Tuesday, 25 August 2009

अब करें मंदी का इंतजार...




आसमान बेईमान हो चुका है। पूरे देश से दिल दहलाने वाली खबरें आ रही है। धरती रूखी-सूखी और पपड़ाने लगी है। कहा जा रहा है कि यह इस सदी का सबसे बड़ा सूखा है। मौसम विभाग हमेशा की तरह ही असमंजस में रहा और उसने उसी की रचना की। पहले कहा मानसून समय से पहले है और अच्छा है.. फिर बंगाल की खाड़ी से आए तूफान ने बादलों की दिशा बदल दी तब कहा कि देर से है, लेकिन दुरूस्त है। फिर कहा कि औसत से सात फीसद कम होगी बारिश...फिर कहा कि 17 और अब जो आँकड़े आ रहे हैं, वे हमें साल भर के लिए दहशत में डालने के लिए काफी हैं। औसत से 37 फीसद कम बारिश से खरीफ की 50 प्रतिशत फसल को नुकसान....लेकिन इसी दरम्यान अमेरिकी मौसम विभाग ने कह दिया था कि ला-नीनो इस साल सक्रिय है और उसका असर एशिया में होगा और भारत में इस बार मानसून दगा दे सकता है, लेकिन हर बार की तरह ही इस बार भी हमने मानसून पर भरोसा किया (हम कुछ और कर भी नहीं सकते हैं) और वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। इस बीच
पैमाने में छूटने जैसा पानी भी बरसा...और हमारे पास उससे खुश होने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचा।
दरअसल अब समय आया है, मंदी से निबटने के चुस्त उपाय करने का। फिलहाल हमारे सामने मंदी का जो भी भूत खड़ा है वह आयातित व्यवस्था की डमी है। 59 सालों से योजनाओं के माध्यम से विकास करने की कोशिश करते देश में आज भी उद्योगों का अस्तित्व अर्थव्यवस्था को वैसे प्रभावित नहीं करता, जितना मानसून...क्योंकि चाहे कृषि पर निर्भरता का आँकड़ा 75 से खिसक कर 60 प्रतिशत पर आ गया है, फिर भी देश की 60 प्रतिशत जनता की क्रयशक्ति देश की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती है। जितना अर्थशास्त्र पढ़ा है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था का मूलाधार कुल माँग है। और माँग के मूल में है क्रय शक्ति....। यदि देश की 60 प्रतिशत जनता के पास क्रयशक्ति नहीं है तो फिर माँग कहाँ से बनेगी? और यदि माँग ही नहीं बनेगी तो फिर उत्पादन का क्या होगा?
भारत के आर्थिक इतिहास को उठा कर देख लें..... जब कभी मानसून अच्छा होता है, खरीफ के बाद दीपावली की रौनक देखने के काबिल होती है। बाजार रोशन होते हैं और किसानों के घरों में सामानों की भरमार होती है। तो अब जबकि खऱीफ की फसल निकालने जैसा ही पानी नहीं गिरा हो तो फिर अगले पूरे साल के लिए बाजारों में मंदी का ही आलम रहेगा। चाहे जर्मनी और फ्रांस से मंदी के उबरने जैसी उत्साहजनक खबरें आ रही हो....लेकिन हमारे देश में मंदी का चक्र अब शुरू होगा....क्योंकि हमारे किसान यदि खुश नहीं है तो फिर पूरा देश कैसे खुश हो सकता है? अभी तो हम अर्थव्यवस्था की ही बात कर रहे हैं, खाद्यान्न संकट पर तो सोचना शुरू ही नहीं किया है, मंदी ने इस विश्वव्यापी प्रश्न को फिलहाल तो हाशिए पर पटक दिया, लेकिन जल्दी ही हमें इस पर भी विचार करना होगा, ये मामला अर्थव्यवस्था का नहीं.... हमारी भूख का है... नहीं!

Sunday, 16 August 2009

'वह अर्थशास्त्री'


लाई हयात आए, ले चली कज़ा चले
अपनी ख़ुशी से आए न अपनी ख़ुशी चले
सुबह की गाढ़ी नींद में उलझा हुआ था ये शेर नींद खुली तो टप से गिरकर दिन पर बिखर गया। फिर खुली सवालों की पोटली, उसमें से निकला सवाल.... है और होना चाहिए, पाने और होने.....ख़्वाहिशों और हकीकतों, चाहने और पाने के बीच की खाई इतनी चौड़ी क्यों है? क्यों है ये असंगति.... ये एब्सर्ड(कामू के शब्दों में)? क्या है जो हमें तमाम प्रयासों के बाद भी उससे दूर रखता है जिसकी हमें उस समय में सबसे ज्यादा जरूरत होती है? हमारे पास हर चीज के लिए शब्द हैं, इसके लिए भी है.....परिस्थिति....समय का फेर..., योग्यता, प्रतिभा और अवसर की कमी...सारी स्थूलता, वो जो दिखाई देता है। फिर भी सवालों की आग बुझ नहीं पाती है। बहुत सुविधा से भाग्य या प्रारब्ध जैसे शब्दों से कन्नी काट लेते हैं, क्योंकि हमें विज्ञान ने सिखाया है कि जो दिखता है, बस वही सच है, शेष कुछ है ही नहीं, झूठ भी नहीं, क्योंकि झूठ होने के लिए भी तो कुछ होने की जरूरत होती है। हम सूक्ष्मता को देखते नहीं है, देखना नहीं चाहते हैं, क्योंकि वह समय के अनुकूल नहीं है। हम क्षणवादी हो रहे हैं, 'आज' सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, वही सच है, कल भ्रम है, बीता हुआ भी और आने वाला भी। इसीलिए भावनाओं और विचारों के अस्तित्व पर हम विचार नहीं करते हैं। हम डरते हैं, पीड़ा से.... असफलता से.... तकलीफ से....प्रकारांतर से ख़ुशी से भी...।
फिर भी कुछ तो है, कोई तो है जो सीमित संसाधनों से असंख्य लोगों की अनगिनत इच्छाओं का सामंजस्य करता है। वह पूरी दुनिया के लिए अर्थशास्त्री की भूमिका का निर्वहन कर रहा है। कह सकते हैं कि अभी इस गुत्थी को हम सुलझा नहीं पाए हैं, इसलिए 'उसका' अस्तित्व है। अक्सर यह विचार आता है कि 'उसका' होना सवालों से शुरू हुआ था और वह तब तक होगा जब तक हमारे पास एक भी सवाल है....इसके आगे कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।


Sunday, 2 August 2009

सच क्यों हो रूसवा...?



छुट्टी का दिन एक बेहतर अनुभव के साथ उगा यूँ दीगर परेशानियों की किरकिरी तो साथ ही रहती है, लेकिन जैसा कि दर्द की शुरूआत में वह शरीर के किसी कोने में आराम से आश्रय पा लेता है, इसी तरह परेशानी की शुरूआत पहले तो बस जगह ही घेरती है फिर.... फिर का कह नहीं सकते हैं। तो बिना घड़ी की सुईयों को देखें बस प्रवाह का हिस्सा हुए... लेकिन ज्यादा देर तक ये सब नहीं चल पाया। आखिरकार घर में हर जगह टँगे उस अनुशासन का क्या किया जाए जो कमोबेश हमारी बॉयोलॉजी का भी हिस्सा हो चुका है... तो सुई का सिरा भी हाथ में आ गया फिर भी मंथर हवा सा दिन उड़ रहा था।
अचानक बहस का रिपीट टेलीकॉस्ट देखकर रिमोट पर अगला-अगला स्विच दबाती उँगली रुक गई.... बहस चल रही थी टीवी रियलिटी शो सच का सामना पर....। कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में अपने भोथरे और धारदार तर्क फेंक रहा था। किसी की ढाल भारतीय संस्कृति थी तो किसी की ढाल सच....। अब कोई इनसे पूछे कि सच क्या है? और कोई ये भी पूछ ले कि आखिर ये संस्कृति किस चिड़िया का नाम है थोड़ी फुर्सत हो तो लगे हाथ ये भी बता दें। खैर साहब... इसी बीच राजेश ने बताया कि उनेक कॉलेज के प्यून ने उन्हें बताया कि कैंटीन में बच्चे सच का सामना खेल खेलने लगे हैं। टीवी ने एक नया खिलौना जो दिया है बच्चों को भी और बड़ों को भी (तभी तो संसद का कीमती समय और ऊर्जा इस नामालूम से प्रोग्राम के पीछे खर्च की जा रही है।) ठीक भी है जब आप सारे देश के सामने सच का ढिंढोरा पीट रहे हो तो फिर बच्चे अपने सर्कल में सच क्यों नहीं बोल सकते? आखिरकार एक बुरी तरह से बदनाम माध्यम ने देश में सच बोलने की लहर तो पैदा की, लेकिन मजा तब है जब वह व्यक्तिगत सच की बजाय सार्वजनिक सच को सार्वजनिक करे, क्योंकि व्यक्तिगत सच समाज में सिर्फ सनसनी पैदा करते हैं, ये एक तरह से किसी के बेडरूम में घुसने की चेष्टा है, एक नितांत घटिया किस्म का मनोरंजन... अब जो इसके पक्षधर है, वे कहते हैं कि हम सच बोलकर हल्के हो गए.... तो यह भी बताएँ कि आखिर आपकों अपनों से जुड़े सच को कहने के लिए किसी मंच की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या आप यूँ ही उन्हें अपने सच नहीं बता सकते? और आपके नितांत व्यक्तिगत सच से किसी का क्या फायदा या नुकसान होना है? तो फिर इस सारे अनुष्ठान के पीछे कहीं पैसा और राखी सावंत(हाँ राखी के स्वयंवर पर भी चर्चा की जा सकती है, लेकिन एक वक्त में एक ही मामले को फोकस करने का खुद से किया वादा अभी निभा हुआ है) नुमा पब्लिसिटी की वासना तो नहीं है? क्या ये भी आप पोलिग्राफी टेस्ट में कबूल कर रहे हैं....? गुजारिश है कि इस पर भी गौर फरमाए।
जहाँ तक संस्कृति का सवाल है तो इसी संस्कृति में ब्रह्मा भी है और कृष्ण भी अहिल्या का प्रकरण भी है और रावण का भी... तो संस्कृति का तो ऐसा कोई कार्यक्रम क्या बिगाड़ेगा? हाँ इससे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास समय को भरने के लिए खासा मसाला जुट जाता है। और जो अपना समय और ऊर्जा इस कार्यक्रम को देखने और इस पर बहस करने में बिताते है, वे बेचारे ठगे जाते हैं.... हाँ लिखने वाले और पढ़ने वाले भी दोनों.....अब इसके लिए आप मुझे माफ करेंगे।