Wednesday, 22 December 2010

बाबूजी धीरे चलना...


सुबह के क्रम के तहत अखबारों पर नजर डाली जा रही थी, खबरों को पढ़ने के दौरान तो इयरफोन लगाए ही जा सकते हैं। पास की कुर्सी पर आकर बैठे नए-नए भर्ती हुए रिपोर्टर ने हलो की, हमने भी गर्दन हिलाकर हलो कर दी और मशगूल हो गए अखबार देखने में...। थोड़ी देर बाद लगा कि शायद वो हमसे कुछ पूछ रहा है। हमने एक कान से फोन हटाया... – क्या सुन रही हैं मैम?
उसने सवाल किया तो बजाए जवाब देने के इयरफोन निकाल कर उसके हाथ में दे दिए। यूँ भी मजा तो खराब कर ही चुका था वह। गज़ल चल रही थी मुहब्बत करने वाले कम न होंगे... नहीं बेग़म अख़्तर नहीं मेंहदी हसन की आवाज में... अगर तू इत्तफ़ाकन मिल भी जाए... ये लाइन दोहराई जा रही थी। शायद तीन-चार दफा हो गया था, उसने धीरे से इयरफोन निकाल कर पूछा – कैसे सुन लेती हैं मैम आप इस तरह की चीजें? एक ही लाइन को कितनी देर से गाए चले जा रहे हैं हज़रत...।
हमने मुस्कुरा कर जवाब दिया सुकून मिलता है, डूबने का स्कोप होता है और... उसने तुरंत हमारी बात काटी – इतना समय किसके पास है?
हमने बहुत धीरज से अपने कंधे उचका दिए... गोयाकि उसकी बात एक नासमझ की बतकही हो... फिर खुद ही लगा पुरानी पीढ़ी के हो चले हैं, समय की कीमत ही नहीं जानते हैं, सच तो यह भी है कि दौड़ने की उम्र से आगे जा चुके हैं, फिर खुद को ठीक किया... नहीं, ये आज की पीढ़ी हैं, इन्हें न संगीत की समझ है ना शायरी की... हाँ शीला की जवानी या मुन्नी बदनाम हुई टाइप की चीजें ही इनके लिए ठीक है।
लेकिन ये समय का काँटा धँसा तो धँसा ही रह गया। शाम टीवी के आगे अपनी थाली लिए बैठे तो (कहा जाता है कि टीवी देखते हुए खाना नहीं खाना चाहिए, मोटे होने का डर बना रहता है, लेकिन समय का जुगाड़ कहाँ से करें? देखिए, हम भी कहने लगे कि समय कहाँ हैं?) दीपिका पादुकोण अपनी मनमोहिनी मुस्कान के साथ कहती दिखी - इंडिया को चाहिए सब कुछ लाइटनिंग फास्ट... लिजिए सब कुछ तेज गति से ही चाहिए...। ज्यादा सीसी और तेज पिकअप वाली गाड़ियाँ, तेज नेटवर्क वाली मोबाइल और इंटरनेट सर्विस, तेज गति की फिल्में औऱ संगीत, छोटे लेख और कहानियाँ, तेज घटनाक्रम वाले उपन्यास, जल्दी और ज्यादा नाम-दाम देने वाला रोजगार, जल्दी और तेज तरक्की देने वाली एमएनसी... सुपर फास्ट ट्रेनें, फास्ट फूड, तेज रफ्तार जेट और पता नहीं क्या-क्या... बस जिंदगी तेज दौड़ रही है, दौड़... दौड़... और बस दौड़... तेज दौड़... आखिर कहाँ जाना है इतना तेज दौड़कर, जानता तो कोई कुछ नहीं, लेकिन ‘आसमान गिरा’ की तर्ज पर सारे-के-सारे दौड़ रहे हैं... बचपन भर खरगोश और कछुए की कहानी पढ़ी-सुनी, लेकिन आजकल लगता है कछुआ होना गुनाह है, अपराध है, अभिशाप है... सोचकर ही मन कुछ खट्टा हो गया, लेकिन क्या धीमा जीवन इतना बुरा है? यदि ये इतना बुरा होता तो इटली के लेखक और फुटबॉलर कार्लो पेट्रिनी 1949 में स्लो मूवमेंट नहीं चलाते। इटली में मैकडोनल्ड्स के खिलाफ शुरू हुए इस मूवमेंट में स्लो फूड से लेकर स्लो पेरेंटिंग तक की बात कही गई है। आखिर सोचें कि जीना, महसूस करना तो लाइटनिंग फास्ट नहीं हो सकता है ना? पहली बारिश में रूखी-सूखी धरती पर नन्हीं-नन्हीं बूँदों के पदचाप से उठती धूल और सौंधी खुशबू को क्या लाइटनिंग फास्ट स्पीड से देखा और महसूस किया जा सकता है... सुबह के सूरज को धरती से आसमान की तरफ हौले-हौले जाते देखने की क्रिया तो तेज नहीं हो सकती है। फूलों का खिलना, शाम का ढलना, मौसम का बदलना ये सब आहिस्ता-आहिस्ता होने वाली घटनाएँ हैं, जब प्रकृति किसी किस्म की जल्दी में नहीं है तो फिर हमें क्यों होना चाहिए? धीरे-धीरे अपने आस-पास को जानना, जीना-निहारना, जज़्ब करना न सिर्फ अपने परिवेश को जानना है बल्कि अपने अंदर बीजारोपण करने जैसा है। आखिर तो जीवन जीने के लिए है, आऩंद लेने के लिए, महसूस करने, खुश होने औऱ खुश करने के लिए है ना...। मशीन की तरह तेज गति से ना तो जीवन का आनंद लिया जा सकता है और न ही कुछ महसूस किया जा सकता है तो फिर बाबूजी धीरे चलना...

Friday, 10 December 2010

मुक्ति की चाह... किससे और क्यों...?


बेतरह उलझन और कठिन सामाजिकता निबाहने का दौर तो गुजर गया, लेकिन पता नहीं क्यों कहीं कुछ अटका पड़ा हुआ है, तभी तो कुछ बेचैनी-सी है। लगातार देर रात तक जागने और सुबह जल्दी उठ जाने के बीच आज की सुबह कुछ सुकूनभरी थी... लंबे समय के बाद सुबह की दौड़-धूप से दूर निपट तनहाई... छुट्टी की सुबह हो और ऐसा अकेलापन हो तो और मन क्या चाहेगा, जबकि उसकी शिद्दत से जरूरत भी हो...सुबह गुनगुना उनींदापन और मीठी-महकती उदासी के बीच सामाजिक जीवन को जीने के दौरान उभरे अर्थहीनता के आइसबर्ग को दूर ढकेल दिया और जरा खुद के करीब आ बैठे। पिछली कई रातों से ऐसा हो रहा है कि गहरी नींद के बीच एक शब्द ‘मुक्ति’ लगातार एक ही जैसी आहट और आवृत्ति के साथ जहन पर तब तक दस्तक देता रहता है,... जब तक कि नींद न उचट जाए... नींद उचटने के बाद सवाल – किससे मुक्ति? कैसी मुक्ति? हर बार की तरह जवाब नहीं।
दाग़ के अशआर औऱ शुमोना की आवाज के साथ... होशो हवास ताब-ओ-तवां दाग़ जा चुके/ अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया... घुलने की चाहत जागी थी। एकाएक मुक्ति की गुत्थी सुलझती हुई नजर आई थी। अपने भौतिक और अभौतिक होने से मुक्ति की माँग... घुलने... बह जाने... कुछ न होने की चाह...। भौतिक होने के अहम औऱ अभौतिक होने की कभी-कभी बोझिल हो जाती प्यास से मुक्ति... उस बोझ से मुक्ति की चाहत, जो सामाजिकता औऱ व्यक्तिगतता की वजह से खुद पर लादा हुआ-सा महसूस होता है। भौतिक के अदृश्य हो जाने और अभौतिक के घुल जाने की आकांक्षा... जागा कि ‘हम’ होने से ‘न-कुछ’ हो जाए... अपनी अनुपस्थिति में देखें दुनिया को, असंपृक्त, निर्लिप्त और निस्संग होकर... देखें कि जो दुनिया हमारे होने पर ऐसी है, वो हमारे द्वारा छोड़े खाली स्थान के साथ कैसी होगी? महसूस करें कि खुद के ‘दिखने’ और ‘होने’ से अलग खुद का होना क्या है और कैसा है? जानें कि जो अब्सर्ड हमारे होते हैं, क्या वही अब्सर्ड हमारे न होते भी होता है, हो सकता है ... महसूस करें कि अपने ‘होने’ से मुक्त होने के बाद का ‘होना’ कैसे होता होगा? अपनी भौतिकता की कभी नर्म तो कभी गर्म होती अनुभूति के बिना कैसा लगता है? और अपने अभौतिक होने के अहम के गल जाने, तरल होकर बह जाने के बाद अपना ‘होना’ कैसा होता होगा? क्या ऐसा होना हो भी पाता है, या फिर ये बस एक न-पूरी होने वाली आकांक्षा ही है... या इसका होना वैसा होता होगा, जैसे गाढ़ी नींद....! लेकिन गाढ़ी नींद तो जागने तक होने वाली मौत होती है, जिसमें कोई चेतना नहीं होती है... यहाँ मामला अपने ‘न-होने’ की चेतना के बाद दुनियावी चेतना का है... ठोस स्व के पिघलने, गलने औऱ बह जाने के बाद न-कुछ होकर दुनिया के कारोबार को देखने और महसूस करने की नामुमकिन-सी इच्छा... क्यों है ये?

Sunday, 28 November 2010

यहाँ सादगी अश्लील शब्द और भूख गैर-जरूरी मसला है


शादियों का सिलसिला शुरू हो चला है और अपनी बहुत सीमित दुनिया में भी लोग ही बसते हैं तो उनके यहाँ होने वाले शादी-ब्याह में हम भी आमंत्रित होते हैं... फिर मजबूरी ही सही, निभानी तो है...। हर बार किसी औपचारिक सामाजिक आयोजन में जाने से पहले तीखी चिढ़ के साथ सवाल उठता है कि लोग ऐसे आयोजन करते क्यों हैं? और चलो करें... लेकिन हमें क्यों बुलाते हैं? इस तरह के आयोजनों में जाने से पहले की मानसिक ऊहापोह और अलमारी के रिजर्व हिस्से से निकली कीमती साड़ी की तरह की कीमती कृत्रिमता का बोझ चाहे कुछ घंटे ही सही, सहना तो होता ही है ना... ! बड़ी मुश्किल से आती शनिवार की शाम के होम होने की खबर तो पहले सी ही थी, उस पर हुई बारिश ने शाम के बेकार हो जाने की कसक को दोगुना कर दिया। शहर के सुदूर कोने में कम-से-कम 5 एकड़ में फैले उस मैरेज गार्डन तक पहुँचने के दौरान कितनी बार खूबसूरत शाम के यूँ जाया हो जाने की हूक उठी होगी, उसका कोई हिसाब नहीं था।
उस शादी की भव्यता का अहसास बाहर ही गाड़ियों की पार्किंग के दौरान हो रही अफरातफरी से लगाया जा चुका था। गार्डन में हल्की फुहारों से नम हुई कारपेट लॉन में पैर धँस रहे थे। गार्डन का आधा ही हिस्सा यूज हो रहा था और प्रवेश-द्वार से स्टेज ऐसा दिख रहा था, जैसे बहुत दूर कोई कठपुतली का खेल चल रहा हो।
शुरूआती औपचारिकता के बाद हमने देखने-विचारने के लिए एक कुर्सी पकड़ ली थी... आते-जाते जूस, पंच और चाय का आनंद उठाते लकदक कपड़ों, गहनों में घुमते-फिरते लोगों को देखते रहे। करीब 60 फुट चौड़े स्टेज पर दुल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देने के लिए कतार में खड़े लोगों को देखकर हँसी आई थी... यही शायद एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ देने वाले कतार बनाकर खड़े हों... वो भी आशीर्वाद और बधाई जैसी अमूल्य चीज... यही दुनिया है...।
खाने में देशी-विदेशी सभी तरह के व्यंजनों के स्टॉल थे... कहीं पहुँच पाए, कहीं नहीं... पता नहीं ये थकान होती है, ऊब या फिर खाना खाने का असुविधाजनक तरीका... घर पहुँचकर जब दूध गर्म करती हूँ... हर बार सुनती हूँ कि – ‘शादियों में बैसाखीनंदन हो जाती हो...।’ बादाम का हलवा ले तो लिया, लेकिन उसकी सतह पर तैरते घी को देखकर दो चम्मच ही खाकर उसे डस्टबिन में डाल दिया... फिर अपराध बोध से भर गए... यहाँ हर कोई हमारी ही तरह हरेक नई चीज को चखने के लोभ में क्या ऐसा ही नहीं कर रहा होगा? तो क्या देश की 38 प्रतिशत आबादी की भूख केवल मीडिया की खबर है...? यहाँ देखकर तो ऐसा कतई नहीं लगता कि इस देश में भूख कोई मसला है, प्रश्न है...।
विधायक, सांसद और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ शहर के बड़े व्यापारी, उद्योगपतियों का आना-जाना चल रहा था, कीमती सूट-शेरवानी में मर्द और महँगी चौंधियाती साड़ियों और सोने-हीरे के जेवरों में सजी महिलाओं के देखकर यूँ ही एक विचार आया... कि जिस तरह नेता रैली, बंद, धरने, हड़ताल और जुलूस के माध्यम से अपना शक्ति-प्रदर्शन करते हैं, उसी तरह अमीर, शादियों में अपना शक्ति प्रदर्शन करते हैं... किसके यहाँ कौन वीआईपी गेस्ट आए... कितने स्टॉल थे, कितने लोग, मैन्यू में क्या नया और सजावट में क्या विशेष था... संक्षेप में शादी का बजट किसका कितना ज्यादा रहा... यहाँ शक्ति को संदर्भों में देखने की जरूरत है। कुल मिलाकर इस दौर में जिसके पास जो है, वो उसका प्रदर्शन करने को आतुर नजर आ रहा है, मामला चाहे सुंदर देह और चेहरे का हो, पैसे का, ताकत का या फिर बुद्धि का... यहाँ सादगी एक अश्लील शब्द, भूख-गरीबी गैर जरूरी प्रश्न है तो जाहिर है कि प्रदर्शन को एक स्थापित मूल्य होना होगा, हम लगातार असंवेदना... गैर-जिम्मेदारी और अ-मानवीयता की तरफ बढ़ रहे हैं... बस एक चुभती सिहरन दौड़ गई...।

Thursday, 25 November 2010

कुछ भी तो व्यर्थ नहीं...


कार्तिक की आखिरी शाम... आसमान पर बादलों की हल्की परतों के पीछे चाँद यूँ नजर आ रहा था, जैसे उसने भूरे-सफेद रंग का दुपट्टा डाल रखा हो... फिर हर दिन बादलों, फुहारों और बारिश के बीच निकलता रहा... अगहन में सर्दी की तरफ बढ़ते और सावन-सा आभास देते दिन... अखबार बताते हैं कि ये गुजरात में आए चक्रवात का असर है... देश में कहीं कुछ होता है तो असर हमें महसूस होता है, कभी हिमालय पर गिरी बर्फ से शहर ठिठुरने लगता है तो कभी दक्षिण में आए तूफान से यहाँ बरसात होती है। और इन सबके पीछे भी दुनिया के किसी सुदूर कोने में हुआ कोई प्राकृतिक परिवर्तन होता है, तो क्या पूरी सृष्टि... ये चर-अचर जगत किसी अदृश्य सूत्र, कोई तार... किसी तंतु... या फिर किसी तरंग से एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है? होगा ही तभी तो कहाँ क्या घटन-अघटन होता है और उसका असर कहाँ पड़ता दिखाई देता है, चाहे दिखाई दे या न दें... । ये बहुत सुक्ष्म परिवर्तन हैं और लगातार स्थूलता की तरफ बढ़ती हमारी दुनिया इन सुक्ष्म परिवर्तनों को देख तो क्या महसूस भी कर पाएगी... ? ... हम तो रोजमर्रा में हमारे आसपास होते बारीक और बड़े परिवर्तनों के प्रति ही अनजान होते हैं... या फिर उन्हें देखकर अनदेखा कर देते हैं, तो ये सृष्टि की विराटता में घटित होता है, जिसकी एक बूँद का 100 वाँ हिस्सा ही हम तक पहुँचता होगा।
कभी ये फितूर-सा रहा था कि अपने हर कर्म के अर्थ तक पहुँचें... लेकिन फिर वही... अपनी संवेदनाओं, समझ, समय और ज्ञान की सीमा आड़े आ गईं और धीरे-धीरे तेज रफ्तार जिंदगी का हिस्सा होते चले गए। फिर भूल ही गए कि यूँ हर चीज के होने का एक अर्थ है, उद्देश्य है, महत्व है, अब ये अलग बात है कि हमें वो नजर नहीं आता है।
फिर भी प्रवाह का हिस्सा होने के बाद भी जैसा बार-बार महसूस होता है, कि आकंठ डूबने के बाद भी हमारे अंदर कुछ ऐसा होता है, जो खुद को सूखा बचा लेता है.... पाता है तो वो हमें ‘वॉर्न’ करता रहता है कि दुनिया की हर चीज हम देखें ना देखें, महसूस करें ना करें हमें, हमारे जीवन, हमारे कर्म... अनुभव और आखिर में हमारे स्व को प्रभावित करता है... इस दृष्टि से हर साँस, हर घटना, अनुभूति, हर वो इंसान जो हमारे संपर्क में आता है... हमें कुछ सिखाता है... कुछ समझाता है... समृद्ध करता है, चाहे उसका होना... घटना क्षणिक क्यों न दिखता हो, उसकी प्रक्रिया बहुत लंबी और प्रभाव बहुत स्थायी होते हैं।
याद आते हैं... सिलिगुड़ी से दार्जिलिंग की यात्रा में मिले वे कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चे... तीन दिन की यात्रा की थकान... सुबह से फिर ट्रेन का सफर... खाने का सामान खत्म और तेज भूख... हर स्टेशन पर खाने जैसे ‘खाने’ की तलाश... नहीं मिलने पर निराशा ... और फिर सामने आई पराँठें-सब्जी को वो प्लेट.... कहीं कौंधा था – इस दुनिया में हमारा लेना-देना स्थायी रहता है, किसी-न-किसी रूप में फिर से हमारे सामने होता है, समय और देश की सीमा के परे... चाहे अगले-पिछले जन्म पर विश्वास न हो, लेकिन ऐसे किसी समय में महसूस होता है, कि ये जो अजनबी हैं, जिनसे हम पहले कभी नहीं मिले... शायद कभी नहीं मिलेंगे, हमारे जीवन में किसी भी रूप में आए हैं तो इसका कोई सूत्र कोई सिरा कहीं न कहीं हमसे जुड़ा है, हमारे जीवन, हमारे अनुभव या फिर हमारे भूत-भविष्य से, न मानें फिर भी अगले-पिछले जन्म से भी जुड़ा हो सकता है... ये अलग बात है कि वो हमें नजर नहीं आता है। तो कहीं कुछ भी होना बेकार नहीं होता, चाहे वो बुरा हो... वो हर अनुभव, सुख-दुख, पीड़ा, घटना, परिवेश, सपने, चाहत, ठोकरें, उपलब्धि हो या फिर कोई इंसान... जो कुछ भी सकारात्मक या नकारात्मक होता है, घटता है... हरेक चीज का एक अर्थ होता है, यदि दुख होता है तो भी और सुख होता है तो भी... हमें समझाता है, बचकर चलना, डूबकर जीना सिखाता है... समृद्ध करता है, वक्ती उत्तेजना या टूटन के बाद भी हम खुद को कदम-दो-कदम आगे की ओर पाते हैं... खासतौर पर दुख... पीड़ा... वेदना.... क्योंकि जैसा कि धर्मवीर भारती ने लिखा है
सब बन जाते पूजा गीतों की कड़ियाँ
यही पीड़ा, यह कुंठा, ये शामें, ये घड़ियाँ
इनमें से क्या है
जिसका कोई अर्थ नहीं।
कुछ भी तो व्यर्थ नहीं

Wednesday, 10 November 2010

...और सुबह हो गई


ऐसा पहली ही बार हुआ, कि पता नहीं रात के किस वक्त नींद उचट गई और बहुत कोशिश करने, मनाने के बाद भी नहीं आई तो नहीं ही आई... बहुत देर तक करवटें बदल-बदल कर उसके आने का इंतजार करते रहे, लेकिन सब बेकार.... फिर अचानक गर्दन के नीचे आई बाँह ने समेट लिया और सिर को जिंदगी के धड़कते सीने पर टिका दिया.... थपकियों का दौर शुरू हुआ तो उस अँधेरे कमरे में दूधिया हँसी बिखर गई और सिरहाने पड़े रिमोट का बटन दबते ही एक बार फिर से मेंहदी हसन की ज़हनियत कमरे में फैल गई। रात के गहरे, अँधेरे सन्नाटे को चीर कर उनकी गाढ़ी, उदास आवाज फैल गई.... मैं खयाल हूँ किसी और का मुझे चाहता कोई और है... समय तो भैरवी का नहीं था, लेकिन गज़ल उसी थाट में थीं। खैर शास्त्रीयता उतनी ही अच्छी है, जितनी हमारे आनंद में बाधा न दे, तो समय-वमय के बंधन को झटक दिया और डूब गए, उस गज़ल के आलोक में। .... मैं किसी के दस्ते-तलब में हूँ तो किसी के हर्फे दुआ में हूँ, मैं नसीब हूँ किसी और का, मुझे माँगता कोई और है.... सुनते ही सारे अहसास झर गए... अँधेरे में रात के पहरों का तो खैर कोई हिसाब रहा ही नहीं, सारी ख़लिश, चुभन, जलन और तपन कहीं गल गई, बह गई, खालिस ‘होना’ भी कहीं नहीं रहा, बस धुआँ-धुआँ सा अहसास रह गया।
एक हसरत जागी कि काश जिंदगी यूँ ही गुजर जाए... एक गज़ल... एक धड़कता दिल और थपकियाँ देती हथेली... धुआँ-धुआँ अहसास और गहरा नशा.... मूँदी आँखें और.... बस.....न आगे कुछ न पीछे.... न कमी और न ख़्वाहिश, कोई उम्मीद, कोई सपना, कोई चाहत नहीं....यही और इतना ही आनंद... गहरे जाकर खुद को छोड़ देने का नशा और उपलब्धि... उतना मुश्किल भी नहीं है, लेकिन आसान भी कहाँ है? इस एहसास को पीते रहे, जीते रहे... लेकिन न तो जिंदगी कहीं ठहरती है और न ही वक्त... हम चाहे देखें ना देखें वह बस चलता रहता है... तो अँधेरे का गाढ़ापन थोड़ा कम हुआ.... खुली खिड़की से सुबह ही सिंदूरी आभा दाखिल होने लगी और आँखों के आगे दुनिया खुल गई.... नशे पर सुनहरी सुबह छा गई.... आँगन में अख़बार के गिरने की कसैली-सी आहट के साथ रात का नशीला जादू टूट गया... सुबह हो गई।

Sunday, 7 November 2010

रात की स्याहियों के हैं गहरे संदर्भ


किसी भी हालत में सुबह जल्दी उठने का संकल्प था, तो निभाना भी था। सुबह जब साढ़े छः बजे जगाए गए तो पलकों में इतनी सारी नींद थी कि वे खुलने को भी तैयार नहीं थीं... फिर भी कभी-कभी ही ऐसी मौज आती है तो उठना ही ठहरा। जब घर से बाहर निकले तो गली में रात के जले-अधजले पटाखों में से अपने लिए खुशी के कुछ क़तरे ढूँढते गरीब बच्चे नजर आए....। फिर दिवाली के प्रसाद की माँग करते दरवाजे-दरवाजे भटकते बच्चे और उनके माता-पिता दिखे.... दिखे, क्योंकि और कुछ नजरों के सामने था ही नहीं.... सारी चकाचौंध गुल हो चुकी है। दीपावली की रात चाँद की शीतलता को चुनौती देती रंगीन चौंधियाती रोशनी थी... और अगली ही सुनहरी सुबह इतना गहन अँधेरा... रोशनी का कारवाँ गुजर गया गुब़ार बचा हुआ है... खुमार उतरा है और उतार का दौर है... उन्माद के बैठते ही रोशनी का मुलम्मा उतर चुका था और जिंदगी अपनी कालिख के साथ मौजूद नजर आईं... ये कालिख पहले भी थीं, लेकिन उन्माद में दिखाई नहीं दी या फिर देख कर भी अनदेखा कर दिया... आखिर हम रोशनी... जगमग... और चकाचौंध की तरफ ही तो देखते, दौड़ते हैं और इसी की चाहत करते हैं।
क्यों नहीं... आखिर रोशनी से हमें सब तरह की सुविधा मुहैया जो होती है, तभी तो इसका गुणगान हमें मुफीद होता है, लेकिन अँधेरा...(!) अँधेरा... मतलब असुविधा... वो सब कुछ अँधेरे में समाहित है, जो प्राकृत है, दुख, पीड़ा, वेदना, त्रास, निराशा, अभाव... जिसे हम जीवन की नकारात्मकता कहते हैं, सब कुछ अँधेरे का हिस्सा है। और जाहिर है हम इसी से बचना चाहते हैं, क्योंकि अँधेरा हमें भागने की सहूलियत नहीं देता... बिजली गुल हो जाने के बाद कितनी बेचैनी होती है... क्योंकि वो हमसे दृश्य जगत की सारी सुविधा छिन लेता है... बँटने, भागने और बचने के सारे विकल्प, सारी सुविधा हमसे ले लेता है। हमें अपने अंदर के दलदल के साथ अकेला छोड़ देता है, वो हमें अंदर-बाहर के नर्क और कीच को सहने, देखने और भोगने को मजबूर करता है, भाग पाने के सारे रास्ते बंद कर देता है इसलिए वो क्रूर है।
हम रोशनी की तरफ भागते हैं... हम भागना चाहते हैं, सहना नहीं... जरा-मरा अँधेरा हुआ नहीं कि दीपावली की तरह जगर-मगर रोशनी कर डालते हैं। अँधेरे से बचते हैं, बचना चाहते हैं, उसे ‘अवाइड’ करना चाहते हैं, क्योंकि अँधेरा पलायन के रास्ते बंद कर देता है, और पलायन हमें सुरक्षा का अहसास देता है, लेकिन अँधेरे में तो सहना ही होता है, बस....। जबकि हकीकत में अँधेरा सृष्टि का पहला और अंतिम सत्य है... सृष्टि के पहले का सच है... ये अँधकार ... हर दिन सूरज निकलने और डूबने की कवायद करता है.... अँधेरा नहीं.... क्योंकि ये कहीं जाता ही नहीं है, वो तो बस होता है.... हम चाहे या न चाहे.... सूरज बस उसे छुपा देने का ‘पराक्रम’ ही कर पाता है, उससे ज्यादा करने की उसकी कुव्वत नहीं होती है। अंतरिक्ष और गर्भ का अँधेरा क्या कुछ नहीं कहता हैं…? दरअसल सृजन का क्रम और स्रोत अँधेरा ही है ... बिना पीड़ा और दुख के किसी भी तरह का सृजन संभव नहीं है... फिर भी हम अँधेरे से डरते हैं। तो जब हम अँधेरे से भागते हैं तो इसका मतलब है कि हम दुख, तकलीफ और पीड़ा से बचना चाहते हैं और प्रकारांतर से सृजन से बचते हैं, रोशनी से बचने और भागने की कोशिश करते हैं, जबकि बिना अँधेरे को भोगे न तो हमें उजाले का मतलब समझ में आएगा और न ही उसकी कद्र ही होगी... ठीक वैसे ही जैसे बिना भूख तृप्ति का मतलब समझ नहीं आता....।

Saturday, 30 October 2010

उमंग है तो अवसाद भी होगा


हर तरफ सफाई का दौर चल रहा है... सोचा थोड़ा अपने अंदर के जंक का भी कुछ करे, लेकिन बड़ी मुश्किल पेश आई... सामान हो तो छाँट कर अलग कर दें, लेकिन विचारों का क्या करें? कई सारे टहलते रहते हैं, किसी एक को पकड़ कर झाड़े-पोंछे तो दूसरा आ खड़ा होता है और इतनी जल्दी मचाता है कि पहले को छोड़ना पड़ता है... दूसरे को चमकाने की कवायद शुरू करें तो पहला निकल भागता है, उसके निकल भागने का अफसोस कर रहे होते हैं तो जो हाथ में होता है, उसके निकल जाने की भी सूरत निकल आती है... बस यही क्रम लगातार चल रहा है।... कुल मिलाकर बेचैनी...। अंदर-बाहर उत्सव का माहौल है, लेकिन कहीं गहरे... उमंग और उदासी के बीच छुपाछाई का खेल चल रहा है। आजकल संगीत का नशा रहता है... और इन दिनों एक ही सीडी स्थाई तौर पर बज रही है... मेंहदी हसन की... तो ‘बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी’ गज़ल चल रही थी और उसका अंतरा – उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू... के जादू को वो विस्तार दे रहे थे और उस विस्तार से उदासी का मीठा-मखमली जादू फैलता-गहराता जा रहा था।
मन की प्रकृति भी अजीब है, कल जिस बात को मान लिया था, आज उसी से विद्रोह कर बैठता है। ओशो के उद्धरण से समझा लिया था कि जिस तरह के प्रकृति के दूसरे कार्य-व्यापार का कोई उद्देश्य नहीं है, उसी तरह जीवन का भी कोई उद्देश्य नहीं है... लेकिन उस मीठी-मखमली उदासी के समंदर से जब बाहर आए तो जीवन के निरूद्देश्य और अर्थहीन होने का नमक हमारे साथ लौटा... अब फिर से वही कश्मकश है, यदि जीवन है तो फिर उसका कोई अर्थ तो होना ही है और यदि नहीं है तो फिर जीवन क्यों है? और इसी से उपजता है एक भयंकर सवाल... मृत्यु... ?
एक बार फिर चेतना इसके आसपास केंद्रीत होने लगी है... जब एक दिन मर जाना है तो फिर कुछ भी करने का हासिल क्या है? मरने के बाद क्या बचा रहेगा... जो भी बचेगा, उसका हमारे लिए क्या मतलब होगा? औऱ जब मतलब नहीं है तो फिर कुछ भी क्यों करें... ? हाँलाकि सच ये भी है कि कर्म करना हमारी मजबूरी है।
वही पुराने सवाल, जिनका कोई जवाब नहीं है... बेमौका है... उत्सव के बीच है ... खत्म होने से पहले ही अवसाद... यही धूप-छाँव है... यही अँधेरा-उजाला.... सुख-दुख... यही जीवन-मृत्यु... तो फिर उमंग-अवसाद भी सही...। आखिरकार तो नितांत विरोधी दिखती भावनाएँ... कहीं-न-कहीं एक दूसरे से गहरे जुड़ी हुई जो होती है.... नहीं...!

आखिर में – 100 पोस्ट पूरी होने पर वादे के मुताबिक मिला डिजिटल कैमरा, लेकिन त्योहार और व्यस्तता के बीच कहीं आना-जाना नहीं हो पा रहा है तो फोटो लेने की सूरत भी नहीं निकल पा रही है...

Saturday, 23 October 2010

ब्लॉग-शतक पूरा



ये ब्लॉग का 100 वाँ पीस है। एक साल 11 महीने और ठीक 2 दिन पहले शुरू किए ब्लॉग अस्तित्व की ये प्रगति कोई बहुत उत्साहजनक नहीं है, आखिर अब तक मात्र 100 पीस ही तो लिखे हैं। कहाँ तो सोचा था कि इसे नियमित लिखेंगे और कहाँ बहुत-बहुत दिनों तक इसमें कुछ पोस्ट ही नहीं हो पाता है। कारण साफ है, जब खुद को उलीच कर कुछ लाना होता है तो जो बाहर आता है, वो तो खदानों से निकले कच्चे हीरे की तरह होता है। फिर हम हीरा बनने की उस प्रक्रिया और समय से तो अनजान ही रहते हैं, लेकिन है तो वो निर्मिति का ही हिस्सा... उसे चमक और कीमत देने का परिश्रम और समय भी तो उसी में जुड़ता है, तो कच्चे हीरे को आकार और शक्ल देने में लगने वाला समय भी तो शामिल था। लब्बोलुआब यूँ है कि जब तक विचार पैदा हो और उसका प्रेशर इतना हो कि उसका बाहर आना किसी भी तरह रोका नहीं जा सके तभी लिखे जाने की सूरत बनती थी।
वैसे ब्लॉग शुरू करने के पीछे लक्ष्य सिर्फ हर दिन होने वाली घटनाओं को लेकर पैदा होने वाली उबलन को शब्द और आकार देना रहा था। शुरुआती कुछ पीस लिखने के बाद ही ये अहसास हो गया कि आमतौर पर ब्लॉग रायटर्स यही कर रहे हैं, फिर यहाँ तो समय और मन दोनों को साधने का दुःसाध्य कर्म करना भी आ जुड़ता था। और इस दौरान उस विषय पर इतना ज्यादा लिखा जा चुका होता था कि फिर अलग से कुछ और लिखने के लिए कुछ बचता ही नहीं था। तो फिर अस्तित्व को अपनी डायरी का रूप दे डाला। इसमें कहानी, कविता (जो कि मेरा माध्यम नहीं है, फिर भी), यात्रा संस्मरण सब कुछ को शामिल कर लिया। फिर पता नहीं कहाँ, कैसे इसका स्वर भीतर की ओर मुड़ गया। खैर ब्लॉग लिखने का उद्देश्य शुरुआती कुछ भी रहा हो, लेकिन लिखते-लिखते महसूस हुआ कि भीतर की तरफ जाते हुए इस लिखने का मतलब खुद के ज्यादा करीब जाना, खुद को जानना, समझना और अपने ‘भीतर’ को शक्ल देना रहा, इसलिए भी संख्या पर विचार क्यों किया जाए... लेकिन कुछ भी गणित से इतर कहीं हो पाया है?
तो आखिर शतक तक का सफर ऊबड़-खाबड़ तो कभी साफ-शफ़्फ़ाफ रास्तों से होता हुआ पूरा हो गया। इस सारे समय में कुछ और हुआ हो या न हुआ हो, अंदर की उलझनों को सुलझाने की स्थितियाँ तो बनी ही है, बेचैनी ने रास्ता पाया, छटपटाहट ने आकार... कहीं-कहीं तो इस बेचैनी का कारण भी हाथ आया... अब इस सारी प्रक्रिया में थोड़ी-बहुत तकलीफ और त्रास तो होना ही हुआ, लेकिन ज्यादातर तो ये खुद के नए सिरे से बनने का ही हिस्सा रहा। यूँ कहें कि लिखने से पहले ये जाना ही नहीं था कि – हम जान ही नहीं सकते हैं कि खुद को कह लेने में जितना हम देते हैं, उससे कहीं ज्यादा हम पाते हैं।
वैसे लिखना व्यावसायिक मजबूरी है, इसलिए सिलसिला तो बहुत दिनों से चल रहा था, लेकिन इस क्रम में दुनियावी मसले ही शामिल थे। अपने बीहड़ की तरफ ले जाते रास्ते से हमेशा कतरा कर निकलते रहे... इसलिए असल में व्यक्त होना कितना भरता और कितना खाली करता है, इस अनुभव से वंचित ही रहे, लेकिन जब व्यक्त होने का लक्ष्य लेकर चले तो खुद को पाते, सुलझाते, जानते, सहेजते, सहलाते और चकित होते चले गए। एक बार इस बीहड़ में उतरने का हौसला दिखाया तो धीरे-धीरे खज़ाने का रास्ता निकलता गया। अब कुछ पाना है तो मुश्किल भी होगी, दुख भी, असुविधा और त्रास भी होगा, पसीना और खून दोनों ही बहेगा... लेकिन जो मिलेगा, उसका सुख कहीं ज्यादा होगा। तो सफर कहाँ रूकेगा, इसका फिलहाल तो कोई अनुमान नहीं है। अपनी कश्ती को अपने ही समंदर में छोड़ दिया है... बस इस उम्मीद में कि कभी तो कोई मोती हाथ लगेगा.... आमीन....!

Sunday, 17 October 2010

चाँद गर धरती पे उतरा, देखकर डर जाओगे


हर बार मोबाइल के प्लेलिस्ट में गज़ल को शफल करते हुए दो-चार गज़लों के बाद या तो चुपके-चुपके रात दिन या फिर ये दिल ये पागल दिल मेरा बजने लगती... फिर से अपनी पसंद की गज़ल ढूँढते रहते, आखिर उस दिन म्यूजिक फॉर्मेट करने के दौरान इन दोनों गज़लों को डिलीट मार ही दिया। हाँलाकि हर बार इस बात के लिए डाँट पड़ती है कि – ये क्या बचपना है? खेल बना लिया है म्यूज़िक फॉर्मेट करने को... जितना डालती हो, सुन भी पाती हो... ? यूँ बात तो सही ही है, लेकिन क्या करें कि कम से काम चलता नहीं है!
शहद-शरद रात और अगले दिन की छुट्टी हो तो फिर रात को देर तक जिए जाने के लालच में दूर तक चले जा रहे थे। रात बहुत हो चुकी थी, ये वही सड़कें थीं जो दिन में बिल्कुल दूसरी होती है... शायद ये खुद भी अपने को पहचान नहीं पाती हो...। दिन में जो सड़कें बेहाल-परेशान होती है, वो ही रात को थोड़ी उदास, खूबसूरत और सौम्य हो जाती है, तो घूमने का मजा दोगुना हो जाता है। यूँ लगता है कि वो हमारा ही इंतजार कर रही है। दूर से कहीं से फिर से वही गज़ल ये दिल ये पागल दिल मेरा... उस वक्त अंतरा चल रहा था – एक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबब, सेहरा की भीगी रेत पर मैंने लिखा आवारगी... वहीं रूक गए, सरे राह डूबने-डूबने का सामान मिल गया। तो फिर उसे डिलीट क्यों किया था?
अबकी स्मृति की दराज़ खुल गई और बहुत सारी बेतरतीब चीज़ों के बीच अचानक से एक नामालूम-सी फिल्म का डायलॉग याद आ गया कि – सपने जब तक दिमाग में रहते हैं, तभी तक खूबसूरत होते हैं, हाथों में आते ही वे खत्म हो जाते हैं...।
इसका इंटरप्रिटेशन तो यूँ है कि सब कुछ जो आप चाहते हैं, यदि वो हासिल हो जाए तो फिर क्या जीना आसान हो जाता है। नहीं... सरासर नहीं... तब तो शायद जीना और भी मुश्किल हो जाता है, तो फिर... अभाव ही जिंदगी को पूरा करते हैं। यदि आप किसी चीज़ को शिद्दत से पसंद करते हैं तो फिर उससे दूरी बना कर ही खुश रहा जा सकता है। कई बार उसकी दूरी ही सब कुछ को खूबसूरत बनाती है फिर से एक शेर याद आया –
हर हँसी मंज़र से यारों फ़ासले क़ायम रखो
चाँद गर धरती पे उतरा देखकर डर जाओगे...
क्या ग़लत है?
यूँ तो बात यहाँ ख़त्म हुई, लेकिन चलते-चलते मौसम की बात – कई बार कुछ बदमाशियाँ बड़ी मीठी लगती है, अब देखिए ना क्वाँर की विदाई इस तरह बादलों की शरारत से हो तो क्या मीठा नहीं लगेगा... दशहरे की शुभकामना के साथ...

Sunday, 10 October 2010

जीवन के प्रवाह की रूकावट है लक्ष्य...!



महाकाल उत्सव के दौरान सोनल मानसिंह के ओड़िसी नृत्य का कार्यक्रम होना था और उसे देखने के लिए छुट्टी माँगी तो सुझाव आया कि -क्यों न कार्यक्रम की रिपोर्टिंग भी आप ही कर लें...!
पत्रकारिता के शुरुआती दिन थे, बाय लाइन का लालच और ग्लैमर दोनों ही था... डेस्क पर काम करने वालों को तो बाय लाइन का यूँ भी चांस नहीं था, तो उत्साह में हाँ कर दी। सावन के महीने में हर सोमवार को शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महफिल की दावत महाकाल के दरबार में हुआ करती है। उज्जैन किसी जमाने में ग्वालियर रियासत का हिस्सा रहा, जहाँ सिंधियाओं ने शासन किया तो उत्तर वालों और दक्षिण वालों के महीने के हिसाब से यहाँ 30 दिन का सावन 45 दिन का हो जाता है (यूँ तो हर महीना ही)। तो कम-से-कम 6 सोमवार की दोहरी दावत...। बारिश होने के बीच भी समय पर पहुँच गए। ज्यादा लोग नहीं थे, अब शास्त्रीय नृत्य का कार्यक्रम था, लोग ज्यादा होंगे भी कैसे? कार्यक्रम शुरू हुआ तो सारी चेतना संचालक के बोलने पर ठहर गई, आखिर रिपोर्टिंग करनी है तो संगतकारों के नाम, प्रस्तुति का क्रम, ताल, राग सबका ही तो ध्यान रखना है... इसके साथ ही आस-पास पर भी नजर बनाए रखनी है, कोई उल्लेखनीय घटना... कहीं कुछ छूट नहीं जाए...तथ्य... तथ्य... और तथ्य...। दो घंटे लगभग बैठने के बाद भी डूबने का संयोग नहीं बन पाया, फिर बार-बार ध्यान घड़ी की तरफ... रिपोर्ट फाइल करने का समय, रिपोर्ट पहले एडिशन से जो जानी है। आखिर आधा कार्यक्रम छोड़कर ही उठना पड़ा...। जैसे गए थे, वैसे ही सूखे-साखे लौट आए। रिपोर्ट फाइल की... और सब खत्म...।
उसके बाद कई मौके आए रिपोर्टिंग के, लेकिन तौबा कर ली... आनंद और तथ्य दोनों साथ-साथ नहीं साध सकते... जो कर सकते हो, वे करें, यहाँ तो नहीं होने वाला। तब जाना कि जहाँ तथ्य हैं, वहाँ आनंद नहीं, वहाँ डूबना भी संभव नहीं है। ठीक जिंदगी की तरह... ये आज इसलिए याद आ रहा है कि एकाएक एक पत्रिका में ओशो को पढ़ा कि – ‘जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है, जिस तरह नदी और हवा के बहने, फूलों के खिलने, सुबह-शाम होने, चाँद-सूरज के निकलने, डूबने, छिप जाने, बादलों के आने-जाने-बरसने के साथ ही दूसरे जीवों के जीवन का भी अपना कोई लक्ष्य नहीं है, उसी तरह इंसान के जीवन का भी अपना कोई लक्ष्य नहीं है।’
ठीक है कहा जा सकता है कि इंसान इन सबसे अलग है, क्योंकि उसके पास दिमाग है, इसलिए उसके जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। लेकिन जरा ठहरें... और सोचें... क्या लक्ष्य जीवन के प्रवाह की रूकावट नहीं है। अपने जीवन को एक विशेष दिशा की तरफ ले जाना, उस प्रवाह को प्रभावित करना नहीं है? नहीं इसका ये कतई मतलब नहीं है कि हम कुछ भी नहीं करें... कुछ करने से तो निजात ही नहीं है, करने के लिए अभिशप्त जो ठहरे, लेकिन हम जो कुछ भी करें, उसे डूबकर, आनंद के साथ, शिद्दत से करें... क्षण को जिएँ... ठीक वैसे ही जैसे बिरजू महाराज के कथक को देखा... बिना ये जानें कि ताल क्या थी, संगतकार कौन थे, प्रस्तुति का क्रम क्या था और तोड़े कौन-से सुनाए... क्योंकि आनंद तो इसके बिना ही है, डूबना तो तभी हो सकता है ना, जब कोई सहारा न हो...। कुल मिलाकर यहाँ गीता अपने कर्म के सिद्धांत में खुलती है, हमने तो अभी तक कर्म के सिद्धांत को ऐसे ही जाना है, जो करें, इतनी शिद्दत से करें कि करना ही लक्ष्य हो जाए... मतलब फल की चिंता तक पहुँच ही न पाएँ, भविष्य का बोध ही गुम जाए... बस आज, अभी जो कर रहे हैं, वही रहे...।
इस विचार का एक सिरा फिर से एक प्रश्न से टकराता है – कला जीवन के लिए है या जीवन कला के लिए...? इस पर विचार करना बाकी है...!

Sunday, 3 October 2010

फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए...


ज्यादातर तो दिल के पास ही रहती है पासबान-ए-अक्ल, लेकिन जब तनहा रह जाता है दिल तो पूछिए नहीं क्या कयामत आती है। मुक्त है मन और हम भी, हवा के प्रवाह की सवारी है और कण-कण खिरते और जाया होते जाने की चेतना भी, फिर से वही खींचतान... होने और होना चाहने की...। दिन-रात सब कुछ हवा पर सवार है, कब आते हैं और कब निकल जाते हैं, कुछ निशान ही नजर नहीं आते हैं। सब कुछ अपनी गति और जरूरत से हो रहा है, लेकिन कहीं कोई असंगति है, तभी तो कुछ भी पहुँच नहीं पा रहा है, वहाँ, जहाँ इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। शहद-शहद शरद की रातें पसरी पड़ी है, लेकिन ना जाने क्यों बार-बार क्वांर की तपन की हूक उठती है, यदि ये बाहर है तो अंतर कैसे अलग रह सकता है....! लेकिन ये आँच अंदर पहुँच नहीं पा रही है। पढ़ना, सुनना और जानना सब कुछ तो हो रहा है, लेकिन गुनना नहीं हो पा रहा है। विचार आते नहीं, आते तो ठहरते नहीं और ठहरते हैं तो पकते नहीं... कई बार अंबार होता है, लेकिन वो भी बेकार ही लगता है... अब कच्चे-कच्चेपन में क्या तो स्वाद होगा और क्या गंध...! तो उसे वहीं छोड़ देते हैं, घुम-फिरकर वहीं-वही..... बेचैनी है... सब कुछ तो है, लेकिन जो जगह बरसों तक छटपटाहट के कब्जे में रही उसके मुक्त होने से सबकुछ उलट-पुलट हो गया है, खालीपन उतर कर पसर गया... हर कहीं। आखिर मुक्ति को सह पाना भी आसान तो नहीं ही हैं ना! खुद को कई दफा उलीच लिया, कुछ मिलता ही नहीं है, बस हाथ आती है बेचैनी और डर.... दोनों का एक ही-सा सुर है। कहीं खत्म तो नहीं हो रहे हैं....चुक तो नहीं रहे हैं...? क्या वो समय आ गया है, जहाँ सवाल खत्म होने लगे हैं, सब कुछ को उसी तरह से स्वीकार कर रहे हैं, जैसाकि वो है? आखिर तो इतना सब करते हुए भी क्यों इस तरह का सन्नाटा है... क्यों इतनी खामोशी है....? संतुष्ट हैं और इस संतुष्टि से घबराहट है... क्यों है ये? खुद को हमेशा ही इस बेचैनी और छटपटाहट से आयडेंटिफाई किया है, तो ऐसा लगता है, जैसे आयडेंटिटी क्रायसिस की स्थिति में पहुँच गए हैं।
फिर से – रास आया नहीं तस्कीन का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए....

Wednesday, 15 September 2010

अध्यात्म... मतलब घर लौटना...!



फूलते काँस देखकर धक से रह गए... अभी तक बारिश का फेयरवेल तो हुआ नहीं, तो फिर प्रकृति ऐसे कैसे शरद का संकेत दे सकती है? लेकिन भूल गए कि प्रकृति को किसी नियम, अनुशासन, तर्क और अनुभवों में बाँधा नहीं जा सकता है, या तो ऐसा है कि उसका अपना अनुशासन है, जिस तक हमारी पहुँच नहीं है या फिर यूँ कहा जा सकता है कि वो हर नियम और अनुशासन से मुक्त है, स्वतंत्र औऱ स्वछंद है... यही सोचते हुए दफ्तर पहुँचे, पार्किंग से बिल्डिंग तक पहुँचते हुए ही महसूस हो गया कि चाहे भादौ चल रहा है, लेकिन क्वांर की आँच पहुँचने लगी है, हिरण तक को काला कर देने वाली धूप का सिलसिला शुरू होने वाला है और ये महज उसकी आहट है।
पहुँचते ही रिसेप्शन से सूचना मिली कि बुक स्टॉल से आपके लिए फोन था, आपने जो मँगवाया है, वो आ गया है।
ठीक है...
राजेश कई बार कह चुके हैं कि तुम्हें जो भी मैग्जिन पढ़नी है, वो तुम सब्सक्राइब क्यों नहीं कर लेती, बेकार में ऑफ रूट जाकर खरीदती हो... समय बर्बाद होता है। लेकिन पता नहीं क्या ऐसा है जो मुझे उस पर अमल करने से रोकता है। लौटते हुए बुक स्टॉल पर कई तरह की पत्रिकाएँ खरीदी... फिर नजर चली गई ओशो टाइम्स पर... ये भी दे दें। हर बार तो नहीं खरीदती हूँ, लेकिन कुछ चार-पाँच महीनों के बाद फिर इसे पढ़ने का मन हुआ।
इन पिछले महीनों में अखबारों के अतिरिक्त तथ्य, तर्क, न्यूज और व्यूव्ज, फिक्शन और रिसर्च, कहानी, कविता, ब्लॉग, अनूदित और ओरिजनल हर विधा को पढ़ने का क्रम चल रहा है, फिर भी लगता है कि कुछ ऐसा है जो छूटा हुआ है। लगातार विचार, तथ्य, तर्क और सूचनाएँ जमा करते-करते ऊब होने लगी थी, कुछ टेस्ट चेंज होना चाहिए... शायद यही वजह हो कि एक बार फिर ओशो टाइम्स... ऐसा हर बार थोड़े अनियत अंतराल से होता आ रहा है। आज जब इसके कारण ढूँढने बैठी तो स्मृतियों के साथ ही ‘भूत’ हुए एहसासों को भी खंगाला और पाया कि यायावरी अच्छी तो लगती है, लेकिन घर आखिरकार घर होता है। देश-विदेश घुमो, पहाड़, समुद्र, जंगल, खंडहर, इमारत, सड़कें, मॉल देखो लेकिन आखिरकार घर लौटने का जो अहसास है, वो इन सबसे अलग है, बहुत उत्साहित करने वाला, ऊष्मा और अपनेपन से भरा...। दुनिया भर की खूबसूरती एक तरफ और अपना घर एक तरफ...। यूँ ही तो नहीं कहा गया है कि अपना घर कैसा भी हो स्वर्ग होता है... सुरक्षित... ऊष्मा से भरपूर, सुविधाजनक और अपनेपन से लबरेज़... मतलब...! मतलब कि अध्यात्म को पढ़ना ठीक वैसा ही है, जैसे खूब सारी यायावरी के बाद अपने घर लौटना... अपने पहचाने परिवेश, अपनी दुनिया, अपने व्यक्तिगत सुख, शांति, सुविधा, सुरक्षा, गर्माहट और अपनेपन के दायरे में आ जाना... जानने के लिए घुमना जरूरी है तो मनन के लिए घर लौटना भी तो जरूरी है। अपने अंदर के महीन तंतुओं, रेशों... को देखना, समझना, सहलाना... पहचानना भी तो जरूरी है। वो सब जो प्रकृतितः इंसानों को हासिल है, लेकिन जिसे दुनिया की दौड़-भाग ने छीन लिया है, उस तक पहुँचना सुकून देता है, ठीक वैसे ही, जैसे लंबे सफ़र से घर लौटकर मिलता है... नहीं!

Sunday, 5 September 2010

कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण और मौला, मौला, मौला, मेरे मौला


10-12 दिन लंबे चले तनाव के खत्म होने के अगले ही दिन इत्तफाक से कृष्ण जन्माष्टमी की छुट्टी पड़ी, अब अखबार वालों को तो छुट्टी होती नहीं, लेकिन उस तनाव के दौरान की गई भाग-दौड़ के बाद शरीर को तो कम, मन को आराम की तलब ज्यादा महसूस हुई, फिर घर में तो छुट्टी थी ही, सो एक छुट्टी और...। सुबह नींद खुली तो आसपास का बिखरापन, बेतरतीबी नजर आई... सोचा छुट्टी का सदुपयोग किया जाए और लग गए... उसी बिखरेपन से मिली एक नायाब कैसेट... अवसर के अनुकूल वृंदावन... जन्माष्टमी, जसराज जी, वृंदावन और कृष्ण.... कैसेट चल रही थी थोड़ी देर बस ‘होने’ का मन करने लगा, सो काम बीच में छोड़कर आँखें मूँद ली। फिर काफी सारा काम समेट लिया गया था। कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण भोर ही मुख बोलो...कृष्ण, कृष्ण बोलो...। बहुत सारे साल वैष्णवी असहिष्णुता से चिढ़ की वजह से कृष्ण से भी अनबन रही, लेकिन समझदारी की दहलीज पर पहुँचते-पहुँचते जब कृष्ण के चरित्र को बहुत थोड़ा जाना तो उसकी दिव्यता और साधारणता दोनों ने ही आकर्षित किया... लगा कि ये क्षुद्रताएँ तो हमारी हैं, यदि कृष्ण हुए तो वे तो उन सबसे परे हैं... उनका हिंदू धर्म या फिर वैष्णव सम्प्रदाय से सूत भर भी नाता नहीं है, जयवंती तोड़ी का आखिरी हिस्सा कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण का जाप शुरू हो गया था... विज्ञान क्या कहता है पता नहीं, लेकिन आँखें मूँदे हुए महसूस हुआ कि शायद हमारी आत्मा ब्रह्म के गुरुत्वाकर्षण का शिकार हो गई है... तर्क और भावना से अलग, दिखाई देने वाली दुनिया से दूर कहीं ओर हैं और शायद हम हैं ही नहीं... राँझा, राँझा करती आपे राँझा होई... पहली बार हीर के इन शब्दों को परखा.... शायद यही वो पराकाष्ठा है, जिसे हीर ने पाया, वो उसे बनाए रख पाई, हम दुनियादार हैं, तो खट से अलग हो जाएँगें, लेकिन अभी है।
दोपहर के खाने के बाद किसी चैनल पर म्यूजिक का कोई प्रोग्राम देख रहे थे। एक लड़की गा रही थी... मौला, मौला, मौला मेरे मौला... दरारें-दरारें है माथे पे मौला, मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला... मेरे मौला.... दलेर मेंहदी जो जज थे उठ कर आए और तान मिलाई... फिर से मौला, मौला, मौला का वैसा ही जाप... फिर से वही अनुभव...।
लगा नहीं कि मौला और कृष्ण के जाप का कोई अलग-अलग असर होता होगा...? कोई भी जाप करो... असर एक-सा ही होता है, तो फिर ये जो झगड़े हैं, वो क्या हैं? नहीं ये सहिष्णुता का गान नहीं है, ये महज एक जिज्ञासा है... क्या ये असर संगीत का है? इसका जवाब धर्म के पास तो खैर है ही नहीं... जवाब या तो अध्यात्म दे सकता है या फिर विज्ञान...।

Thursday, 26 August 2010

जीवन की संजीवनी, छोटी-सी खुशी


हर बार ये निर्भरता अखरती थी, लेकिन बहुत ज्यादा असुविधा नहीं होने पर इसे नजरअंदाज कर दिया जाता रहा। यूँ कह लें एडजस्टमेंट करने की बजाए निर्भरता को चुन लिया था। कहीं आना-जाना हो तो ड्रायवर के भरोसे... ड्रायवर भी कर्तव्य परायण... बीमारी, समस्या और त्योहारों की एकाध छुट्टी के अतिरिक्त छुट्टी लेता नहीं, इसलिए भी गाड़ी सीखने के बारे में सोचा तो कई बार लेकिन हर बार तमाम तरह के बहाने बनाकर इस विचार को खारिज कर दिया। कभी ये सोचकर कि कहाँ जाकर सीखेंगे, कभी दोस्तों ने सुझाव दिया कि ड्रायवर ही सीखा देगा (अब चूँकि वो तो हर दिन ही आता है, इसलिए उससे तो कभी भी सीख ही लेंगे), समय कैसे मैनेज करेंगे, जरूरत क्या है, इस शहर में गाड़ी चलाना यूँ भी जोखिम भरा है, जब तक पीछे की सीट पर बैठो तभी तक आनंद है, ड्रायविंग कोई बहुत आनंददायक चीज नहीं है... आदि-आदि... तो लब्बोलुआब यूँ कि ड्रायविंग सीखने को टालते रहे। ड्रायवर कई बार गाड़ी सीखने के लिए कह चुका है... सिखाने की बात पर भी उसने हाँ कर दी, लेकिन समय तो आपको ही निकालना पड़ेगा... पुछल्ला जोड़ा ... अब यही तो गड़बड़ है... समय की ही तो किल्लत है (क्यों नहीं... ओबामा, मनमोहनसिंह, सोनिया गाँधी, अमिताभ बच्चन, शाहरूख खान, मुकेश-अनिल अंबानी और रतन टाटा के बाद हमारा ही तो नंबर है मसरूफ़ियत में...!)।
फिर एक दिन ड्रायवर ने डरते-डरते खुद ही पूछा – आपके ऑफिस के पीछे है एक कार ड्रायविंग स्कूल, क्या मैं उससे बात कर आऊँ?
सोचा चलो, शायद यही निमित्त हो और हाँ कर दी। शाम को पूरी तफ्सील के साथ वो हाजिर था। तो अगले ही दिन से सीखने का क्रम शुरू हुआ। पहले ही दिन स्टेयरिंग के कॉम्प्लीकेशन से मूड उखड़ गया... तीन दिन मन मार कर गए तो लगा कुछ-कुछ पकड़ा है, उसने चौथे दिन गियर, क्लच और एक्सीलरेटर सभी थमा दिए... भगवान एक साथ चार-चार चीजें कैसे संभाली जाएगी...? साथ में हिदायत ये भी कि सामने की तरफ तो ध्यान रखना ही है, पीछे से और दोनों तरफ से आती गाड़ियों का भी ध्यान रखना पड़ेगा... अरे... दो ही आँखें हैं और वो भी सामने की ओर... इतना सारा कैसे ध्यान रखेंगे? हर सुबह खुद को ठेलठाल कर ड्रायवर की सीट पर बैठाते और जैसे ही उतरते तो यूँ लगता जैसे नर्क से बाहर आ गए हैं... अभी तो ब्रेक का किस्सा बाकी था। हफ्ते भर बाद उसने ब्रेक भी थमा दिया, एक और का इजाफा... सुनसान में तो गाड़ी दौड़ा लो, लेकिन जरा भी भीड़ नजर आई कि हाथ-पैर फूलने लगते, वो जब ब्रेक लगाने को कहता, गाड़ी रूकती औऱ बंद हो जाती .... फिर वही कवायद... लेकिन पहले गियर में एक्सीलरेटर दबाओ तो गाड़ी बंद... फिर घबराहट। हर दिन सिखाने वाला ड्रायवर से पूछता, प्रेक्टिस कराई?
तो धीरे-धीरे गाड़ी चलाना शुरू किया। ड्रायवर हिदायत देता जाता और हम उस पर अमल करते जाते... यहाँ एक अच्छी बात है कि यदि सीखना हो तो पूरी तरह से जिज्ञासु विद्यार्थी हो जाते हैं, तो गाड़ी चलाते जाते और ड्रायवर से पूछते जाते...। उस दिन बिना ड्रायवर की हिदायत के चौथे गियर में गाड़ी चला रहे थे और ब्रेक लगाने की जरूरत लगी तो तुरंत ब्रेक ठोंका, गाड़ी पहले गियर में डाली और आगे बढ़ा ली... आश्चर्य गाड़ी बंद नहीं हुई... खुशी इतनी कि हमारे साथ-साथ गाड़ी भी लहराई... इतना सारा लिखने के पीछे का सबक बड़ा अहम है कि इस बेहद मामूली-सी उपलब्धि ने खुशी का अहसास कराया ... और इस अहसास को हमने दर्ज भी किया (क्योंकि ये अहसास होता तो रहा ही है, लेकिन कभी उस तरह से पकड़ा नहीं) कि पाना दरअसल हमेशा कुछ बड़ा, भौतिक, सार्वजनिक या ऐसा नहीं होता है, जिससे रातों-रात जिंदगी बदल जाती है, फिर ऐसा हर दिन नहीं होता है, हर दिन पाने का एहसास छोटी-छोटी चीजों से होता है। छोटा-छोटा कुछ सीखना, छोटी-मोटी खुशियाँ बस इतना ही पाना है और यही है खुशी... शायद यही जीवन के लिए संजीवनी भी है।
बहुत दिनों पहले उठे सवाल कि ‘पाना क्या है?’ का लगे हाथों जवाब भी मिला... हर वो चीज जो आपमें कुछ ‘एड’ करती हो, पाना है। ये आपके हाथ से बनी स्वादिष्ट दाल से लेकर कोई अच्छी लिखी कहानी तक, किचन में किए गए नए प्रयोग के सफल होने से लेकर किसी नए और खूबसूरत विचार के पैदा होने तक, किसी अच्छी किताब को पढ़ने से लेकर गाड़ी चलाना सीख लेने तक, किसी दोस्त की परेशानी में उसे राहत देने वाली राय देने से लेकर दुनिया के किसी कोने में पैदा हुए किसी विचार को महज जान लेने तक... या फिर किसी खूबसूरत बंदिश को सुनने और किसी सरल से गाने को ठीकठाक सुर के साथ गा लेने जैसी बेहद मामूली और छोटी-छोटी चीजें पाने के दायरे में आती है, तो फिर जीवंतता के साथ जीने के लिए हर दिन कुछ छोटा-छोटा सीख कर जीवन को सरस करने का नुस्खा मजेदार नहीं है...?

Monday, 16 August 2010

छोड़ो कल की बातें...


स्वतंत्रता दिवस का हैंग ओवर उतर चुका है... हम फिर से वही हो गए हैं और इस बात से बहुत राहत हुई है। क्योंकि अभिनय... आखिर अभिनय ही हो है... चाहे वह कृत्रिम रूप पैदा हुई भावनाएँ ही क्यों न हो...? तो एक बार फिर अपने खालिस रूप में आ खड़े हुए हैं, वैसे ही निस्संग, उदासीन और आत्म-केंद्रीत... यही तो हैं हम... वो तो एक उबाल था... उस दौरान एक तो बारिश नहीं हो रही है, उस पर दो दिन से लगातार देशभक्ति की बातें, गाने और इतिहास के गौरव-गान को सुन-सुनकर पकने लगे थे। हर साल इन दो और गणतंत्र दिवस के दो दिन यही सब कुछ चलता है… कभी कोई खिलाड़ी किसी खेल में विदेश में जाकर देश का झंडा गाड़ आता है, तब भी भावनाओं का ऐसा ही उबाल देखने में आता है। कारगिल युद्ध के समय भी ऐसा ही कुछ हुआ था। 62, 65 और 71 के युद्धों में भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा... कभी-कभी आज पर भी बातें हो जाती है, बाजार झंडों, बैनरों और तीन रंग के कपड़ों से पटा पड़ा है, राजनेता इसका उपयोग घोषणा करने और जनता पर उनके द्वारा (!) किए गए एहसानों का हिसाब दिखाने में करते हैं... अब तो इस कवायद में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, मॉल और शो-रूम भी कूद पड़े हैं... लगे हैं सारे 64 साल पहले मिली आज़ादी को आज भुनाने में... आज़ादी पर छूट के विज्ञापन दे रहे हैं, अखबारों के पन्ने काले हो रहे हैं, आज़ाद देश की उपलब्धियों और चुनौतियों के साथ इतिहास पर से धूल साफ करने में ... टीवी चैनलों के पास तो दिखाने की सीमा ही नहीं है, सेना का जीवन, विदेशों में भारतीयों द्वारा मनाए जा रहे आज़ादी के जश्न को दिखाने में... सेलिब्रिटी के लिए आज़ादी का मतलब (होता सब प्रायोजित है, लेकिन...) और स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास तो खैर है कि कबाड़े में कि जब चाहो तब धूल साफ कर चमकाओ और फिर दिखा दो... इन्हीं दिनों में बँटवारे की कड़वी यादें भी ताज़ा कर दी जाती है.... हाँ ये भी तो माध्यम हो सकता है कथित ‘देशभक्ति’ के ज्वार को उभारने में... हमारी देशभक्ति तो यूँ भी नकारात्मकता में ही पुष्पित-पल्लवित होती है... जब कोई दुश्मन-सा दिखे और हम उसे गाली दें... तब ही तो होंगे हम देशभक्त... पाकिस्तान के खिलाफ देखिए कैसे हम सारे एक हो जाते हैं और खुद को देशभक्त कहलाने लगते हैं? लगे रहते हैं, पाकिस्तान से अपनी तुलना करने में... कभी-कभी तो लगता है कि हमारी देशभक्ति भी सापेक्षिक है...बिना दुश्मन, बिना विपदा हमें कभी याद ही नहीं आता कि देश जैसी कोई शै भी है, जिसके प्रति हमारी जिम्मेदारी है... रेडियो तो खैर इन सबका अगुआ रहा ही है... इसमें फरमाइशी गानों के प्रोग्राम में सारी फरमाइशें भी तो देशभक्ति के गीतों की ही होती है... आखिरकार हमें देश याद ही इन दिनों आता है... तो सब तरफ आजादी की धूम नजर आ रही है और इस बात पर गहरी कोफ़्त हो रही है... तो सवाल ये उठता है कि कब तक हम प्रतीकों के माध्यम से अपनी देशभक्ति को परिभाषित करेंगे और न्यायसंगत ठहराएँगें? हर साल यही सब करते हैं और अगले दिन हम वही हो जाते हैं, हमारे कर्म, विचार और भावना में कहीं देश होता ही नहीं है। फिर देश क्या है, और देशभक्ति का मतलब क्या? हर साल हम एक रस्म निभा कर सोचते हैं कि देश के प्रति हमने अपना कर्तव्य पूरा किया... और अगले दिन हम वही हो जाते हैं, स्वार्थी, गैर-जिम्मेदार, असंवेदनशील और मक्कार...।
समय आ गया है कि हम शहीदों का पीछा छोड़े, छोड़ दें इसकी जुगाली करना कि उन्होंने इस देश का आज़ाद कराने के लिए क्या-क्या कुर्बानियाँ दी, इतिहास को विराम दे दें... शहीदों की कुर्बानियों के एवज में हम क्या कर सकते हैं, उस पर विचार करें, हम वर्तमान को कैसे खूबसूरत बनाएँ ताकि आने वाली पीढ़ी अपने इतिहास पर गर्व करें... कुछ भविष्य के लिए करें... कुछ आज को सुधारने के लिए करें....।

Saturday, 14 August 2010

मुट्ठी में बँधे सपनों का सच – 1




थर्ड सेम की क्लासेस शुरु हो चुकी थी। बारिश के ही दिन थे... कैंपस हरे रंग की पृष्ठभूमि पर चटख रंगों से बनी एक बड़ी-सी पैंटिंग-सा खूबसूरत और दिलफरेब नजर आ रहा था। आज का बकरा यूँ तो तय था... सुधीर... वो कल सीधे जेएनयू कैंपस से आया था, आज वो बदला हुआ दिख भी रहा था... लेकिन, उसे बकरा बनाने में मजा नहीं है... बस यही सोचकर कुछ उदासी थी और कुछ खलबली भी... कारण बहुत स्पष्ट था, उस बकरे को हलाल करने में क्या मजा जो अपनी गर्दन खुद ही हमारे छुरे के नीचे रख दें, तो आज इससे काम चलना नहीं था, इससे से न तो समोसे का स्वाद आएगा और न ही कॉफी से ताज़गी मिलेगी (अपना घोषित फंडा था, खुद पेमैंट करेंगे तो चाय और कोई दूसरा पिलाएगा तो कॉफी... चाय उन दिनों 3 रुपए की और कॉफी 5 की मिलती थी) तो हर हाल में किसी दूसरे को ढूँढना होगा। चौकड़ी बेर की झाड़ी के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर अभी इस विचार पर मंथन कर ही रही थी कि दूर तक फैली हुई हरी-हरी घास के बीच की पगडंडी पर नींबू पीले रंग का टी-शर्ट पहने आता प्रभु नजर आ गया। बबली चिल्लाई ... हुर्रे बकरा... नजर गई और सभी के चेहरे खिल गए।
प्रभु के पास आते ही एक से बढ़कर एक तारीफ के शब्द उसे मिलने लगे... ये...!!! नई टी-शर्ट... या बहुत अच्छी लग रही है... या कितना अच्छा रंग पहना है प्रभु... या आज तो जम रहे हो.. उसने भी अपनी झेंपी-सी मुस्कुराहट चमकाई और सफाई दी – इट्स नॉट न्यू...। लहजा वही दक्षिण भारतीय... आय वोर इट ऑन वेलकम पार्टी ऑलरेडी...।
ऊँह... दैट डे वी डिड नॉट नोटिस दिस...।
कैंटीन बंद – चलताऊ हिंदी में उसने संकेत समझने के संकेत देने शुरू कर दिए।
दीप्ति ने कहा नहीं खुल गई है। थोड़ी बहुत खींचतान और नोंकझोंक के बाद बात बन गई... बननी ही थी। हर कोई जानता था कि यदि ये चौकड़ी पीछे पड़ जाएगी तो फिर कोई भी बच नहीं सकता है, तभी प्रोफेसर क्लास में जाते दिखे और सभा विसर्जित हो गई। शीत-युद्ध पढ़ाया जा रहा था, अभी तक हम तो यही समझे बैठे थे कि शीत-युद्ध विचारधारा की लड़ाई है और इसलिए सोवियत संघ और चीन दोनों एक ही खेमे में हैं, लेकिन उस दिन जो चैप्टर पढ़ाया जा रहा था, उसमें सोवियत संघ और चीन के बीच खऱाब रिश्तों पर बात हो रही थी।
जब सुधीर ने प्रोफेसर से सवाल किया कि यहाँ विचारधारा कहाँ हैं? यहाँ तो वर्चस्व और हित का संघर्ष है? तो ऐसा लगा जैसे टॉप गियर में चल रही गाड़ी पर एकाएक ब्रेक लग गया और गियर बदल नहीं पाने से वो खड़ी हो गई। खून का प्रवाह नीचे की ओर होता महसूस हुआ और, एक तीखी जलन नीचे से उपर तक दौड़ गई। इतना सादा सा सवाल सुधीर ने पूछा, हमारे अंदर क्यों नहीं आया? चाहे पूछें या ना पूछें... सवाल तो पैदा होना चाहिए ना! बस सारी केमिस्ट्री का कबाड़ा हो गया। कैंटीन में पहले चाय की ट्रे आई तो बेखुदी इतनी ज्यादा थी कि वो ही कप उठा लिया... रजनी फुसफुसाई भी कि चाय है, लेकिन फ्यूज पूरी तरह से उड़ चुका था। बस ऐसे ही कब और कैसे घर पहुँचे पता नहीं चला। पहुँच कर हर दिन की तरह कमरा बंद कर लिया। दिन अभी सुनहरा था, कब साँवला और फिर सुरमई हो गया पता नहीं चला, जबकि खिड़की से तकिया लगाए, गज़ल पर गज़ल सुनते शब्द और सुर के साथ आँसुओं में अवसाद को धोते रहे थे... खुद को समझाया था, इंसान हो... हो जाता है, हर वक्त इस तरह का तना-खींचापन क्यों? और फिर ये तो कोई बात नहीं ना कि किसी के भी अंदर उठा सवाल तुम्हारे अंदर भी पैदा होना चाहिए... धीरे-धीरे सब गुज़र गया...।

Thursday, 5 August 2010

शब्द व्यर्थ हैं, मगर शब्दातीत अर्थ है


अज्ञेय ने लिखा है – शब्द माना व्यर्थ हैं, इसीलिए कि इनमें शब्दातीत कुछ अर्थ है।
दुनिया तेजी से बदल रही है, शब्दों ने लंबा रास्ता तय किया... कहे गए, लिखे गए, छपे, फिर इनमें ध्वनि जुड़ी और अंत में दृश्य जुड़े... दृश्य जुड़ते ही शब्द सिहरने-काँपने लगे... अपने वजूद को लेकर आशंकित वे अपने संसार को समेटने लगे.... दृश्य लुभाते है, ध्वनियाँ डुबाती है, लेकिन शब्द... वे हमें जहाँ ले जाते हैं, वह बीहड़ है... हम वहाँ नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि बीहड़ को हम साध नहीं सकते हैं। ये चैतन्य है, गूँज देते हैं, लंबी... दूर तक.... साध लें तो साधू बना देते हैं। दृश्य का दौर है, शब्द पार्श्व में कहीं चले गए हैं। शब्द की सत्ता खतरे में है, तभी तो उनका जो जैसे चाहे वैसा उपयोग कर रहा है। खोखले हो चुके हैं, अर्थ खो चुके हैं, तभी तो इनकी व्यर्थता उभरती है और दृश्य महत्वपूर्ण हो उठते हैं। दृश्य जो कुंद करते हैं, पंगु बनाते हैं, ‘मैं’ को छीन लेते हैं उसे श्रीहीन बना देते हैं, फिर भी आकर्षित करते हैं। दृश्य अफीम की तरह सपनों की दुनिया देते हैं, लेकिन बदले में कल्पनाएँ हर लेते हैं। तभी तो कलम अब हथियार नहीं रही, फुटेज हथियार हो गए हैं। डिस्पोजेबल का दौर है... यही उपभोक्तावाद का सार भी...। जब तक उपयोगी है, है, जब उपयोग नहीं रहा, जंक...., लेकिन ये सब निर्जीव के साथ तो किया जा सकता है, चैतन्य के साथ नहीं किया जा सकता... दृश्य जब तक आकर्षक है तब तक ही देखे और दिखाए जा सकते हैं, जहाँ आकर्षण खत्म, दृश्यों का वजूद भी खत्म... शब्द लेकिन अपनी सत्ता के साथ कोई समझौता नहीं करते हैं, इसलिए वे हाशिए पर चले गए हैं।
तो एक बार फिर से अज्ञेय की शरण – शब्द तो व्यर्थ है
... लेकिन जब उनके शब्दातीत अर्थ उभरते हैं, तो फिर क्रांति होती है। तो माना कि आज उम्मीद नजर नहीं आती, लेकिन प्रकृति का चलन गोलाकार है, इसलिए एक दिन फिर से शब्दातीत अर्थ उभरेंगे.... हम आशान्वित हैं....

Tuesday, 27 July 2010

यूटोपिया से आगे....




ऐसा आजकल हर दिन होता है। यहाँ ई-मेल एक्सेस करने, फेसबुक पर मैसेजिंग करने और ब्लॉगिंग करने का समय होता है और वो आती जाती है, उसे देखते ही कहीं, कुछ सिकुड़ता जाता है। वो आती है, पंखा बंद करती है, कमरे की झाड़ू लगाती है और निकलते हुए पंखा फिर से चालू कर देती है। वो जितने समय कमरे में रहती है, काम से इत्तर बहुत सारा कुछ अंदर चलता रहता है, शायद सारा ध्यान उसके काम की तरफ लगा रहा है, देखना तो कुछ नहीं होता है, लेकिन कहीं अंदर बहुत सारा कुछ सरसराता रहता है। उसने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की और ग्यारहवीं में आई हैं। जब उसने अपने रिजल्ट की बात बताई तो पता नहीं कैसे कह बैठे कि – खूब मन लगा के पढ़ाई करना, हमारे पास बस यही एक चीज है।
फिर खुद ही सोचा, हमारे पास का क्या मतलब था? अभी इसकी तह खुल नहीं रही है, कभी खुलेगी तब इस पर बात होगी। फिलहाल तो उसकी उपस्थिति और कमरे में पसरी असहजता की बात....।
एक उम्र होती है, जब सारी ‘अच्छी’ बातें आकर्षित करती है। और इस बात पर आश्चर्य होता है कि क्यों दुनिया इतनी अजीब है? तब तो खऱाब ही कहा जाता था, लेकिन अब समझदार हो गए हैं ना! तो शब्द को थोड़ा ‘मॉडरेट’ कर लिया है, अजीब... ठीक भी है न! ना अच्छा न बुरा, बस अजीब! क्यों नहीं सब कुछ को सबसे अच्छे तरीके से जिया जा सकता है? कहा ना! वो उम्र ही ऐसी होती है, क्योंकि हमें खुद कुछ करना नहीं होता है, इसलिए हम सपने देखते हैं, और उसी में जीते भी है... एक मालवी कहावत है कि यदि सपने में लड्डू देखे तो फिर देसी घी के क्यों नहीं... तो मामला कुछ ऐसा ही। यूटोपिया.....इसे ही तो कहा जाता है ना....!
तो उस दौर में प्लेटो का आदर्श, दार्शनिक राजा और सैनिक शिक्षा की वकालत करती उसकी शिक्षा व्यवस्था तो भाती थीं, लेकिन उनके परिवार की घिचपिच ने सब कुछ पर पानी फेर दिया, फिर अरस्तू आ गए.... वो थोड़े दुनियादार आदमी थे, सब कुछ ठीक लगा, लेकिन यहाँ भी मामला अटका कि वे दासों की परंपरा को सही मानते थे। दासों के बारे में वे बहुत सारी मानवीय बातें करते हैं, वे उन्हें इंसान भी मानते हैं, लेकिन फिर भी वे जरूरी मानते हैं। तो लगा करता था कि आखिर यूनानी खून है.... दासों के बिना कैसे काम करेगा। फिर वही यूटोपिया... हाँ मूर का यूटोपिया.... उस उम्र के सबसे करीब होता है.... आज ये सब इसलिए याद आ रहा है कि एक तरफ हम पैर फैलाए अपने सिस्टम पर गिटिरपिटिर कर रहे होते हैं और सोनू.... वही... काम करने वाली लड़की, अपना काम करती हैं। कहीं हमें अपने अंदर अरस्तू का जिंदा होना महसूस होता है, हम भी तो वही है।
ठीक-ठीक दासों का समर्थन नहीं हैं, भई जमाना भी बदला है और हाँ हम भी तो बदले हैं कहीं। हम खुद को ही जवाब देते हैं - वो जो काम करती है, उसका पैसा पाती है। कहीं तो ये भी उठता है कि हम भी तो दास ही है... फिर अरस्तू भी कहाँ गलत कहते थे? वे तो कहते थे, कि जो जिस काम में माहिर हो, उसे वही करना चाहिए। यदि हम बुद्धि के काम ठीक से कर सकते हैं तो हमें वो और यदि वो.... हाँ सोनू.... घर के कामों में दक्ष है तो वो वही करे....इससे घर के कामों में हम जितना समय देते हैं, उतना हम समाज की ‘भलाई’ के काम में लगाए.... एक तरह से वो हमारी सहयोगी है.... आ गए न हम भी वहीं। हमने धीरे से पतली गली निकाली, अर्थशास्त्र में इसे श्रम विभाजन कहते हैं। अरे वाह! कैसी तीक्ष्ण बुद्धि पाई है....

Tuesday, 13 July 2010

भूली-बिसरी किताब-सा हाथ आया सुख



ऐसा नहीं होता है, लेकिन कल रात ऐसा हुआ। हर दिन का वही क्रम - रात के खाने के बाद टहलना, कभी भी इसे अलग नहीं पाया... कभी-कभी तो टहलने वाली सड़क सिर्फ इसलिए बदल दी जाती है कि हर दिन इसी सड़क पर टहलते हैं, कुछ चेंज हो ..... कल रात अलग यूँ था कि अपने मोबाइल में म्यूजिक को नए सिर से फॉर्मेट किया था और दिन भर उसे सुनने का मौका नहीं मिला, सो रात को टहलते हुए साथ ले लिया। नई बस रही सुनसान कॉलोनी में इक्का-दुक्का टिमटिमाती ट्यूब की रोशनी.... हालाँकि आषाढ़ के मध्य में आ पहुँचे हैं और बारिश की आस है फिर भी साफ आसमान पर झिलमिलाते तारे है, आश्चर्य है कि बुरे नहीं लग रहे हैं.... हल्की-हल्की हवा और बहुत पहले सुनी हुई गज़लें..... फिर कुछ इस दिल को बेकरारी है..... कहीं कुछ मीठा सा छूकर गुजर गया... अपने-अपने गुजरे दिन को चुभलाते हुए भूली-बिसरी गज़लों के साथ जगा था वो एहसास..... बड़ा अजबनी.... बहुत पराया.... फिर भी भला-सा लगने वाला।
कहीं पढ़ा था कि – मन अपने सामने भी खुद को नहीं खोलता है।
अपने अंदर उगी यह अजनबीयत उसी मन की नई-नई खुलती पर्तों का नतीजा है। क्या और कितना कुछ होता है, मन के भीतर, लगातार खोलते चले जाने के बाद भी खुलता ही चला जा रहा है। कुछ इसी तरह का अनुभव है इन दिनों... न अतीत है, न भविष्य.... आज भी हवा के पंखों पर सवार.... हल्का और ताजा...। न गुजरे हुए को लेकर कोई कड़वाहट, असंतोष और अभाव, न आने वाले पर किसी तरह की ख़्वाहिश, सपना या महत्वाकांक्षा का बोझ .... न आज के लिए कोई दौड़.... न कुछ पाना चाहना और न कुछ छूट जाने का दुख..... न दौड़.... न हार.... न जीत, न कुछ करना और न ही इस नहीं कर पाने को लेकर कोई मलाल.... कुछ भी नहीं है, फिर भी कुछ है, कहता-सा, जीता-सा, मुस्कुराता-सा कुछ.... कुछ नहीं करते, पाते, सोचते-विचारते, पढ़ते-सुनते हुए भी भरा-भरा अहसास... शायद ये जीवन में पहली बार महसूस हुआ है।
मजदूरों-से हैं, जब तक पत्थर नहीं तोड़ लें, तब तक न तो नींद आए न भूख लगे... ठीक वैसे ही, जब तक खुद को खुरचे नहीं, थोड़ा खून निकाले, थोड़े आँसू हो.. तब जाकर लगे कि हम जिंदा है, लेकिन इन दिनों अचानक से अपने अंदर उगी इस अजनबीयत का क्या करें ये समझ नहीं आ रहा है। बहुत सालों बाद खुद को इतना निर्द्वंद्व और इतना हल्का पाया..... प्रवाह का हिस्सा होने के बाद भी किसी तरह की बेचैनी या छटपटाहट नहीं... कोई दुख, बेचैनी, छटपटाहट या कोई निरीहता भी नहीं.... खुद को इतने परायेपन के साथ देख और भोग रहे हैं, जैसे ये हम न हैं कोई ओर है। हाँ ये सुख है, इसी तरह से आता है, जैसे कोई गुम हो चुकी पुरानी पसंदीदा किताब या फिर कहीं अटाले में पड़ी मिले कोई बहुमूल्य सीडी... बस यूँ ही आया है ये... और आश्चर्य ये है कि न आँसू है, न बेचैनी और न ही छटपटाहट... कुछ यूँ कि न शब्द मिले न भाव... बस है.... कुछ बहा ले जाता-सा, सुख है।

Thursday, 1 July 2010

अफ्रीका के महासागर पर जूही के फूल



जेठ की अंतिम रात और आषाढ़ के पहले सूर्योदय के बीच का वक़्फ़ा…. बादल अल्हड़ हो रहे हैं इसलिए जिम्मेदारी कहीं नहीं नजर आ रही है। वे आसमान पर उधम तो मचाते हैं, बरसते नहीं है। मौसम विभाग का हमेशा का रोना है.... अभी आया, बस बरसेगा और अगले ही दिन कहना शुरू कर देता हैं कि कमजोर हो गया है, तो मानसून तो जैसे छुपाछाई का खेल खेल रहा है। हाँ तो जेठ की उस गुजरती रात के जालों में से उलझा शेर – सुबह होती है, शाम होती है, जिंदगी यूँ ही तमाम होती है – टप्प से गिरा और नींद का शीशा झनझना कर टूट गया। दिमाग के गोदाम में पड़े जंक ने यूँ भी बेचैन किया हुआ है, ऐसे में गहरी नींद का रात के ऐन बीचोंबीच टूट जाना...... जैसे खुद का बेवजह, बेकार हो जाना....। गहरी काली और निस्तब्ध रात के बीच आँखों के बल्बों को बेआवाज टिमटिमाने की सजा.... विचारों का रेला गोदाम की दरारों से बाहर बहने लगा तो फिर नींद के आने के लिए जगह ही नहीं बची। कितना कुछ ठूँसा हुआ है, इसमें.... कोई ओर-छोर ही नहीं है। सुबह से रात तक न जाने कितना अटाला हम जमा करते हैं बिना ये सोचे कि इसकी जरूरत कहाँ और कितनी है?
आखिर पता नहीं किस क्षण नींद जिंदगी की तरह अपना रास्ता बनाकर पहुँच ही गई। कहाँ तो अलस्सुबह उठ जाने की योजना थी और कहाँ चाय के कप और सुबह के अखबार के साथ उठाए गए तो घड़ी ने नौ बजा दिए थे...... ओफ! फिर वही बेकार के एक्सप्रेशंस, जिनके होने का कोई मतलब नहीं था.....लेकिन थे। खैर, फिर से जंक जमा करने का सामान था और हम थे। नजरें टिकी थी अखबार के आखिरी पन्ने की उस रोचक खबर पर कि अफ्रीका में महासागर के निशान मिले हैं...... खबर का आखिरी हिस्सा था और पतिदेव ने बाहर से आकर धप्प से एक अंजुरी भर जूही के फूल उस खबर पर बिखरा दिए थे.... वाह क्या इत्तफ़ाक है!
आखिरी हिस्सा यूँ था कि महासागर के उभरने के निशान तो हैं, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पूरे 1 करोड़ साल लगेंगे..... अब कौन जीता है तेरी जुल्फ़ के सर होने तक......? लेकिन जूही के छोटे-छोटे, नाजुक फूल तो आज के ही हैं.... आज के ही लिए हैं.....। तो यूँ ही एक विचार आया कि इस क्षण, इस घड़ी, इस जगह को बिसराकर हम भूत-भविष्य, पृथ्वी-अंतरिक्ष की चिंता कर रहे हैं, लेकिन कैसे चूक गए कि मानसून की बारिश न होने के बाद भी कितना कुछ हमारे आसपास घट रहा है..... कैसे चूक गए कि गुलमोहर अब भी अपने लाल भड़क छाते को ताने हर आते-जाते को लुभा रहा है, कि नीम में आई कोंपलें कैसे झूमर की तरह हवा में लहरा रही है, कि कैसे सागौन तीन मंजिला मकान की छत तक आ पहुँचा और कैसे जूही अपनी सुवास का बंदनवार सजाए, हर आने-जाने वाले को एकबारगी पलटकर देखने के लिए मजबूर कर रही है, कैसे छूट जाता है, ये सब और हम उलझे रहते हैं कि जी-20 में क्या हुआ? फीफा में क्या हो रहा है? खाप पंचायतें क्या कर रही हैं? और ऑनर किलिंग पर कोई भी नेता क्यों नहीं बोल रहा है? पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से हमारा घरेलू बजट कितना गड़बड़ाएगा और रसोई गैस की खपत को कम करने के लिए क्या-क्या उपाय करने की जरूरत है? अफगानिस्तान से नाटो सेनाओं के चले जाने के बाद क्या होगा? नक्सली समस्य़ा को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल क्यों नहीं हैं और क्यों बेकसूर लोगों की जान इनकी आपसी खींचतान में जा रही है? औऱ पाकिस्तान में कब लोकतंत्र जैसा लोकतंत्र आएगा? कैसे ये सब कुछ याद रहता है, बस वही नहीं याद रहता है, जो हमारे बहुत पास, आँखों की ज़द, हथेलियों की पहुँच में उगता-मुरझाता, जागता-मुस्कुराता रहता है, क्यों नहीं दिखता, याद रहता, आह्लादित और तरंगित करता हमें?..... क्या ये वाकई हमारी संवेदनाओं के मरने की शुरुआत है?

Friday, 25 June 2010

LOVE STORY


Get up i am telling u about the life..- she said
oh come on... its midnight...let me sleep - i request her.
No.... when i will not be with u remember me... and all this....listen... and God knows what she recite all the night... it is morning.... it melt slowly and gently.... she stood up from bed and screm...lets go for the walk....
Have u gone mad? - first u did not sleep me whole night... and then... go for walk.... no...
i saw her with lots of affection...
she comb her hair and knot with clucher... i find her very beautiful at that moment. I remember that piece of ghazal – KAUN SI BAAT HAI TUMME AISI, ITNE ACHCHE KYUN LAGATE HO….and sung….she smile sweetly and said – BAND KARO, KITNE BESURE HO. I said….i am questioning not singing…she put unreal anger on face and said come fast - she orderd and went outside... i don't have any options... i questioned myself - why i am so helpless before her... there is no answer, except this, i love her...
outside there is mild cold...sun peeks from east... i hold her hand and suddenly i go front of her, sit on knee and proposed - lets get married.
she laugh whole hearted- u r mad....seriously u r.
what happened? - i stare her with wonder...- what about laughing in this...
why marriage? - she asked
i feel insecure about u...- i answered
why?
i don't believe u, i am living in this dread that some day u 'll leave me...
now she is be serious...- yaa i can go any time...
thats why i want to marry u. - i disclosed
she smile - u think if we will get married then i could not leave u. nothing can stop me...-
she said with solidity.
then how can i tie u? - i asked her with some innocence
no, u can't...- she said.- i don't believe in to hook up in relations....
i want to live with freeodm... confinement ruin relations, I don’t want my relation to be like this.
There is raining....and she screams with happiness.
In next morning, again in my deep sleep, i want to hold her unconciously....she is not
there....suddenly i wake up with hassel and searching her madly....but i did not find her except a slip of bye.

Monday, 21 June 2010

देह की नागफ़नी, नागफ़नी की देह


संघर्ष घना है, हमेशा की तरह। लेकिन इस बार उसका रूप बिल्कुल ही नया है। कहाँ से आ गया ये सब.... ये सब तो कहीं था ही नहीं। कहाँ तो विदेह हो जाने की तीखी आकांक्षा और अब ये दैहिकता की अंकुरित होती चेतना, दो सिरे। अपने होने का खास लगना, बहुत सारी आँखों में चिह्नित होते खुद को देखने का सुख और उस सुख से उपजा दुख। न दुख अपना न सुख.... फिर भी दोनों अपने। ये बीज इस मिट्टी में कहाँ से आया? ये जमीन तक इसके लिए अनुकूल नहीं थी और ये कब अंकुरित हुआ? चलो अंकुरित हुआ होता तो समझ में आता, लेकिन ये तो बीहड़ झाड़ी हो चली है। अब इसे उखाड़ने का दुरुह कार्य... लहूलुहान होना ही ठहरा..... । ये देह की नागफ़नी कहाँ से और कैसे आ गई? ये बिल्कुल अपरिचित झाड़ी..... कैसे उग आई...? और अब उग आई है तो इसका क्या किया जाए...... ? इसे यूँ ही पनपते रहने तो नहीं दिया जा सकता है ना.... ? यही संघर्ष है... नया तो नहीं है.... हाँ ऐसा कभी रहा नहीं.... अपनी भौतिकता के प्रति हमेशा की उदासीनता कहीं गुम हो गई और एकाएक लगाव पैदा हो गया..... और इस लगाव से उपजा है संघर्ष..... हमेशा तो वैचारिकता का ही वैचारिकता से द्वंद्व रहा करता था, लेकिन इस बार ये बिल्कुल नया है। हमेशा ही कहा जाता है कि जो होती हूँ, वही नहीं होना चाहती हूँ। खुद का अतिक्रमण करने की चुभती चाह....। बस यही अस्वाभाविक ख़्वाहिश है। अपने होने को हमेशा लाँघ जाने की चाह और उसके लिए इतने ही दुर्गम उपाय.... उस सबसे दूर जो स्वाभाविक होता है, उस सबकी ओर जो कृत्रिम होता है, यही चाह है, यही संघर्ष और यही त्रास। जो सहज होता है, उसी से बचना... ।
अपना भौतिक स्व इतना गहरा कैसे हो गया? वो इतना आँखों में खटकने कैसे लगा? अपना आत्मिक स्व कहाँ बिला गया, इस सबमें... और क्यों वो मुझसे अलग हो गया? क्या वाकई अलग हो गया? यदि हो जाता तो हो सकता है कि ये संघर्ष नहीं होता, लेकिन वो भी है। फिर वही होना और होना चाहना के बीच का तनाव...। ये कैक्टस की चुभती सी देह कहीं आँखों में अटकती है.... तो फिर देह का कैक्टस लहूलुहान किए हुए हैं। संघर्ष सघन है ..... कारण विरल.....।

Sunday, 13 June 2010

...मुझे ऐ जिंदगी दीवाना कर दे




उस दिन इयरफोन लगे हुए थे। 14 मिनट 21 सेकंड लंबी इस कव्वाली के आखिरी सिरे पर थी--कई-कई वार चढ़ी कोठे ते नी मैं उतरी कई-कई वारी..... न दिल चैन न सबर यकीं नू.... न भूलदी सूरत प्यारी.... आ जा सजणा.... ना जा सजणा ......तू जितीया ते मैं हारी... छेती आजा ढोलणा.... तैनू अखियाँ उड़ीक दिया.....
विरह..... तड़प, समर्पण और बेबसी का चरम..... डूबने की शुरुआत..... उतर जाने के लिए आँखें बंद की, सिर कुर्सी की पुश्त पर टिका दिया...... उस एक क्षण के लिए..... लेकिन तभी पड़ोस में काम कर रहे साथी को किसी ने आवाज दी। उसने तो नहीं सुनी लेकिन यहाँ सुनाई पड़ गई.... क्षण छूट गया, अब भी कानों में वो लंबी सरगम सुनाई पड़ रही थी, लेकिन आँखें खुली हुई थीं और हमारे सामने खुरदुरी हकीकत फैल गई थी। टेबल-कुर्सी, कम्प्यूटर, फोन, आते-जाते, हँसते-बतियाते लोग...... जागृति के सारे लक्षण फिर से साकार हो उठे थे.... घड़ी भर की निजात का ये क्षण भी हाथ से फिसल गया था।
रविवार की छुट्टी..... सुनहरी से साँवली होती जेठ की सुबह.... जमा होती खूब सारी उम्मीदें..... बादल, बारिश, फुहारों का इंतजार। सारा काम जल्दी-जल्दी निबटाया.... डूब जाने के लिए सारी अनुकूलताएँ...... एक क्षण, सादा.... अनायास-सा आता है, लेकिन उसके लिए कितने-कितने जतन करने पड़ते हैं! दोपहर को हमेशा की तरह केट नैप के बाद की चाय.... कप पड़े हुए थे..... बहुत पुरानी उपेक्षित-सी पड़ी सीडी हाथ आई.....सूरदास का भजन जसराजजी की आवाज.... विरह का दर्द....... कुब्जा के रंग में राचि रहे...... राधा संग अइबो छोड़ दिया...... श्रीकृष्णचंद्र ने मथुरा ते गोकुल को अइबो छोड़ दिया...... फिर से डूबने-डूबने के मुहाने पर...... इस बार तो बस डूब ही चुके थे...... सुरदास प्रभु निठुर भए..... सुरदास प्रभु निठुर भए.... हसबो इठलइबो छोड़ दियो......अभी आलाप चल ही रहा था कि वॉशिंग मशीन का बजर बज उठा.... सब खत्म.....। क्यों होता है, ऐसा?
इतने चौकन्नेपन की जरूरत नहीं है? अब बजर बजा है तो बजा है, लेकिन नहीं वो कहीं अटक गया है। अचानक-से याद आ गया – मैं अपने आप से घबरा गया हूँ, मुझे ऐ जिंदगी दीवाना कर दे......और रूलाई फूट गई.....क्योंकि ये तो सिर्फ एक उदाहरण है.... मसलन – कैसेट का अटक जाना, बाथरूम का टपकता नल या फिर जलती लाइट, प्रेसवाले लड़के की या सब्जी वाले की आवाज.... केलैंडर का फड़फड़ाना या फिर तेज हवा में भड़भड़ाते खिड़की-दरवाजे, चाय नाश्ते के जूठे पड़े बर्तन या फिर जूठे पड़े चाय के कपों में चींटी हो जाना...... फेहरिस्त बहुत लंबी है, कुछ भी हो सकता है, लौटा लाने के लिए.... एक सादे-से अनुभव को पाने के लिए कितने सारे षडयंत्र!
संक्षिप्त में यूँ है कि जाग्रतावस्था में खुद को कभी भी खुद से मुक्त नहीं पाया। हमेशा त्वचा की तरह से चिपकी रहती है ये भौतिक चेतना... बस गहरी नींद में ही इससे मुक्ति है, लेकिन मुश्किल ये है कि नींद में इस मुक्ति का अहसास नहीं होता है। इतनी-सारी सतर्कता, इतना सारा चौकन्नापन क्यों है? क्यों नहीं घड़ी-दो-घड़ी खुद को छोड़ पाती.... अपनी चेतना को समेट कर सुला पाती, कि खुद के पास बैठकर देख पाती कि इस चौकन्नेपन से मुक्ति के बाद कैसा लगता है, कि बाहर से बेखबर होकर भीतर के अँधेरे को देखना, पीना, जीना कैसा लगता है? क्यों बाहर इस कदर चेतना में अटका पड़ा रहता कि भीतर मुड़ने-जुड़ने के लिए अनुष्ठान करना पड़ता है, फिर भी सफल हो गए तो ठीक... आखिर तो बाहर को सहते-सहते कभी-कभी इस सबको झटक कर अलग खड़े हो जाने का..... भौतिक स्व से दूर होकर आंतरिक स्व को टोहने का सुख बहुत सुलभ क्यों नहीं है? क्यों भौतिक जगत हमारे बाहर भी पसरा हुआ है और भीतर भी..... क्यों इसी में सब कुछ अटका पड़ा रहता है, क्यों इससे निजात नहीं है? क्या इस बेचैनी और छटपटाहट की वजह भौतिकता, दृश्य जगत का ये असीम विस्तार ही तो नहीं, जो हमें घेरे हुए हैं, बाहर से और भीतर से भी.....?.

Monday, 7 June 2010

इश्क़-ए-हक़ीक़ी में अन्नपूर्णा देवी


4 जून के स्क्रीन में अन्नपूर्णा देवी पर एक खुबसूरत आर्टिकल पढ़ा...... खुबसूरत से अच्छा और कोई शब्द फिलहाल मिल नहीं रहा है...... क्योंकि उस अनुभूति को जिसे मैंने पढ़ने के दौरान और आज तक जी रही हूँ, शब्द नहीं दे पा रही हूँ, इसलिए फिलहाल सिर्फ खुबसूरत शब्द से ही काम चला रही हूँ।
ये एकसाथ ही बहुत ज्यादा जाना और बहुत कम सुना नाम है। ज्यादा जाना इसलिए कि उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब की बेटी, उस्ताद अली अकबर खाँ की बहन के साथ ही पंडित रविशंकर की पहली पत्नी अन्नपूर्णा देवी का परिचय ज्यादातर इतना ही है..... लेकिन वो इससे कहीं ज्यादा है..... फिर परिचय इतना ही क्यों है? क्योंकि वे इतना ही चाहती हैं..... अजीब है ना..... ? हाँ तो उनका हकीकत में परिचय पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, चंद्रकांत सरदेशमुख, आशीष खान, सुधीर फड़के और उन्हीं की तरह कई-कई संगीत के दिग्गजों की गुरु के रूप में दिया जाता हैं....., फिर भी वे न तो कंसर्ट देती है और न ही रिकॉर्डिंग करती हैं...... क्यों? ये उनका निर्णय है। वे कहती है कि संगीत मेरे ईश्वर के लिए है.... मेरे लिए है.....। बस यही वो बात है, जिसने मुझे लिखने के लिए मजबूर किया। एक तरफ प्रतिष्ठा और शोहरत के लिए कुछ भी कर गुजरने वाली इस दुनिया में खुद के वजूद को इस तरह ईश्वर के हवाले कर देने के पीछे का मनोविज्ञान क्या होगा?
स्वभाव की वो कौन-सी केमिस्ट्री है, व्यक्तित्व का वो कौन सा तार है जो उन्हें अपने स्थूल होने के प्रति इतनी अचल निस्संगता देता है और अपने हक़ीकी स्व के प्रति इतनी गहरी ईमानदार निष्ठा देता है? वो क्या है? जो किसी सपने, किसी ख़्वाहिश, किसी प्रलोभन से नहीं डोलता है? मान, प्रतिष्ठा, शोहरत, समृद्धि, प्रशंसा, महत्वाकांक्षा, सफलता, उपलब्धि हर चीज के प्रति इतनी ठोस निर्लिप्तता, अचल उदासीनता और निश्चल निस्संगता कैसे आती है? और वो कैसा मन है, जो इस दौड़ती भागती दुनिया के बीच भी वैसा ही अटल, वैसा ही निश्चल बना रह सकता है? क्या ये इस तरह का संतत्व...... अचीव किया जा सकता है, पाया जा सकता है? या वो बस स्वभाव होता है? क्या इतनी निर्द्वंद्वता कभी पाई जा सकती है? क्योंकि यही तो उस मंजिल तक पहुँचाती है, जिसे फ़कीरी कहते हैं...... सब होने से दूर.... सब पाने से अलग..... सब जीने से निस्संग..... बस इश्क-ए-हक़ीक़ी में गर्क होना.....। यही तो है ना जीवन का आनंद.......?

Friday, 4 June 2010

इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं


ऐसा शायद होता ही होगा.... तभी तो उत्सव से जुड़ता है अवसाद। क्या होता होगा इसका मनोविज्ञान.....? क्यों होता है, ऐसा कि जमकर उत्सव मनाने के बाद समापन के साथ ही गाढ़ी-सी उदासी........ न जाने कहाँ से चुपके से आ जाती है.... करने लगती है चीरफाड़, उस सबकी, जिसे आपने जिया...... भोगा.......और किया....... पूछने लगती है सवाल कि क्यों किया ऐसा.......इस जीने से क्या मिल गया?
क्या खुद को सामूहिकता में बहा देने...... बिखेरने और फैला देने का प्रतिशोध होता है ये अवसाद..... क्योंकि उत्सव की कल्पना ही सामूहिकता से शुरू होती है। तो क्या अपने स्व को बहा देने के दुख से पैदा होता होगा अवसाद......। कहीं लगता है, कि ये सामूहिकता और व्यक्तिगतता के बीच का द्वंद्व या फिर..... भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच का तनाव तो नहीं है? क्योंकि अक्सर गहरी एकांतिकता में अनायास आ पहुँचे आनंद के क्षणों को जी लेने के बाद तो ऐसी कोई अवसादिक अनुभूति नहीं होती.....उसके बाद तो एक दिव्यता का एहसास होता है, तो फिर सामूहिकता के आनंद को जी लेने के बाद ऐसा क्यों होता है?
तो क्या यहाँ भी मामला भौतिक और आध्यात्मिक है.....? भौतिकता को जी लेने, भोग लेने के बाद रिक्तता का अहसास अवश्यंभावी है...... और आध्यात्मिकता के बाद खुद के थोड़ा और आगे बढ़ने....... कुछ और भरे होने..... कुछ ज्यादा भारी हो जाने का सुख.....? क्या भौतिकता रिक्त करती है और आध्यात्मिकता भरती है? तो फिर भौतिकता के प्रति इतना गहरा आग्रह क्यों होता है? तो इसका मतलब ये है कि हम सीधे-सीधे खुद से ही भाग रहे हैं...... अवसाद सिर्फ उन्हीं के लिए है जो स्व के प्रति आग्रही है..... वरना तो मजा ही सब कर्मों के मूल में है। फिर हमें ये वैसा क्यों नहीं रखता है..... हम क्यों उत्सव के बाद अवसादग्रस्त हो जाते हैं....? क्या ये ऐसा है ? – इत्तफ़ाकन जो हँस लिया हमने, इंतकामन उदास रहते हैं…..
कहीं गड़बड़ केमिस्ट्री में ही तो नहीं....?

Friday, 21 May 2010

लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस


शुक्रवार की शाम थी.... इंतजार के पहले दिन के मुहाने पर बैठे थे, अभी एक दिन और बाकी था। अपने एक जैसे रूटिन में सन्डे का इंतजार करते रहने के दौरान यूँ ही एक तुकबंदी रच डाली थी
सोम, मंगल खुमार
बुध, गुरु उतार
शुक्र, शनि इंतजार
तब कहीं आता है रविवार....
हाँ तो टीवी के सामने अपनी खाने की थाली लगी थी..... बालिका वधु का हमेशा की तरह ही अतार्किक उत्सुकता जगाने वाला अंत हुआ था। थाली में से दाल की कटोरी तो पहले ही अलग कर चुके थे, एक-एक कौर खाकर दोनों सब्जियों को भी रिजेक्ट कर चुके थे, आम के रस के साथ चपाती खाना.... च्च.... तो फिर चपाती किसके साथ खाएँ.... इसकी खोज करने के लिए किचन में पहुँचे तो दही नजर आया.... चीनी और पीसी इलायची डाल कर थाली में रखा..... समय को पुरी तरह से निचोड़ लेने के लिए टीवी के सामने बैठकर भी किताब हाथ में हुआ करती है, वो तब भी थी...... एनडीटीवी पर ब्रेक खत्म हो चुका था, हमारा सिर किताब में ही था कि श्योपुर का नाम सुनकर कान खड़े हुए..... किताब में बुकमार्क फँसाया और टीवी देखने लगे। रूबीना खान शापू मध्यप्रदेश में भूख की रिपोर्ट लेकर आई थी, वे श्योपुर में एक माँ से चर्चा कर रही थी, जो उसे बता रही थी कि वे अपने बच्चों को खाने में खरपतवार दे पाती है, क्योंकि उनके पास आलू खरीदने के भी पैसे नहीं है..... कौर गले में अटक गया और साँस सीने में.....हाथ का चम्मच चला-चला कर हमने दही की छाछ बना डाली थी। रिपोर्ट गुलज़ार की फिल्मों की तरह कभी फ्लैश बैक में 2008 में जाती तो कभी वर्तमान में आ जाती है, दो साल से हालात में कोई फर्क नहीं आया.... अपने शहर से उत्तर में श्योपुर, दक्षिण में खंडवा और पश्चिम में झाबुआ तक के 200 किमी के रेडियस में इस कदर भूख पसरी हुई है..... कहीं कुछ काँपा..... आँखों से कुछ पहले आँसू भी ठिठक गए..... छोटे-छोटे बच्चों की निकली हड्डियाँ और सूखे से चेहरे..... कहाँ पहुँचे हैं हम विकास करके.....?
रूबीना अब भोपाल में शाइनिंग इंडिया का नजारा दिखा रही थी.... हमारी रूकी हुई साँस फिर से चलने लगी, गले का कौर उतर गया, नहीं सब कुछ उतना बुरा भी नहीं है। उसने इस बात से अपनी रिपोर्ट का समापन किया कि – खाते-पीते मध्यमवर्ग को शर्म मगर नहीं आती.... उसी निश्छल बेबसी में हमने सवाल किया – आती है भाई बहुत आती है, लेकिन हम क्या कर सकते हैं......?
उसी बेचैनी में पतिदेव ने जवाब दिया – कुछ नहीं बस अपना टैक्स ईमानदारी से चुकाइए....
निश्छलता बाकी थी, अभी कल ही तो सवाल उठा कि हम कितना बचे हैं..... नहीं अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है...... अब भी कुछ बचे हुए हैं। फिर से एक बेतुका सवाल किया – हम तो ईमानदारी से अपना टैक्स भर रहे हैं, फिर भी तो बच्चे भूखे हैं।
सवाल करते ही सारी निश्छलता हवा हो गई...... खाँटी दुनियादारी सतह पर फैल गई..... जवाब जो पाना था – हमारे टैक्स चुकाने और बच्चों की भूख शांत होने के बीच बहुत सारे अप्स एंड डाउंस हैं...... हमारे लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस....
नहीं है क्या?

Thursday, 20 May 2010

होने-गंवाने का हिसाब


मानसून के आमद की खबरों के बीच पश्चिम में गर्मी अपने पूरे शबाब पर है..... दाना चुगने के लिए चोंच खोले चिड़िया के बच्चे की तरह धरती का मुँह जगह-जगह से खुलने लगा है..... मौसम की कुछ ज्यादा ही मेहरबानी रहती है हम पर जरा बदला नहीं.... मन भी बदलने लगता है.....। हाँ तो अभी हर जगह तपन है.... भारी..... तेज-तीखे दिन और गहरी गुनगुनी शामों के साथ पठार की रातें जरा सुरमई मीठी हो जाती है, लेकिन क्या करें कि दिन भर की तपन
उसकी मिठास भी लील लेती है......तो जब रात हाथ आती है तो खुद हम कुछ बचे नहीं होते हैं। अब यूँ ही हम कितने बचे होते हैं......?
बस यही खऱाब आदत है, बात सीधी हो लेकिन पहुँच जाती है टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में...... यूँ भी हम कितने बचे हुए हैं........ ? अब ये तो कोई सवाल नहीं है..... लेकिन है कैसे नहीं.... यही तो सवाल है...... सवालों वाला......खूब सारे खाँचों.... बहुत सारे रिश्तों.... सपनों, ख्वाहिशों, जरूरतों, अपेक्षाओं और समझौतों के बीच
कोई भी जितना बचा रह पाता है.... बस उतने ही हम भी बचे हुए हैं.....। रिश्तों के बीच अपने होने को भूले..... हर रिश्ते, हर जगह और हर काम की अपेक्षाओं के बीच खुद कण-कण झरते हैं...... बहुत चुपके से..... खाँचों में पूरे ही स्वाहा हो गए..... और किसी पारंपरिक खाँचों को न भी बखाने तो जो भौतिक खाँचे हैं, वे तो हैं ही ना.... औरत, शादीशुदा....वर्किंग.....अजीब-सी.... घमंडी.... अकड़ू..... थोड़ी बहुत सहानुभूति हो तो.... संवेदनशील.... अच्छी और दो-तीन कांप्लीमेंट.... परिभाषित हुए और खेल खत्म.... बस इतने ही तो हैं, हम.... कितने.... बस कुछ शब्द.....यही है जिंदगी कुछ ख्बाव, चंद उम्मीदें.... लेकिन यहाँ तो मामला अपना है.... जीवन की कौन कहे.....। फिर बारी आती है खुद अपनी..... कई-कई सपनों, जरूरतों और ख्वाहिशों के पीछे भागते हम...... इस दौरान कितना और क्या छोड़ देते हैं, हिसाब ही नहीं रखते हैं। मेरे साथ रहने वाले 'विद्वान' कहते हैं कि - ''हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है, अब ये आपको तय करना है कि किसके बदले आप कितना चुकाना चाहते हैं....'' तो फिर खुद को अपने सपनों पर कुर्बान करते रहते है, यदि एक सपना हो तो नुकसान उतना नहीं होता.... लेकिन यदि सपनों की फौज ही हो तो फिर तो हम रेत के एक कण जितने वाल्यूम में भी नहीं बचते हैं.... लेकिन परवाह किसे हैं, सपनों के पीछे दौड़ते जाने के जुनून, असफल होने का दुख या सफल होने के नशे के बीच ये याद ही नहीं रहता है कि हम खुद को टटोल लें.... देख लें.... कि अब अपने लिए कितना बचे हैं... ...? और जब हमें इतना होश आता है कि हम अपने होने को टटोल लें, सहेज लें.... तो पता लगता है कि सहेजने जैसा तो अब कुछ बचा ही नहीं है....। लेकिन
ज्यादातर तो हो जाने से ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन हमारे जैसे कुछ होने से नहीं चुपाते हैं तो फिर इसी तरह के सवाल उठाते हैं, जिनका न सिर होता है और न ही पैर.... तो हम बहुत कुछ हो तो जाते हैं, लेकिन इस होने के चक्कर में रह कुछ नहीं जाते हैं... . एक खाली-खाली सा वजूद जो दूसरों के लिए बहुत कुछ होता है, बस अपने ही लिए कुछ नहीं रह पाता है....। अब ये तो कोई इत्तफाक नहीं है कि मैं ये सब लिख रही हूँ और मेंहदी हसन साहब शायर फरहत
शहजाद को फरमा रहे हैं -
अपना आप गंवा कर तूने, पाया है क्या,
मत सोचा कर, मर जाएगा......
फिर.......?

Tuesday, 11 May 2010

दर्द के लिए दवा के तौर पर दर्द की तलाश


बेचैन दिन और तपती-सी रातें हैं.... उद्वेलन, उलझन और विषाद की पर्तें चढ़ने लगी है। होने पर सवाल और मुट्ठी में बँधी रेत-सी फिसलती....साँसों का अहसास.... हो पाने का अहसास और होने को बहा दिए जाने की तीखी ख्वाहिश..... ऐसे ही तपते, उलझे और मुश्किल दिनों में शिद्दत से बीमार हो जाने की ख्वाहिश करती हूँ.....। बेवकूफ कही जाती हूँ.... इसलिए ख्वाहिश तो करती हूँ, लेकिन उसे जाहिर नहीं करती...... अक्सर 2-4 दिनों के बुखार के बाद यूँ लगता है, जैसे पुनर्जन्म हुआ है..... पुराना सब कुछ कहीं इन दिनों में बह गया है.... सारी उलझनें सुलझ जाती है और जीवन अपने पूरेपन में नया हो जाता है..... हम भी.....लेकिन या तो मैं गलत हूँ या फिर मेरे एहसास..... या फिर...... पता नहीं... मेरा लगना और चाहना एक बार फिर से उसी शिद्दत से उभर रहा है। विचारों और ख्वाहिशों की गुंजलक बन गई है.... उलझनें गहरी हो गई है और कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है.....। तो फिर वही ख्वाहिश उभरी है...। अपने धुल जाने और नए हो जाने के लिए फिर से बीमार हो जाना चाहती हूँ।
इन दिनों निर्मल वर्मा की डायरी पढ़ रही हूँ। इससे पहले कभी किसी की डायरी पढ़कर यह नहीं लगा कि ये मेरा आइना है.... इसे पढ़कर हर दिन लगता है। इच्छा जागती है कि काश ये कंठस्थ हो जाए..... इसकी हरेक चीज मुझे याद रहे..... जानती हूँ, थोड़ा मुश्किल है। हाँ तो इसका जिक्र इसलिए यहाँ आया कि वे भी यही कहते हैं....
क्या बीमारी किसी सॉल्वेंट का काम करती है, जिसमें हमारा मैं घुल जाता है और हम दुबारा इस दुनिया में नई साँस लेने आते हैं – मानो देह का बुखार आत्मा के ज्वर को अपने में समा लेता है और उसे हल्का और मुक्त छोड़ देता है।

ये पढ़कर मुझे अच्छा लगा..... आखिर इस दुनिया में कोई तो है/था, जो मेरी ही तरह महसूस करता है/था। हालाँकि कोई भी विचार, अहसास दुनिया में अनूठा, अलबेला नहीं होता है, लेकिन जब तक हमें उस तरह से सोचने और महसूस करने वाला न मिले तब तक के लिए तो वह अनूठा ही हुआ ना....! खैर अच्छा लगने का कारण एक तो यह है कि आखिर कार मैं ऐसा कुछ तो महसूस करती हूँ जो निर्मल वर्मा जैसे धुरंधर बौद्धिक ने भी कभी अनुभव किया है। दिल के खुश रखने के लिए कोई भी खयाल क्या बुरा है।
तो मेरे बीमार होने की दुआ करें...... आमीन!

Saturday, 8 May 2010

माँ एक रसायन है



माँ से हमारा रिश्ता सबसे पुराना होता है, खून का....इसलिए उसे तो हमें प्यार करना हुआ ही..... कुछ ऐसे रिश्ते भी होते हैं, जो माँ की तरह खून से तो नहीं बँधे होते हैं, लेकिन उनके होना, हमारे जीवन की नींव में होता है, और वो इतना पुख्ता होता है, कि उसका अहसास हमें जीवन के हर मोड़ पर होता रहता है.... वो माँ नहीं होती, लेकिन उससे कम भी नहीं होती.... फिर हरेक के जीवन में ऐसे रिश्ते नहीं होते हैं, ये बहुत रेयर है..... मैं खुशनसीब हूँ कि मेरे पास ऐसा रिश्ता है.....मदर्स डे पर एक ऐसा ही रिश्ता...... आदरांजलि के साथ
गर्मियों की शाम थी.... वे जल्दी-जल्दी मुझे तैयार कर रही थीं.... पता नहीं कब से दोनों ने मुझसे जुड़े हुए कामों को आपस में बाँट लिया था.... या फिर ये यूँ ही बस होता चला गया था। बालों में तेल लगाना, उन्हें रीठा-शिकाकाई से धोना बा (ताईजी, यूँ गुजराती में माँ के लिए बा शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन हम भाई-बहन ताईजी को बा कहते हैं, क्योंकि भइया, (ताईजी का बेटा) उन्हें बा कहता है, इसलिए हम भी उन्हें बा कहने लगे) के जिम्मे था और उन्हें सुलझाना, बाँधना और जुएँ निकालना माँ के हिस्से।
दरअसल मेरे लंबे खूबसूरत बालों को लेकर बा और पप्पा (ताऊजी) दोनों ही अतिरिक्त रूप से सतर्क थे। और वे उसके लिए वे सारे खटकर्म करते थे, जो उन्हें कोई भी सुझा देता था। हाँ तो बा मुझे डांस क्लास ले जाने के लिए तैयार खड़ी थी और मैं खेलने में मगन थी। पता नहीं माँ जल्दी-जल्दी कर सुलझा रही थी इसलिए या फिर मुझे दुख रहा था, इसलिए मैं जोर सी चीखी थी... आप बाल खींच रही हैं।
माँ ने सिर पर तड़ाक से चपत लगाई थी.... तू सीधी नहीं बैठ रही है, कैसे सुलझाऊँ.... बा का गोरा चेहरा तमतमा आया था। गुस्सा वे करती नहीं हैं, फिर भी खीझकर बोली थी, उसे दुख रहा है, तू छोड़ मैं कर देती हूँ। माँ गुस्सा होकर वहाँ से चली गई थी। अपने राम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। ना तो माँ एक से ज्यादा आम खाने को देगी, ना आम आते ही उन्हें हाथ लगाने देंगी, रात को खिचड़ी खानी होगी तो भी माँ तो बनाकर देने से रही..... कलाकंद भी तो बा ही मँगवा कर खिलाएगी तो फिर माँ के गुस्सा होने से फर्क क्या पड़ता है.... होती रहे गुस्सा....।
उनके साथ मेरा बचपन भरा-भरा था, मैं बा के साथ ही रहती, कहीं जाना हो तो बा के साथ, बा मायके जाए या फिर बहन के घर शादी में मैं साथ ही टँगी रहती थी। शायद ही कभी किसी ने बा को मेरे बिना देखा हो। माँ के साथ आना-जाना मुझे ज्यादा सुहाता नहीं था। माँ बहुत अनुशासित हैं और बहुत टोका-टोकी करती हैं... और बा.... बा के साथ तो बिंदास रहा जा सकता है। इसलिए जब माँ मायके जाती तो हम दोनों भाई-बहनों की कोशिश हुआ करती थी कि हम ना जाएँ और हाँ बा की भी.... हमारे न जाने के पीछे के कारण स्पष्ट थे, यदि आधी रात को भी हलवा खाने की फरमाईश की तो बा ही पूरी करेगी.... माँ तो डाँट-पीटकर सुला ही दें....।
शायद उसी समय का वाकया है.... बैसाख के अंतिम दिन थे, परीक्षाएँ खत्म हो चुकी थी। माँ मायके जाने की तैयारी कर रही थी, वे चाहती थीं कि हम दोनों भी उनके साथ जाएँ.... कारण स्पष्ट था, सभी बहनें अपने-अपने परिवार के साथ वहाँ आएगी.... आखिर नाना-नानी को भी तो हमारा इंतजार होता था, फिर शायद एक वजह यह भी रही होगी कि वहाँ हम दोनों बहुत सयाने माने जाते थे, कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं, कोई जिद नहीं... जाहिर है वहाँ हमारी तारीफ हुआ करती थी.... हो सकता है माँ को यह अच्छा लगता हो.... यूँ माँ ने हमारी तारीफ कभी नहीं की.... शायद यहाँ भी दोनों ने कोई समझौता किया हो कि अनुशासन माँ देगी और प्यार बा करेगी।
मुझे ननिहाल जाना पसंद नहीं था, बात यह है कि बा की वजह से हम दोनों भाई-बहन बहुत चटोरे हो गए थे। हर दिन सामान्य खाना हमारे बस की बात नहीं थी.... और चूँकि नानी हमारी माँ की भी माँ हैं, इसलिए अनुशासन में वे माँ से भी एक कदम आगे थी....इसलिए उनका फरमान रहता थी कि घर में जो कुछ बना है, सभी वही खाएँगे.... जब खाने की थाली पर बैठकर हम भाई-बहन नाक-भौं सिकोड़ते थे तो नानी हमारी माँ से कहतीं थी - तेरी जेठानी ने तेरे बच्चों को बहुत बिगाड़ दिया है, सिर्फ अच्छा खाने को चाहिए...। तब तो यूँ लगता था कि नानी बा की बुराई कर रही है, आज समझ में आता है, कि नहीं वो उनकी तारीफ थी।
हाँ तो माँ जाने के लिए अंदर के कमरे में सूटकेस जमा रही थी और बा बहुत बेचैनी से अंदर-बाहर-अंदर-बाहर कर रही थीं। कभी कोई दवा लेकर आतीं और माँ को रखने के लिए देती तो कभी ग्लूकोज देती, तो कभी हिदायतें....बहुत देर तक माँ अपनी झुँझलाहट छिपाने की कोशिश करती रहीं, फिर रहा नहीं गया तो कह दिया - आपके बच्चों को आपके पास ही छोड़ जाती हूँ।
बा थोड़ी खिसिया गईं.... नहीं बेटा गुस्सा मत कर... बच्चे वहाँ जाकर बीमार हो जाते हैं ना! बस इसीलिए थोड़ी चिंता होती है।
माँ मीठे-से मुस्कुरा दी - मैं ध्यान रखूँगी, आप चिंता न करें।
लेकिन फिर ऐन मौके पर पता नहीं कहाँ क्या गड़बड़ा जाता कि मैं माँ के साथ जाने से इंकार कर देती..... क्योंकि यहाँ जितनी स्वतंत्रता मिलती है, और जितना स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता है, वह ननिहाल में मिलने से रहा।
जाने वाले दिन सामान आँगन में रखकर ऑटो का इंतजार हो रहा होता है, तभी बा आकर माँ की गोद भरती है। ऑटो आकर घर के सामने खड़ा हुआ है.... इधर दोनों एक-दूसरे के गले मिलकर सुबकने लगती है। मुझे बड़ी हैरत होती है, माँ तो अपनी माँ से मिलने जा रही है तो फिर वो क्यों रो रही है? और बा को क्या हो गया है? लेकिन दोनों को रोता देखकर मैं भी बुक्का फाड़कर रोने लगती हूँ तो बा मुझे गले लगा लेती है। ये सीन साल-दर-साल गर्मियों में दोहराया जाता रहा है।
पता नहीं ऐसा डांस की प्रैक्टिस करने से होता है, या फिर ये विरासत में मिला है.... रात में पैर बहुत दर्द करते थे... आधी रात को उठकर बैठ जाती और बुक्का फाड़कर रोने लगती.... बा घबराकर उठती ( माँ बताती हैं कि जब मैं तीन महीने की थी, तभी से बा के साथ सोने लगी थी।)। सिर पर प्यार से हाथ फेरती, क्या हुआ बेटा....?
पाँव बहुत दुख रहे हैं....- मैं कहती
वे बहुत देर तक दबाती रहती, नींद लगती और फिर जाग कर रोने लगती.... फिर वे केरोसीन लाकर लगाने लगती तो पलंग पर सोया हुआ भईया ( बा का बेटा) उसकी गंध से जाग जाता और कहता - सारे बिस्तरों में केरोसीन की गंध भर जाएगी।
बा को गुस्सा आ जाता... तू चुपचाप सो तो, घासलेट की गंध अभी उड़ती है, फिर छोरी के पाँव दुख रहे हैं और तुझे गंध की पड़ी है।
शायद बहुत बचपन की बात है.... कोई विशेष अवसर था, इसलिए फइयों (बुआओं) के परिवार को खाने पर बुलाया था। बाल धोने की बारी थी और बा मुझे नहला रही थी। खूब देर तक सिर को रगड़ा फिर साबुन से गर्दन रगड़ने लगी और कहा - देख गर्दन कितनी काली कर रखी है। ठीक से नहाती भी नहीं है।
फई बहुत देर तक मुझे यूँ नहलाते देख शायद ऊब गईं थी... वे बोल पड़ी - भाभी कितना ही रगड़ो यह तो काली ही रहेगी।
मैं रूआँसी हो गईं थी... और बा चिढ़ गईं थी। आपको ऐसा कहना शोभा नहीं देता - जाने कैसे वे कह गईं थीं, जबकि मैंने उन्हें कभी किसी को जवाब देते नहीं देखा था। फई को खिसियाते देखा था मैंने।
मेरी शादी के बाद की घटना थी... किसी शादी से लौटी थी, इसलिए साड़ी पहनी थी और तैयार भी हुई थी.... हमेशा की तरह भाई से किसी बौद्धिक बहस में उलझी हुईं थी और मेरा ध्यान नहीं था कि वे बहुत देर से मुझे देख रही थी। फिर बहुत सकुचाते हुए कहती हैं - तू तो हीरोइन की तरह लग रही है।
उनके पास तारीफ करने का इससे बेहतर और कोई तरीका जो नहीं था। बरसों बरस अपने रंग को लेकर ताने सहती और डिप्रेशन में रहती एक लड़की से एक गोरी-चिट्टी और खूबसूरत महिला ऐसा कहे जो उसकी माँ भी नहीं है तो फिर मानना पड़ेगा कि ऐसा सिर्फ माँ ही कह सकती है, .... सिर्फ और सिर्फ माँ।
बा के रूप में मैंने स्त्री के आदर्श रूप को जाना है। जाना है कि माँ होने के लिए बच्चे तो जन्म देना जरूरी नहीं है.... ये रसायन है, फिर वे तो माँ भी हैं.... मैंने अपने जीवन में उन्हें कभी माँ के अतिरिक्त किसी और भूमिका में नहीं देखा.... बहुत सारे रिश्ते उनके आसपास हैं, फिर भी हर रिश्तों में जो सबसे ज्यादा उभरकर आता है, वह उनका माँ होना..... वे पत्नी हैं, बहन, भाभी, सास, जेठानी और अब तो दादी भी.... लेकिन फिर भी उनका माँ वाला रूप उन सबसे उपर है, वह हमेशा हर रिश्ते में माँ हो जाती हैं। शायद इसीलिए वे हर रिश्ते को प्यार और मीठी-सी सुवास से भर देती है। अपने बच्चों को सभी माएँ प्यार करती हैं, लेकिन यदि दुसरों के बच्चों को प्यार कर पाए तभी औरत वहाँ पहुँच पाती है, जहाँ वो सचमुच माँ हो पाती है। मेरी बा ऐसी ही है....। स्मृति तो इतनी है कि एक उपन्यास भी कम हो.... लेकिन क्या प्यार की कोई माप हो सकती है? क्या शब्द वो सब कह पाते हैं, जो हम सचमुच कहना चाहते हैं? नहीं... शब्द महज शब्द हैं.....लेकिन अहसासों को कहने के लिए हमें इनका ही सहारा लेना पड़ता है.... फिर किसी को यह कहने के लिए कि उसका होना हमारे जीवन की नींव से है, शब्द ही सहारा होते हैं....इसीलिए... इतने सारे बहाए हैं.... पता नहीं कितना कह पाई हूँ....?

Tuesday, 4 May 2010

जीने का शऊर आ रहा है....?


झिलमिलाते तारों और खिलखिलाती हवा के साथ रात की जुगलबंदी के माहौल में अपनी साधना के पन्नों को पलटते हुए बहुत सारी शहद की बूँदे जहन में उतरी थी.... सोचा था, सुबह बहुत मीठी होगी...। जागने से पहले और नींद के लंबे दौर के बाद जब आँखें खुली तो पता नहीं क्यों कुछ बोझ सा महसूस हुआ, फिर सो गईं। सुबह चाय के कप के साथ अखबार पर फिसलती नजरें थी.... क्या पढ़ा ये तो पता नहीं लेकिन जो कुछ देखा वो कहीं टँक गया। एकाएक लगा कि बहुत हॉचपॉच हो रहा है। शायद दिमाग की स्टोरिंग कैपेसिटी कम है या फिर सारी ड्राइव फुल हो गई है.... तभी तो सूचनाओं की ड्राइव को खोलो तो विचारों की खुल आती है और अहसासों की ड्राइव को खोलने की कोशिश करें तो स्मृतियों की खुल पड़ती है..... अब ये तो आपकी समझ में आता ही है कि जब आप काम करना चाहते हैं, और सिस्टम बार-बार दिक्कत दे रहा हो तो, फिर किस तरह की बेचैनी होने लगती है। ठीक वैसी ही बेचैनी है..... काम करने का अपना सिस्टम है, तो हाथ यांत्रिक तरीके से काम कर रहे होते हैं, और दिमाग अपनी तरह से, लेकिन मन में कहीं कुछ ऐसा है, जो कहीं जम नहीं पा रहा है, कहीं स्थिर नहीं हो पा रहा है। बहुत सारी अनुभूतियों और सवालों की खिचड़ी पक रही है...... कहीं केंद्रीत नहीं कर पा रही हूँ.... और कुमारजी सुनाते हैं, उड़ जाएगा हंस अकेला.....,कहीं कुछ जमा हुआ दरकने लगा...... गीला-गीलापन उतर आया और विचार आया यही सच है..... लेकिन ये आज क्यों...... नहीं ये उभरता रहता है, आज फिर उभरा है..... क्या जीने का शऊर आ गया?
मरने का सलीका आते ही जीने का शऊर आ जाता है....
नहीं....?

Sunday, 2 May 2010

भूख जगाता बाजार


गर्मियों के सुलगते दिन और बुझती रातों को जीना एक अहसास है... ठंडी सफेद चादरों पर जागे देर तक, तारों को देखते रहे छत पर पड़े हुए... की तरह का....तो देर तक जागती रातों वाली ऐसी ही राख हुई छुट्टी की सुबह थी। नींद गाढ़ी थी और उसका खुमार और भी गाढ़ा.... बाहर से लगातार आ रही ठक-ठक से पड़ा नींद में खलल.... उफ्, छुट्टी की सुबह भी चैन नहीं.... शिकायतें हमारा स्थायी-भाव है (सिर्फ मेरा ही नहीं, हम सबका)। बाहर जाकर देखा तो पास में बन रहे मकान के चौकीदार का 13 साल का बेटा था जितेंद्र.... हमारे हुलिए और मुद्रा को देखकर उसने चमकते दाँतों को थोड़ा झलकाकर खिसियाई-सी हँसी बिखेरी.... भईया है?
चिढ़कर पूछा - क्यों?
गाड़ी धोनी थी ना!
उसकी बात हमारी समझ में नहीं आई...।
क्या करना है, इतनी सुबह?
भईया ने कहा था कि गाड़ी धोनी है, इसलिए....- उसने बात अधूरी छोड़ दी।
अरे अभी तो सिर्फ सात ही बजी है, नौ बजे तक आना... – नींद पूरी तरह से हवा हो गई थी, इसलिए लहजे में भी थोड़ी नर्मी आ गई.... धीरे से पीछे बेटा लगा दिया।
बाद में लगभग हर दिन वह सुबह आ धमकता.... कोई काम है?
अरे इतना छोटा बच्चा और वह भी लड़का क्या काम करेगा? कभी गार्डन साफ करवाया, फिर हर दिन पौधों को पानी पिलाने की जिम्मेदारी भी उसे दे दी। अब धीरे-धीरे वह शाम को कुछ काम है? कहता हुआ आ टपकता.... एक दिन रहा नहीं गया, पूछना ही पड़ा.... इतना सारा काम करने की क्यों सूझ रही है। उसका जवाब था.... जूते खऱीदने हैं।
मामला यूँ था कि उसे हर काम के पैसे मिलते थे... दो गाड़ी धोई तो 10 रु. पौधों को पानी पिलाया और गार्डन साफ किया तो हर काम के 10 रु. तो बस वह काम की तलाश में आ धमकता.... वह छुटिट्यों में काम करके पैसा जमा कर 11 सौ रु. के जूते खरीदना चाहता है। हमने उसे समझाया – बेटा, इन 10-10 रुपयों को इकट्ठा कर तुम खऱीद चुके जूते.... भूल जा... उन जूतों को....। तीन चार दिन बाद पता चला कि उसके पिता ने दोनों भाईयों को शहर की किसी दुकान पर काम में लगा दिया है।
अब आप इस पर तो जरा भी मत विचारो कि सरकार के मरे बाल श्रम निषेध कानून का क्या होगा? मामला यह नहीं है। उस 10 बाय 10 की कोठरी में मकान में मजदूरी करते पाँच बच्चों के साथ रहते माता-पिता के बच्चे को 11 सौ रु. के जूते लेने की इच्छा कहाँ से जागी? यहाँ आकर गाँधीजी असफल हो जाते हैं, जरूरतें सीमित करो... अरे मामला जरूरतों से आगे का है, इच्छा और फिर वह सीधे जा मिलता है, भूख से.... हवस से....। भूख पहले भी थी, लेकिन इतनी विकराल नहीं थी, जितनी विकराल भूख होगी, उतनी ही विशाल उसकी तृप्ति भी होगी। तो यूँ तो जितेंद्र को जरूरत नहीं थी इतने महँगे जूतों की, लेकिन उसकी भूख तो थी। उसने किसी विज्ञापन में धोनी को वे जूते पहने देख लिया था, फिर.... ? कहाँ से लाए संतोष..... यह जो बाजार है, जिसने अब तक सिर्फ भूख ही पैदा की है, तृप्ति नहीं....तो फिर संतोष आएगा कहाँ से?
औद्योगिक क्रांति के बाद के विकास का इतिहास पूरी तरह से बाजारों की खोज का इतिहास रहा है, इसी खोज ने उपनिवेश बनाए और ग्लोबलाइजेशन के लिए जमीन तैयार की.... सोवियत संघ का पतन तो महज तात्कालिक कारण रहा। मूल कारण तो भूख ही है... लगातार पाने की... सफलता, शोहरत, दौलत, चमक-दमक.... हर कहीं पसरी, लगातार फैलती भूख...विकास की आड़ में फैलती-पनपती भूख... विकास को जस्टिफाई करती.... उसे डिफाइन करती भूख.... बाजार सिर्फ भूख ही पैदा कर सकता है.... उसे तृप्त करना बाजार के बस का रोग नहीं है। बाजार द्वारा पैदा की गई हवस और उसकी तृप्ति के गुमनाम रास्तों से आया मवाद सारे समाज में फैल गया है। हम कितना ही कहें जातीय, ऐतिहासिक या धार्मिक मामले हैं,... लेकिन इन सबके मूल में कहीं एक ही चीज है, भूख.... बेहिसाब भूख.... कहीं पेट भरने की.... तो कहीं पाने और भोगने की...।
भूख का विस्तार जरूरतों के पहाड़ों को तो कब का लाँघ चुका है.... वह सबकुछ को डुबो देने को आतुर है..... और देखिए.... कि बाजार ने सपनों के चमकीले साँप हर घर में छोड़ दिए हैं.... उससे कोई बचाव, कोई सुरक्षा न तो सरकारों के बस में है और न ही कथित संस्कृति के बस में..... हम बस इस ‘भूख’ के प्रवाह में डूब रहे हैं..... बचाव कुछ नहीं.... है, डूबना ही नियति है.... बस

Wednesday, 21 April 2010

डुबोया मुझको होने ने....


हम हर वक्त होना चाहते हैं, बल्कि होने के अलावा हम और कुछ चाह भी नहीं सकते हैं, एक साथ पैसा, शोहरत, इज्जत, नाम, खुबसूरती, तंदुरूस्ती और पता नहीं क्या-क्या.... चाहते हैं.... होना और होना.... होने की दौड़ में हैं हम सब... पूरी जिंदगी इस होने के नाम कुर्बान करते हैं, फिर आखिर में क्या हो पाते हैं हम? हममें से हरेक लगता है होने के लिए ही पैदा हुआ है। होना ही सब चेतना, क्रिया, विचार, संवेदना और भावना के मूल में हैं। सपने इसका स्रोत हैं। यूँ हर कोई कुछ-न-कुछ तो हो ही जाता है, लेकिन जो हकीकत में होना चाहते हैं, वह कितने हो पाते हैं। कुछ ही वहाँ तक पहुँच पाते हैं, जहाँ वे होना चाहते हैं, शेष तो बस घिसटते हुए कुछ भी हो जाते हैं। फिर भी कुछ न कुछ तो होना ही होता है। हम भी हुए कुछ.... वो तो नहीं जो चाहा था, लेकिन फिर भी होने जैसे कुछ तो हुए ही.... (अब होना तो मजबूरी है ना) फिर होना हर पल होता है, तो होते ही रहते हैं। होना अच्छा भी लगता है, कहीं कुछ हमें दूसरों से उपर करता लगता है, कभी हम दूसरों से कम भी होते है, फिर भी होते तो हैं ही, ये लगातार चलती रहती है, मरने तक.... होने के लिए ही जो जन्मे हैं....।
ज्यादातर तो ये होना अच्छा ही लगता है। यदि मन का हो जाए तो सातवें आसमान पर होते हैं, नहीं हो तो भी कुछ दिन दुखी होकर भी जो है, उसी में मन लगाने लगते हैं और होने का उत्सव जीवन भर मनाते हैं। होना नशा है.... गहरा..... जीने का सहारा भी, इसलिए होना जरूरी है, लेकिन कभी-कभी मन यूँ भी करता है, काश ये होना थोड़े दिन के लिए ही स्थगित हो जाए.... होने की चेतना, उसका अहसास हवा हो जाए..... रूह भाप बनकर उड़ जाए, जहन बादल होकर बरस जाए.... बदन रेत की तरह भुरभुरा जाए.... और हम होने से न-कुछ हो जाए।
ग़ाल़िब ने लिखा था
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता
अभी हम इस दर्शन में नहीं पड़ रहे हैं कि खुदा के होने से पहले क्या था, और खुदा के न होने पर क्या होगा? यहाँ मामला अपनी संवेदनाओं का, अपनी चाहतों का है तो बेचारे खुदा को क्यों घसीटे? हाँ तो चाहते हैं, न हों...... उस प्रेम की गली में गर्क़ हो जाए जो बहुत सँकरी है.... जिसमें या तो हम हो या फिर वो..... फिर हम ही रल जाए, गल जाएँ, खत्म हो जाए.... लेकिन.... अपने होने के भारी-भरकम अहसास को कहाँ लेकर जाएँ? फिर कुछ हो जाने के बाद भी क्या है? कोई खुशी.... कोई संतुष्टि.... कोई अर्थ नहीं है.... तो फिर क्या यही सही है
रास आया नहीं तस्कीन का साहिल कोई
फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाए