुड़ता है अवसाद। क्या होता होगा इसका मनोविज्ञान.....? क्यों होता है, ऐसा कि जमकर उत्सव मनाने के बाद समापन के साथ ही गाढ़ी-सी उदासी........ न जाने कहाँ से चुपके से आ जाती है.... करने लगती है चीरफाड़, उस सबकी, जिसे आपने जिया...... भोगा.......और किया....... पूछने लगती है सवाल कि क्यों किया ऐसा.......इस जीने से क्या मिल गया?
क्या खुद को सामूहिकता में बहा देने...... बिखेरने और फैला देने का प्रतिशोध होता है ये अवसाद..... क्योंकि उत्सव की कल्पना ही सामूहिकता से शुरू होती है। तो क्या अपने स्व को बहा देने के दुख से पैदा होता होगा अवसाद......। कहीं लगता है, कि ये सामूहिकता और व्यक्तिगतता के बीच का द्वंद्व या फिर..... भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच का तनाव तो नहीं है? क्योंकि अक्सर गहरी एकांतिकता में अनायास आ पहुँचे आनंद के क्षणों को जी लेने के बाद तो ऐसी कोई अवसादिक अनुभूति नहीं होती.....उसके बाद तो एक दिव्यता का एहसास होता है, तो फिर सामूहिकता के आनंद को जी लेने के बाद ऐसा क्यों होता है?
तो क्या यहाँ भी मामला भौतिक और आध्यात्मिक है.....? भौतिकता को जी लेने, भोग लेने के बाद रिक्तता का अहसास अवश्यंभावी है...... और आध्यात्मिकता के बाद खुद के थोड़ा और आगे बढ़ने....... कुछ और भरे होने..... कुछ ज्यादा भारी हो जाने का सुख.....? क्या भौतिकता रिक्त करती है और आध्यात्मिकता भरती है? तो फिर भौतिकता के प्रति इतना गहरा आग्रह क्यों होता है? तो इसका मतलब ये है कि हम सीधे-सीधे खुद से ही भाग रहे हैं...... अवसाद सिर्फ उन्हीं के लिए है जो स्व के प्रति आग्रही है..... वरना तो मजा ही सब कर्मों के मूल में है। फिर हमें ये वैसा क्यों नहीं रखता है..... हम क्यों उत्सव के बाद अवसादग्रस्त हो जाते हैं....? क्या ये ऐसा है ? – इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं…..
कहीं गड़बड़ केमिस्ट्री में ही तो नहीं....?