Friday, 21 May 2010

लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस


शुक्रवार की शाम थी.... इंतजार के पहले दिन के मुहाने पर बैठे थे, अभी एक दिन और बाकी था। अपने एक जैसे रूटिन में सन्डे का इंतजार करते रहने के दौरान यूँ ही एक तुकबंदी रच डाली थी
सोम, मंगल खुमार
बुध, गुरु उतार
शुक्र, शनि इंतजार
तब कहीं आता है रविवार....
हाँ तो टीवी के सामने अपनी खाने की थाली लगी थी..... बालिका वधु का हमेशा की तरह ही अतार्किक उत्सुकता जगाने वाला अंत हुआ था। थाली में से दाल की कटोरी तो पहले ही अलग कर चुके थे, एक-एक कौर खाकर दोनों सब्जियों को भी रिजेक्ट कर चुके थे, आम के रस के साथ चपाती खाना.... च्च.... तो फिर चपाती किसके साथ खाएँ.... इसकी खोज करने के लिए किचन में पहुँचे तो दही नजर आया.... चीनी और पीसी इलायची डाल कर थाली में रखा..... समय को पुरी तरह से निचोड़ लेने के लिए टीवी के सामने बैठकर भी किताब हाथ में हुआ करती है, वो तब भी थी...... एनडीटीवी पर ब्रेक खत्म हो चुका था, हमारा सिर किताब में ही था कि श्योपुर का नाम सुनकर कान खड़े हुए..... किताब में बुकमार्क फँसाया और टीवी देखने लगे। रूबीना खान शापू मध्यप्रदेश में भूख की रिपोर्ट लेकर आई थी, वे श्योपुर में एक माँ से चर्चा कर रही थी, जो उसे बता रही थी कि वे अपने बच्चों को खाने में खरपतवार दे पाती है, क्योंकि उनके पास आलू खरीदने के भी पैसे नहीं है..... कौर गले में अटक गया और साँस सीने में.....हाथ का चम्मच चला-चला कर हमने दही की छाछ बना डाली थी। रिपोर्ट गुलज़ार की फिल्मों की तरह कभी फ्लैश बैक में 2008 में जाती तो कभी वर्तमान में आ जाती है, दो साल से हालात में कोई फर्क नहीं आया.... अपने शहर से उत्तर में श्योपुर, दक्षिण में खंडवा और पश्चिम में झाबुआ तक के 200 किमी के रेडियस में इस कदर भूख पसरी हुई है..... कहीं कुछ काँपा..... आँखों से कुछ पहले आँसू भी ठिठक गए..... छोटे-छोटे बच्चों की निकली हड्डियाँ और सूखे से चेहरे..... कहाँ पहुँचे हैं हम विकास करके.....?
रूबीना अब भोपाल में शाइनिंग इंडिया का नजारा दिखा रही थी.... हमारी रूकी हुई साँस फिर से चलने लगी, गले का कौर उतर गया, नहीं सब कुछ उतना बुरा भी नहीं है। उसने इस बात से अपनी रिपोर्ट का समापन किया कि – खाते-पीते मध्यमवर्ग को शर्म मगर नहीं आती.... उसी निश्छल बेबसी में हमने सवाल किया – आती है भाई बहुत आती है, लेकिन हम क्या कर सकते हैं......?
उसी बेचैनी में पतिदेव ने जवाब दिया – कुछ नहीं बस अपना टैक्स ईमानदारी से चुकाइए....
निश्छलता बाकी थी, अभी कल ही तो सवाल उठा कि हम कितना बचे हैं..... नहीं अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है...... अब भी कुछ बचे हुए हैं। फिर से एक बेतुका सवाल किया – हम तो ईमानदारी से अपना टैक्स भर रहे हैं, फिर भी तो बच्चे भूखे हैं।
सवाल करते ही सारी निश्छलता हवा हो गई...... खाँटी दुनियादारी सतह पर फैल गई..... जवाब जो पाना था – हमारे टैक्स चुकाने और बच्चों की भूख शांत होने के बीच बहुत सारे अप्स एंड डाउंस हैं...... हमारे लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस....
नहीं है क्या?

Thursday, 20 May 2010

होने-गंवाने का हिसाब


मानसून के आमद की खबरों के बीच पश्चिम में गर्मी अपने पूरे शबाब पर है..... दाना चुगने के लिए चोंच खोले चिड़िया के बच्चे की तरह धरती का मुँह जगह-जगह से खुलने लगा है..... मौसम की कुछ ज्यादा ही मेहरबानी रहती है हम पर जरा बदला नहीं.... मन भी बदलने लगता है.....। हाँ तो अभी हर जगह तपन है.... भारी..... तेज-तीखे दिन और गहरी गुनगुनी शामों के साथ पठार की रातें जरा सुरमई मीठी हो जाती है, लेकिन क्या करें कि दिन भर की तपन
उसकी मिठास भी लील लेती है......तो जब रात हाथ आती है तो खुद हम कुछ बचे नहीं होते हैं। अब यूँ ही हम कितने बचे होते हैं......?
बस यही खऱाब आदत है, बात सीधी हो लेकिन पहुँच जाती है टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में...... यूँ भी हम कितने बचे हुए हैं........ ? अब ये तो कोई सवाल नहीं है..... लेकिन है कैसे नहीं.... यही तो सवाल है...... सवालों वाला......खूब सारे खाँचों.... बहुत सारे रिश्तों.... सपनों, ख्वाहिशों, जरूरतों, अपेक्षाओं और समझौतों के बीच
कोई भी जितना बचा रह पाता है.... बस उतने ही हम भी बचे हुए हैं.....। रिश्तों के बीच अपने होने को भूले..... हर रिश्ते, हर जगह और हर काम की अपेक्षाओं के बीच खुद कण-कण झरते हैं...... बहुत चुपके से..... खाँचों में पूरे ही स्वाहा हो गए..... और किसी पारंपरिक खाँचों को न भी बखाने तो जो भौतिक खाँचे हैं, वे तो हैं ही ना.... औरत, शादीशुदा....वर्किंग.....अजीब-सी.... घमंडी.... अकड़ू..... थोड़ी बहुत सहानुभूति हो तो.... संवेदनशील.... अच्छी और दो-तीन कांप्लीमेंट.... परिभाषित हुए और खेल खत्म.... बस इतने ही तो हैं, हम.... कितने.... बस कुछ शब्द.....यही है जिंदगी कुछ ख्बाव, चंद उम्मीदें.... लेकिन यहाँ तो मामला अपना है.... जीवन की कौन कहे.....। फिर बारी आती है खुद अपनी..... कई-कई सपनों, जरूरतों और ख्वाहिशों के पीछे भागते हम...... इस दौरान कितना और क्या छोड़ देते हैं, हिसाब ही नहीं रखते हैं। मेरे साथ रहने वाले 'विद्वान' कहते हैं कि - ''हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है, अब ये आपको तय करना है कि किसके बदले आप कितना चुकाना चाहते हैं....'' तो फिर खुद को अपने सपनों पर कुर्बान करते रहते है, यदि एक सपना हो तो नुकसान उतना नहीं होता.... लेकिन यदि सपनों की फौज ही हो तो फिर तो हम रेत के एक कण जितने वाल्यूम में भी नहीं बचते हैं.... लेकिन परवाह किसे हैं, सपनों के पीछे दौड़ते जाने के जुनून, असफल होने का दुख या सफल होने के नशे के बीच ये याद ही नहीं रहता है कि हम खुद को टटोल लें.... देख लें.... कि अब अपने लिए कितना बचे हैं... ...? और जब हमें इतना होश आता है कि हम अपने होने को टटोल लें, सहेज लें.... तो पता लगता है कि सहेजने जैसा तो अब कुछ बचा ही नहीं है....। लेकिन
ज्यादातर तो हो जाने से ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन हमारे जैसे कुछ होने से नहीं चुपाते हैं तो फिर इसी तरह के सवाल उठाते हैं, जिनका न सिर होता है और न ही पैर.... तो हम बहुत कुछ हो तो जाते हैं, लेकिन इस होने के चक्कर में रह कुछ नहीं जाते हैं... . एक खाली-खाली सा वजूद जो दूसरों के लिए बहुत कुछ होता है, बस अपने ही लिए कुछ नहीं रह पाता है....। अब ये तो कोई इत्तफाक नहीं है कि मैं ये सब लिख रही हूँ और मेंहदी हसन साहब शायर फरहत
शहजाद को फरमा रहे हैं -
अपना आप गंवा कर तूने, पाया है क्या,
मत सोचा कर, मर जाएगा......
फिर.......?

Tuesday, 11 May 2010

दर्द के लिए दवा के तौर पर दर्द की तलाश


बेचैन दिन और तपती-सी रातें हैं.... उद्वेलन, उलझन और विषाद की पर्तें चढ़ने लगी है। होने पर सवाल और मुट्ठी में बँधी रेत-सी फिसलती....साँसों का अहसास.... हो पाने का अहसास और होने को बहा दिए जाने की तीखी ख्वाहिश..... ऐसे ही तपते, उलझे और मुश्किल दिनों में शिद्दत से बीमार हो जाने की ख्वाहिश करती हूँ.....। बेवकूफ कही जाती हूँ.... इसलिए ख्वाहिश तो करती हूँ, लेकिन उसे जाहिर नहीं करती...... अक्सर 2-4 दिनों के बुखार के बाद यूँ लगता है, जैसे पुनर्जन्म हुआ है..... पुराना सब कुछ कहीं इन दिनों में बह गया है.... सारी उलझनें सुलझ जाती है और जीवन अपने पूरेपन में नया हो जाता है..... हम भी.....लेकिन या तो मैं गलत हूँ या फिर मेरे एहसास..... या फिर...... पता नहीं... मेरा लगना और चाहना एक बार फिर से उसी शिद्दत से उभर रहा है। विचारों और ख्वाहिशों की गुंजलक बन गई है.... उलझनें गहरी हो गई है और कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है.....। तो फिर वही ख्वाहिश उभरी है...। अपने धुल जाने और नए हो जाने के लिए फिर से बीमार हो जाना चाहती हूँ।
इन दिनों निर्मल वर्मा की डायरी पढ़ रही हूँ। इससे पहले कभी किसी की डायरी पढ़कर यह नहीं लगा कि ये मेरा आइना है.... इसे पढ़कर हर दिन लगता है। इच्छा जागती है कि काश ये कंठस्थ हो जाए..... इसकी हरेक चीज मुझे याद रहे..... जानती हूँ, थोड़ा मुश्किल है। हाँ तो इसका जिक्र इसलिए यहाँ आया कि वे भी यही कहते हैं....
क्या बीमारी किसी सॉल्वेंट का काम करती है, जिसमें हमारा मैं घुल जाता है और हम दुबारा इस दुनिया में नई साँस लेने आते हैं – मानो देह का बुखार आत्मा के ज्वर को अपने में समा लेता है और उसे हल्का और मुक्त छोड़ देता है।

ये पढ़कर मुझे अच्छा लगा..... आखिर इस दुनिया में कोई तो है/था, जो मेरी ही तरह महसूस करता है/था। हालाँकि कोई भी विचार, अहसास दुनिया में अनूठा, अलबेला नहीं होता है, लेकिन जब तक हमें उस तरह से सोचने और महसूस करने वाला न मिले तब तक के लिए तो वह अनूठा ही हुआ ना....! खैर अच्छा लगने का कारण एक तो यह है कि आखिर कार मैं ऐसा कुछ तो महसूस करती हूँ जो निर्मल वर्मा जैसे धुरंधर बौद्धिक ने भी कभी अनुभव किया है। दिल के खुश रखने के लिए कोई भी खयाल क्या बुरा है।
तो मेरे बीमार होने की दुआ करें...... आमीन!

Saturday, 8 May 2010

माँ एक रसायन है



माँ से हमारा रिश्ता सबसे पुराना होता है, खून का....इसलिए उसे तो हमें प्यार करना हुआ ही..... कुछ ऐसे रिश्ते भी होते हैं, जो माँ की तरह खून से तो नहीं बँधे होते हैं, लेकिन उनके होना, हमारे जीवन की नींव में होता है, और वो इतना पुख्ता होता है, कि उसका अहसास हमें जीवन के हर मोड़ पर होता रहता है.... वो माँ नहीं होती, लेकिन उससे कम भी नहीं होती.... फिर हरेक के जीवन में ऐसे रिश्ते नहीं होते हैं, ये बहुत रेयर है..... मैं खुशनसीब हूँ कि मेरे पास ऐसा रिश्ता है.....मदर्स डे पर एक ऐसा ही रिश्ता...... आदरांजलि के साथ
गर्मियों की शाम थी.... वे जल्दी-जल्दी मुझे तैयार कर रही थीं.... पता नहीं कब से दोनों ने मुझसे जुड़े हुए कामों को आपस में बाँट लिया था.... या फिर ये यूँ ही बस होता चला गया था। बालों में तेल लगाना, उन्हें रीठा-शिकाकाई से धोना बा (ताईजी, यूँ गुजराती में माँ के लिए बा शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन हम भाई-बहन ताईजी को बा कहते हैं, क्योंकि भइया, (ताईजी का बेटा) उन्हें बा कहता है, इसलिए हम भी उन्हें बा कहने लगे) के जिम्मे था और उन्हें सुलझाना, बाँधना और जुएँ निकालना माँ के हिस्से।
दरअसल मेरे लंबे खूबसूरत बालों को लेकर बा और पप्पा (ताऊजी) दोनों ही अतिरिक्त रूप से सतर्क थे। और वे उसके लिए वे सारे खटकर्म करते थे, जो उन्हें कोई भी सुझा देता था। हाँ तो बा मुझे डांस क्लास ले जाने के लिए तैयार खड़ी थी और मैं खेलने में मगन थी। पता नहीं माँ जल्दी-जल्दी कर सुलझा रही थी इसलिए या फिर मुझे दुख रहा था, इसलिए मैं जोर सी चीखी थी... आप बाल खींच रही हैं।
माँ ने सिर पर तड़ाक से चपत लगाई थी.... तू सीधी नहीं बैठ रही है, कैसे सुलझाऊँ.... बा का गोरा चेहरा तमतमा आया था। गुस्सा वे करती नहीं हैं, फिर भी खीझकर बोली थी, उसे दुख रहा है, तू छोड़ मैं कर देती हूँ। माँ गुस्सा होकर वहाँ से चली गई थी। अपने राम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। ना तो माँ एक से ज्यादा आम खाने को देगी, ना आम आते ही उन्हें हाथ लगाने देंगी, रात को खिचड़ी खानी होगी तो भी माँ तो बनाकर देने से रही..... कलाकंद भी तो बा ही मँगवा कर खिलाएगी तो फिर माँ के गुस्सा होने से फर्क क्या पड़ता है.... होती रहे गुस्सा....।
उनके साथ मेरा बचपन भरा-भरा था, मैं बा के साथ ही रहती, कहीं जाना हो तो बा के साथ, बा मायके जाए या फिर बहन के घर शादी में मैं साथ ही टँगी रहती थी। शायद ही कभी किसी ने बा को मेरे बिना देखा हो। माँ के साथ आना-जाना मुझे ज्यादा सुहाता नहीं था। माँ बहुत अनुशासित हैं और बहुत टोका-टोकी करती हैं... और बा.... बा के साथ तो बिंदास रहा जा सकता है। इसलिए जब माँ मायके जाती तो हम दोनों भाई-बहनों की कोशिश हुआ करती थी कि हम ना जाएँ और हाँ बा की भी.... हमारे न जाने के पीछे के कारण स्पष्ट थे, यदि आधी रात को भी हलवा खाने की फरमाईश की तो बा ही पूरी करेगी.... माँ तो डाँट-पीटकर सुला ही दें....।
शायद उसी समय का वाकया है.... बैसाख के अंतिम दिन थे, परीक्षाएँ खत्म हो चुकी थी। माँ मायके जाने की तैयारी कर रही थी, वे चाहती थीं कि हम दोनों भी उनके साथ जाएँ.... कारण स्पष्ट था, सभी बहनें अपने-अपने परिवार के साथ वहाँ आएगी.... आखिर नाना-नानी को भी तो हमारा इंतजार होता था, फिर शायद एक वजह यह भी रही होगी कि वहाँ हम दोनों बहुत सयाने माने जाते थे, कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं, कोई जिद नहीं... जाहिर है वहाँ हमारी तारीफ हुआ करती थी.... हो सकता है माँ को यह अच्छा लगता हो.... यूँ माँ ने हमारी तारीफ कभी नहीं की.... शायद यहाँ भी दोनों ने कोई समझौता किया हो कि अनुशासन माँ देगी और प्यार बा करेगी।
मुझे ननिहाल जाना पसंद नहीं था, बात यह है कि बा की वजह से हम दोनों भाई-बहन बहुत चटोरे हो गए थे। हर दिन सामान्य खाना हमारे बस की बात नहीं थी.... और चूँकि नानी हमारी माँ की भी माँ हैं, इसलिए अनुशासन में वे माँ से भी एक कदम आगे थी....इसलिए उनका फरमान रहता थी कि घर में जो कुछ बना है, सभी वही खाएँगे.... जब खाने की थाली पर बैठकर हम भाई-बहन नाक-भौं सिकोड़ते थे तो नानी हमारी माँ से कहतीं थी - तेरी जेठानी ने तेरे बच्चों को बहुत बिगाड़ दिया है, सिर्फ अच्छा खाने को चाहिए...। तब तो यूँ लगता था कि नानी बा की बुराई कर रही है, आज समझ में आता है, कि नहीं वो उनकी तारीफ थी।
हाँ तो माँ जाने के लिए अंदर के कमरे में सूटकेस जमा रही थी और बा बहुत बेचैनी से अंदर-बाहर-अंदर-बाहर कर रही थीं। कभी कोई दवा लेकर आतीं और माँ को रखने के लिए देती तो कभी ग्लूकोज देती, तो कभी हिदायतें....बहुत देर तक माँ अपनी झुँझलाहट छिपाने की कोशिश करती रहीं, फिर रहा नहीं गया तो कह दिया - आपके बच्चों को आपके पास ही छोड़ जाती हूँ।
बा थोड़ी खिसिया गईं.... नहीं बेटा गुस्सा मत कर... बच्चे वहाँ जाकर बीमार हो जाते हैं ना! बस इसीलिए थोड़ी चिंता होती है।
माँ मीठे-से मुस्कुरा दी - मैं ध्यान रखूँगी, आप चिंता न करें।
लेकिन फिर ऐन मौके पर पता नहीं कहाँ क्या गड़बड़ा जाता कि मैं माँ के साथ जाने से इंकार कर देती..... क्योंकि यहाँ जितनी स्वतंत्रता मिलती है, और जितना स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता है, वह ननिहाल में मिलने से रहा।
जाने वाले दिन सामान आँगन में रखकर ऑटो का इंतजार हो रहा होता है, तभी बा आकर माँ की गोद भरती है। ऑटो आकर घर के सामने खड़ा हुआ है.... इधर दोनों एक-दूसरे के गले मिलकर सुबकने लगती है। मुझे बड़ी हैरत होती है, माँ तो अपनी माँ से मिलने जा रही है तो फिर वो क्यों रो रही है? और बा को क्या हो गया है? लेकिन दोनों को रोता देखकर मैं भी बुक्का फाड़कर रोने लगती हूँ तो बा मुझे गले लगा लेती है। ये सीन साल-दर-साल गर्मियों में दोहराया जाता रहा है।
पता नहीं ऐसा डांस की प्रैक्टिस करने से होता है, या फिर ये विरासत में मिला है.... रात में पैर बहुत दर्द करते थे... आधी रात को उठकर बैठ जाती और बुक्का फाड़कर रोने लगती.... बा घबराकर उठती ( माँ बताती हैं कि जब मैं तीन महीने की थी, तभी से बा के साथ सोने लगी थी।)। सिर पर प्यार से हाथ फेरती, क्या हुआ बेटा....?
पाँव बहुत दुख रहे हैं....- मैं कहती
वे बहुत देर तक दबाती रहती, नींद लगती और फिर जाग कर रोने लगती.... फिर वे केरोसीन लाकर लगाने लगती तो पलंग पर सोया हुआ भईया ( बा का बेटा) उसकी गंध से जाग जाता और कहता - सारे बिस्तरों में केरोसीन की गंध भर जाएगी।
बा को गुस्सा आ जाता... तू चुपचाप सो तो, घासलेट की गंध अभी उड़ती है, फिर छोरी के पाँव दुख रहे हैं और तुझे गंध की पड़ी है।
शायद बहुत बचपन की बात है.... कोई विशेष अवसर था, इसलिए फइयों (बुआओं) के परिवार को खाने पर बुलाया था। बाल धोने की बारी थी और बा मुझे नहला रही थी। खूब देर तक सिर को रगड़ा फिर साबुन से गर्दन रगड़ने लगी और कहा - देख गर्दन कितनी काली कर रखी है। ठीक से नहाती भी नहीं है।
फई बहुत देर तक मुझे यूँ नहलाते देख शायद ऊब गईं थी... वे बोल पड़ी - भाभी कितना ही रगड़ो यह तो काली ही रहेगी।
मैं रूआँसी हो गईं थी... और बा चिढ़ गईं थी। आपको ऐसा कहना शोभा नहीं देता - जाने कैसे वे कह गईं थीं, जबकि मैंने उन्हें कभी किसी को जवाब देते नहीं देखा था। फई को खिसियाते देखा था मैंने।
मेरी शादी के बाद की घटना थी... किसी शादी से लौटी थी, इसलिए साड़ी पहनी थी और तैयार भी हुई थी.... हमेशा की तरह भाई से किसी बौद्धिक बहस में उलझी हुईं थी और मेरा ध्यान नहीं था कि वे बहुत देर से मुझे देख रही थी। फिर बहुत सकुचाते हुए कहती हैं - तू तो हीरोइन की तरह लग रही है।
उनके पास तारीफ करने का इससे बेहतर और कोई तरीका जो नहीं था। बरसों बरस अपने रंग को लेकर ताने सहती और डिप्रेशन में रहती एक लड़की से एक गोरी-चिट्टी और खूबसूरत महिला ऐसा कहे जो उसकी माँ भी नहीं है तो फिर मानना पड़ेगा कि ऐसा सिर्फ माँ ही कह सकती है, .... सिर्फ और सिर्फ माँ।
बा के रूप में मैंने स्त्री के आदर्श रूप को जाना है। जाना है कि माँ होने के लिए बच्चे तो जन्म देना जरूरी नहीं है.... ये रसायन है, फिर वे तो माँ भी हैं.... मैंने अपने जीवन में उन्हें कभी माँ के अतिरिक्त किसी और भूमिका में नहीं देखा.... बहुत सारे रिश्ते उनके आसपास हैं, फिर भी हर रिश्तों में जो सबसे ज्यादा उभरकर आता है, वह उनका माँ होना..... वे पत्नी हैं, बहन, भाभी, सास, जेठानी और अब तो दादी भी.... लेकिन फिर भी उनका माँ वाला रूप उन सबसे उपर है, वह हमेशा हर रिश्ते में माँ हो जाती हैं। शायद इसीलिए वे हर रिश्ते को प्यार और मीठी-सी सुवास से भर देती है। अपने बच्चों को सभी माएँ प्यार करती हैं, लेकिन यदि दुसरों के बच्चों को प्यार कर पाए तभी औरत वहाँ पहुँच पाती है, जहाँ वो सचमुच माँ हो पाती है। मेरी बा ऐसी ही है....। स्मृति तो इतनी है कि एक उपन्यास भी कम हो.... लेकिन क्या प्यार की कोई माप हो सकती है? क्या शब्द वो सब कह पाते हैं, जो हम सचमुच कहना चाहते हैं? नहीं... शब्द महज शब्द हैं.....लेकिन अहसासों को कहने के लिए हमें इनका ही सहारा लेना पड़ता है.... फिर किसी को यह कहने के लिए कि उसका होना हमारे जीवन की नींव से है, शब्द ही सहारा होते हैं....इसीलिए... इतने सारे बहाए हैं.... पता नहीं कितना कह पाई हूँ....?

Tuesday, 4 May 2010

जीने का शऊर आ रहा है....?


झिलमिलाते तारों और खिलखिलाती हवा के साथ रात की जुगलबंदी के माहौल में अपनी साधना के पन्नों को पलटते हुए बहुत सारी शहद की बूँदे जहन में उतरी थी.... सोचा था, सुबह बहुत मीठी होगी...। जागने से पहले और नींद के लंबे दौर के बाद जब आँखें खुली तो पता नहीं क्यों कुछ बोझ सा महसूस हुआ, फिर सो गईं। सुबह चाय के कप के साथ अखबार पर फिसलती नजरें थी.... क्या पढ़ा ये तो पता नहीं लेकिन जो कुछ देखा वो कहीं टँक गया। एकाएक लगा कि बहुत हॉचपॉच हो रहा है। शायद दिमाग की स्टोरिंग कैपेसिटी कम है या फिर सारी ड्राइव फुल हो गई है.... तभी तो सूचनाओं की ड्राइव को खोलो तो विचारों की खुल आती है और अहसासों की ड्राइव को खोलने की कोशिश करें तो स्मृतियों की खुल पड़ती है..... अब ये तो आपकी समझ में आता ही है कि जब आप काम करना चाहते हैं, और सिस्टम बार-बार दिक्कत दे रहा हो तो, फिर किस तरह की बेचैनी होने लगती है। ठीक वैसी ही बेचैनी है..... काम करने का अपना सिस्टम है, तो हाथ यांत्रिक तरीके से काम कर रहे होते हैं, और दिमाग अपनी तरह से, लेकिन मन में कहीं कुछ ऐसा है, जो कहीं जम नहीं पा रहा है, कहीं स्थिर नहीं हो पा रहा है। बहुत सारी अनुभूतियों और सवालों की खिचड़ी पक रही है...... कहीं केंद्रीत नहीं कर पा रही हूँ.... और कुमारजी सुनाते हैं, उड़ जाएगा हंस अकेला.....,कहीं कुछ जमा हुआ दरकने लगा...... गीला-गीलापन उतर आया और विचार आया यही सच है..... लेकिन ये आज क्यों...... नहीं ये उभरता रहता है, आज फिर उभरा है..... क्या जीने का शऊर आ गया?
मरने का सलीका आते ही जीने का शऊर आ जाता है....
नहीं....?

Sunday, 2 May 2010

भूख जगाता बाजार


गर्मियों के सुलगते दिन और बुझती रातों को जीना एक अहसास है... ठंडी सफेद चादरों पर जागे देर तक, तारों को देखते रहे छत पर पड़े हुए... की तरह का....तो देर तक जागती रातों वाली ऐसी ही राख हुई छुट्टी की सुबह थी। नींद गाढ़ी थी और उसका खुमार और भी गाढ़ा.... बाहर से लगातार आ रही ठक-ठक से पड़ा नींद में खलल.... उफ्, छुट्टी की सुबह भी चैन नहीं.... शिकायतें हमारा स्थायी-भाव है (सिर्फ मेरा ही नहीं, हम सबका)। बाहर जाकर देखा तो पास में बन रहे मकान के चौकीदार का 13 साल का बेटा था जितेंद्र.... हमारे हुलिए और मुद्रा को देखकर उसने चमकते दाँतों को थोड़ा झलकाकर खिसियाई-सी हँसी बिखेरी.... भईया है?
चिढ़कर पूछा - क्यों?
गाड़ी धोनी थी ना!
उसकी बात हमारी समझ में नहीं आई...।
क्या करना है, इतनी सुबह?
भईया ने कहा था कि गाड़ी धोनी है, इसलिए....- उसने बात अधूरी छोड़ दी।
अरे अभी तो सिर्फ सात ही बजी है, नौ बजे तक आना... – नींद पूरी तरह से हवा हो गई थी, इसलिए लहजे में भी थोड़ी नर्मी आ गई.... धीरे से पीछे बेटा लगा दिया।
बाद में लगभग हर दिन वह सुबह आ धमकता.... कोई काम है?
अरे इतना छोटा बच्चा और वह भी लड़का क्या काम करेगा? कभी गार्डन साफ करवाया, फिर हर दिन पौधों को पानी पिलाने की जिम्मेदारी भी उसे दे दी। अब धीरे-धीरे वह शाम को कुछ काम है? कहता हुआ आ टपकता.... एक दिन रहा नहीं गया, पूछना ही पड़ा.... इतना सारा काम करने की क्यों सूझ रही है। उसका जवाब था.... जूते खऱीदने हैं।
मामला यूँ था कि उसे हर काम के पैसे मिलते थे... दो गाड़ी धोई तो 10 रु. पौधों को पानी पिलाया और गार्डन साफ किया तो हर काम के 10 रु. तो बस वह काम की तलाश में आ धमकता.... वह छुटिट्यों में काम करके पैसा जमा कर 11 सौ रु. के जूते खरीदना चाहता है। हमने उसे समझाया – बेटा, इन 10-10 रुपयों को इकट्ठा कर तुम खऱीद चुके जूते.... भूल जा... उन जूतों को....। तीन चार दिन बाद पता चला कि उसके पिता ने दोनों भाईयों को शहर की किसी दुकान पर काम में लगा दिया है।
अब आप इस पर तो जरा भी मत विचारो कि सरकार के मरे बाल श्रम निषेध कानून का क्या होगा? मामला यह नहीं है। उस 10 बाय 10 की कोठरी में मकान में मजदूरी करते पाँच बच्चों के साथ रहते माता-पिता के बच्चे को 11 सौ रु. के जूते लेने की इच्छा कहाँ से जागी? यहाँ आकर गाँधीजी असफल हो जाते हैं, जरूरतें सीमित करो... अरे मामला जरूरतों से आगे का है, इच्छा और फिर वह सीधे जा मिलता है, भूख से.... हवस से....। भूख पहले भी थी, लेकिन इतनी विकराल नहीं थी, जितनी विकराल भूख होगी, उतनी ही विशाल उसकी तृप्ति भी होगी। तो यूँ तो जितेंद्र को जरूरत नहीं थी इतने महँगे जूतों की, लेकिन उसकी भूख तो थी। उसने किसी विज्ञापन में धोनी को वे जूते पहने देख लिया था, फिर.... ? कहाँ से लाए संतोष..... यह जो बाजार है, जिसने अब तक सिर्फ भूख ही पैदा की है, तृप्ति नहीं....तो फिर संतोष आएगा कहाँ से?
औद्योगिक क्रांति के बाद के विकास का इतिहास पूरी तरह से बाजारों की खोज का इतिहास रहा है, इसी खोज ने उपनिवेश बनाए और ग्लोबलाइजेशन के लिए जमीन तैयार की.... सोवियत संघ का पतन तो महज तात्कालिक कारण रहा। मूल कारण तो भूख ही है... लगातार पाने की... सफलता, शोहरत, दौलत, चमक-दमक.... हर कहीं पसरी, लगातार फैलती भूख...विकास की आड़ में फैलती-पनपती भूख... विकास को जस्टिफाई करती.... उसे डिफाइन करती भूख.... बाजार सिर्फ भूख ही पैदा कर सकता है.... उसे तृप्त करना बाजार के बस का रोग नहीं है। बाजार द्वारा पैदा की गई हवस और उसकी तृप्ति के गुमनाम रास्तों से आया मवाद सारे समाज में फैल गया है। हम कितना ही कहें जातीय, ऐतिहासिक या धार्मिक मामले हैं,... लेकिन इन सबके मूल में कहीं एक ही चीज है, भूख.... बेहिसाब भूख.... कहीं पेट भरने की.... तो कहीं पाने और भोगने की...।
भूख का विस्तार जरूरतों के पहाड़ों को तो कब का लाँघ चुका है.... वह सबकुछ को डुबो देने को आतुर है..... और देखिए.... कि बाजार ने सपनों के चमकीले साँप हर घर में छोड़ दिए हैं.... उससे कोई बचाव, कोई सुरक्षा न तो सरकारों के बस में है और न ही कथित संस्कृति के बस में..... हम बस इस ‘भूख’ के प्रवाह में डूब रहे हैं..... बचाव कुछ नहीं.... है, डूबना ही नियति है.... बस